Tuesday, June 02, 2020 11:10 AM

कोरोना संकट और मिडल क्लास

डा. वरिंदर भाटिया

पूर्व कालेज प्रिंसीपल

उदाहरण के तौर पर हमारे देश में होली के दौरान प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ पिचकारियों की बिक्री होती है, जो अधिकतर चीन से आयात की जाती हैं। यदि देश के एक जिले में सिर्फ पिचकारियों के निर्माण से संबंधित लघु उद्योग स्थापित किए जाएं तो उसकी खपत हमारे देश में ही संभव है। हमें यह समझना होगा कि यदि हम दुनिया के लिए सबसे बड़े बाजार हैं तो अपने लिए क्यों नहीं। हमारे देश की नीतियां इस तरह की होनी चाहिएं जिसमें हमें दूसरे देशों से आयात पर कम से कम निर्भर होना पड़े। इस कारण मार्च से जून तक केंद्र सरकार का टैक्स कलेक्शन भी बुरी तरह प्रभावित होगा। उसे चार महीने में करीब आठ लाख करोड़ रुपए राजस्व का नुकसान होगा। इस दौरान वह राहत पैकेज के नाम पर दो लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी...

कोरोना संकट से हमारी मिडल क्लास काफी प्रभावित हुई है। यह वर्ग कमाई के लिए ज्यादातर निजी क्षेत्र पर निर्भर है। सरकारी कर्मचारियों की नौकरी पर कोई ज्यादा बड़ा संकट नहीं है। हमारे देश में केंद्र व राज्य सरकार के लगभग 2.25 करोड़ कर्मचारी हैं, जिनकी सैलरी पर सरकारें लगभग 12 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्च करती हैं। वहीं गरीब तबके के लिए भी सरकार की तरफ  से प्राण वायु देने वाली लाभकारी योजनाएं आती रहेंगी, जबकि निजी क्षेत्र पर ज्यादा निर्भर रहने वाली मिडल क्लास के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इसी तरह से बिजनेस क्लास की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। भले ही कहा जा रहा है कि बिजनेसमैन अपने कर्मचारियों की सैलरी में कटौती नहीं करें और उनकी छंटनी नहीं करें। लेकिन खुद कई सरकारें आर्थिक तंगी के चलते कर्मचारियों के आर्थिक लाभों को रोक रही हैं। जाहिर है, व्यवस्था समझ रही है कि यह आर्थिक संकट बहुत गंभीर है और लंबा चलने वाला है। ऐसे में बिजनेस क्लास से उम्मीद करना मुश्किल है। इसके लिए हमें बिजनेस क्लास के काम करने के तरीके को भी समझना होगा। व्यापारी अपनी पूंजी के साथ-साथ बैंक में अपनी संपत्तियां गिरवी रखकर कर्ज लेकर कोई कारोबार शुरू करता है। व्यापार से हुए लाभ को वह अपने व्यापार को बढ़ाने में ही पुनः निवेश करता है।

