Tuesday, June 02, 2020 11:48 AM

कौन संभालेगा वर्मा की विरासत

 ठियोग - ठियोग से छह बार विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले राकेश  वर्मा की अचानक मौत के बाद ठियोग में राजनीति के एक युग का अंत हो गया है। पिछले करीब तीन दशकों से राकेश  वर्मा ठियोग राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय थे। वह ठियोग विधानसभा से तीन बार विधायक रहे। राकेश वर्मा जमीनी स्तर से जुड़ा हुआ एक नेता था। हर गांव, घर में वह हर व्यक्ति से निजी तौर से जुड़े हुए थे। उनकी छवि एक मददगार नेता के रूप में थी। 1993 में पहली बार उन्होंने विद्या स्टोक्स को हराकर चुनाव जीता था उस समय उनकी उम्र बेहद कम थी। उस समय उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था। इसके बाद 1998 में वह भाजपा के टिकट से चुनाव लड़े थे, लेकिन स्टोक्स ने इस बार उन्हें हरा दिया था। जबकि 2003 में भाजपा का टिकट न मिलने के कारण उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और चुनाव जीत गए थे। जबकि 2007 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट के लिए भी काफी कोशिश की थी, लेकिन टिकट न मिलने के कारण फिर निर्दलीय चुनाव लड़ा और चुनाव जीत गए थे। जबकि 2012 तथा 2017 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए वह चुनाव हार गए। पुनर्सीमांकन के कारण उनका अपना गृह क्षेत्र बलसन जहां की 11 पंचायतें पहले ठियोग में थी चौपाल में चले जाने के कारण उन्हें राजनीतिक तौर पर इसका काफी नुकसान भी हुआ, लेकिन उन्होंने अपने परंपरागत चुनाव क्षेत्र ठियोग से ही चुनाव लड़ने की ठानी। लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अब उनकी अचानक मृत्यु के बाद ठियोग कुमारसैन के लिए सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है कि आखिर उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने वाला कौन होगा। ठियोग में जबसे राकेश  वर्मा ने भाजपा का दामन थामा था तबसे भाजपा का ग्राफ  बढ़ा है या यूं कहें कि ठियोग में यदि भाजपा थी तो राकेश  वर्मा के कारण ही थी। कांग्रेस के इस गढ़ में भाजपा को सम्मानजनक स्थिति में लाने वाले राकेश वर्मा ही थे। अब उनके न होने से उनके बोए हुए को काटने के लिए कइयों की कतारें लगने वाली है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल ये भी पैदा हो गया है कि जो लोग राकेश  वर्मा के साथ जुड़े हुए थे वो अब किधर की ओर रुख करेंगे। क्योंकि इन समर्थकों में यह भी एक नाराजगी है कि उनके प्रिय नेता राकेश  वर्मा को ठियोग से हराने में भाजपा का ही एक धड़ा हमेशा उनके खिलाफ रहा अब वर्मा के न होने से उनके समर्थक किधर जुडं़ेगे यह आने वाले समय में ठियोग की राजनीतिक दशा व दिशा को तय करने वाला है।