Saturday, August 08, 2020 05:47 PM

कोरोना ने बढ़ा दिए ‘ड्राई आई  सिंड्रोम’ के रोगी

बिलासपुर में कोविड-19 के चलते मोबाइल-कम्प्यूटर का ज्यादा इस्तेमाल करने से बढ़ गए आंख के मरीज

नयनादेवी-कोविड-19 की वजह से लागू हुए लॉकडाउन के कारण घरों में बैठने पर मजबूर हुए लोगों में टाइम पास करने के चक्कर में मोबाइल, कम्प्यूटर और टीवी देख-देखकर आंखें खराब कर ली हैं। लॉकडाउन के दौरान आंखों की बीमारी (जेरोऑप्थालमिया) यानी आंखों में सूखेपन के मरीज़ कई गुना बढ़ गए हैं। इसके अलावा आंखों में थकान के मामले भी बढ़ गए। इतना ही नहीं, लॉकडाउन के दौरान आंखों में नमी रखने वाले लुब्रिकेंट आई ड्रॉप्स की सेल भी दुगनी से भी अधिक हो गई है। लॉकडाउन की वजह से मार्च के अंतिम सप्ताह से लेकर जून के पहले सप्ताह तक घरों में बंद हुए लोगों के पास चूंकि बाहर की दुनिया को जानने और कोरोना पर दुनिया भर से आ रहे अपडेट्स की जानकारी के लिए मोबाइल फोन और कम्प्यूटर ही थे। कोरोना फैलने के डर से अखबार लेना छोड़ने वाले लोग भी दिन भर मोबाइल फोनों और कम्प्यूटर से ही जानकारी लेते रहे। मोबाइल कंपनीज के डेटा इस्तेमाल के आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की मोबाइल फोन का औसत स्क्रीन टाइम कई गुणा बढ़ गया। इसका नतीजा यह हुआ कि कई घंटे तक मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन और टेलीविजन देखते रहने के कारण लोगों की आंखों में थकान और सूखेपन की बीमारी बढ़ गई। हिमाचल प्रदेश के पूर्व विधायक रणधीर शर्मा के बड़े भाई चंडीगढ़ में कोर्निया सेंटर में नेत्र रोग विशेषज्ञ डाक्टर अशोक शर्मा ने नयना देवी में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि लगातार कम्प्यूटर पर काम करते रहने वालों में सीवीएस यानी कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम के मामले पहले भी देखने को मिलते हैं। ऐसे मामलों में आंखों में थकान और हल्की सूजन भी हो जाती है। इसके अलावा आंखों में नमी कम हो जाने के केस भी आते हैं, जिनमें से अधिकतर मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से ही होते ह। इस तरह आंखों में नमी की मात्रा कम हो जाने को मेडिकल भाषा में जेरोऑप्थलमिया कहा जाता है। प्राकृतिक तौर पर विटामिन ए की कमी से भी आंखों में नमी बनाए रखने वाले लैक्रिमल ग्लैंड ठीक से काम नहीं करते। इससे जेरोऑप्थलमिया या ड्राई आई सिंड्रोम कहा जाता है। मोबाइल फोन या कम्प्यूटर पर अधिक देर तक नजरें गड़ाए रखने से आंखों में सूखापन बढ़ जाता है। इसके कारण आंख के कोर्निया में जख्म भी हो सकता है और कोर्निया खराब होने से आंखों की रोशनी भी जा सकती है। डाक्टर शर्मा का कहना है कि लॉकडाउन खुलने के बाद उनके पास कोर्निया सेंटर में आने वाले मरीज़ों की संख्या में ड्राई आई सिंड्रोम के मामले अधिक देखने को मिल रहे हैं। डॉक्टर शर्मा के मुताबिक एक मई से 19 जून तक के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि उनके पास आए कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम और ड्राई आई सिंड्रोम के मामलों के कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। इनमें वो मरीज भी शामिल हैं, जो लॉकडाउन में फंसे होने के कारण उनसे ऑनलाइन परामर्श ले रहे थे। डाक्टर अशोक शर्मा ने बताया कि पिछले साल एक मई से 15 जून के दौरान उनके पास कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम का मात्र एक केस आया था, जो इस साल लॉक डाउन पीरियड में बढ़कर 22 हो गए हैं। इसी तरह पिछले साल इसी अवधि के दौरान ड्राई आई सिंड्रोम के कुल 18 मरीज आए थे। इस साल इन्ही महीनों के दौरान यह संख्या बढ़कर 28 हो गई है। जाहिर है, लॉकडाउन में लगातार कई घंटों तक इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स जैसे मोबाइल फोन और टीवी देखते रहने के कारण गेजेट्स की रेडिएशन से आंखों की नमी खत्म हुई। उन आंकड़ों से यह भी सामने आया कि इस बार ड्राई आई सिंड्रोम के मरीजों में उम्र का फैक्टर नहीं दिखा। इसका अर्थ है कि सभी उम्र के लोगों ने मोबाइल फोन, लैपटॉप, कम्प्यूटर और टीवी बराबर इस्तेमाल किया। ड्राई आई सिंड्रोम के कारण ल्यूब्रिकेंट आई ड्रॉप्स की सेल में लगभग दोगुनी हो गई। साधारणतय आंखों में नमी बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले मिथाइल सेल्यूलोज-आई ड्रॉप्स की बिक्री में इजाफा हुआ।

 

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