आज की परिस्थिति में व्यापारी का कारोबार ठप है, उसके सिर पर कर्ज है और उसकी संपत्तियां बैंकों के पास गिरवी हैं। जब कमाई ही नहीं होगी, तो फिर वह क्या करेगा? एक बात और समझनी होगी। लॉकडाउन की वजह से जो लाखों मजदूर पलायन कर रहे हैं, वह अब आसानी से वापस नहीं आएंगे। ऐसे में बिजनेस क्लास के सामने अलग तरह का एक नया संकट भी खड़ा होने वाला है। वर्तमान परिस्थितियों में लोगों की जमा पूंजी भी घट रही है। लॉकडाउन में इंप्लाई प्रॉविडेंट फंड से लगभग 2400 करोड़ रुपए लोगों ने निकाले हैं। इसी तरह म्युचुअल फंड निवेशक भी नुकसान सह कर पैसे निकाल रहे हैं। हाल ही में सरकार द्वारा म्युचुअल फंड के लिए 50 हजार करोड़ रुपया दिया गया है। जाहिर है संकट बढ़ रहा है। इन परिस्थितियों में संकट बढ़ने पर लोग गोल्ड, रियल एस्टेट में किए गए निवेश को भी सस्ते में बेचने पर मजबूर होंगे। कोविड-19 की लड़ाई बहुत लंबी चलने वाली है। हमें अब मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाइजर जैसी चीजों को जीवन का हिस्सा मानना होगा। क्योंकि यदि इसकी वैक्सीन भी आ जाए, तब भी उसके प्रोडक्शन में और लगभग 150 करोड़ की आबादी को वैक्सीन लगाने में वर्षों लग जाएंगे। साथ ही हमें अपने सीमित संसाधनों पर भी गौर करना होगा क्योंकि दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत आबादी के लिए नीतियां बनाना काफी चुनौतीपूर्ण है। खास तौर पर तब जहां करदाताओं की संख्या आबादी के परिप्रेक्ष्य में बहुत सीमित है। हमें सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा। चीन से आयात होने वाले लघु उद्योगों के सामान का उत्पादन भारत में करने के लिए नीतियां बनानी चाहिए। मध्यम और लघु उद्योगों का क्लस्टर वाइज विकास करना चाहिए। प्रत्येक जिले में एक ही प्रकार की वस्तुओं की मेन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना करनी चाहिए। इसके लिए सरकार को मध्यम व लघु उद्योगों के लिए दी जाने वाली सभी प्रकार की सबसिडी को समाप्त करके उद्योग लगाने हेतु काम से कम दो वर्ष के लिए बिना ब्याज का ऋण देना चाहिए जिससे शहरों से पलायन करके ग्रामीण क्षेत्रों में लौटे लोगों को रोजगार भी मिल पाएगा।  उदाहरण के तौर पर हमारे देश में होली के दौरान प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ पिचकारियों की बिक्री होती है, जो अधिकतर चीन से आयात की जाती हैं। यदि देश के एक जिले में सिर्फ पिचकारियों के निर्माण से संबंधित लघु उद्योग स्थापित किए जाएं तो उसकी खपत हमारे देश में ही संभव है। हमें यह समझना होगा कि यदि हम दुनिया के लिए सबसे बड़े बाजार हैं तो अपने लिए क्यों नहीं। हमारे देश की नीतियां इस तरह की होनी चाहिएं जिसमें हमें दूसरे देशों से आयात पर कम से कम निर्भर होना पड़े। इस कारण मार्च से जून तक केंद्र सरकार का टैक्स कलेक्शन भी बुरी तरह प्रभावित होगा। उसे चार महीने में करीब आठ लाख करोड़ रुपए राजस्व का नुकसान होगा। जबकि इस दौरान वह राहत पैकेज के नाम पर करीब दो लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी। यानी चार महीने में उसे सीधे तौर पर 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होगा। जबकि केंद्र सरकार पूरे वित्तीय वर्ष में करीब 22 लाख करोड़ रुपए की कमाई करती है। इसके अलावा राज्य सरकारों के राजस्व पर भी बुरा असर हुआ है। हर तरफ  से कमाई ठप हो गई है। दो अहम बातें और हैं जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट हम इसलिए झेल पाए क्योंकि सदैव से हमारी अर्थव्यवस्था बचत आधारित रही है। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में एक बड़ा मध्यम वर्ग ऐसा खड़ा हो गया है जो क्रेडिट आधारित जीवनशैली जीता है। ऐसे में उसके सामने ज्यादा बड़ा आर्थिक संकट इस बार खड़ा होगा। इसीलिए सरकार को अपनी क्रेडिट पॉलिसीज में भी सुधार करना चाहिए जिसमें उधार व्यापार बढ़ाने हेतु निवेश के लिए दिया जाए, न कि उधार लेकर खर्च करने के लिए।

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