Thursday, December 03, 2020 01:15 AM

क्या नए नक्सलवाद का उदय!

बेशक कुछ हॉटस्पॉट शहरों और जगहों में लॉकडाउन अभी जारी रहेगा, लेकिन कई स्तरों पर अब यह बेमानी है। कोरोना वायरस का भी खौफ  नहीं रहा, लिहाजा दो गज दूरी के भी कोई मायने नहीं हैं। कानून की भी परवाह नहीं है-न नेता को और न ही मज़दूर को! सैंकड़ों की भीड़ दिल्ली से पंजाब, हरियाणा और उप्र, मप्र तक देखी जा सकती है। धारा 144 और लॉकडाउन की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मजदूरों की नियति कुछ भी हो, लेकिन अब वे लामबंद भी हो रहे हैं। पंजाब के संगरूर, अंबाला-सहारनपुर राजमार्ग, दिल्ली-उप्र बॉर्डर, गाजीपुर, लखनऊ-कानपुर हाईवे, उप्र-मप्र बॉर्डर आदि पर मजदूरों के झुंड मौजूद रहे और मीलों लंबे जाम रहे। इन स्थानों पर मजदूरों के हंगामे सामने आए हैं। अब उनके हाथों में कुछ लाठियां और डंडे भी दिखाई दिए। वामदलों का लाल झंडा भी हवा में इतराता दिखा। क्या भूख, गरीबी, बेरोजगारी की लड़ाई अब हथियारबंद होकर लड़ी जाएगी? क्या अब मजदूर आक्रामक होने लगा है? क्या यह नए नक्सलवाद के उदय का कालखंड है? नक्सलवाद भी जमीन के अपने अधिकार को लेकर शुरू किया गया था। बाद में वह आंदोलन विकृत होकर हिंसक और हत्यारा बनता गया। हमें इस यथार्थ को नहीं भूलना चाहिए। मजदूर आज निरीह और असहाय प्रतीत हो सकता है, लेकिन उसके हाथों में लाठियां और डंडे कहां से आए? क्या मजदूरों को राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है? बेशक मजदूर सड़कों पर पैदल ही चलता दिख रहा है। एक अदद साइकिल पर पूरी गृहस्थी ढो रखी है। उनके आंसू सूख रहे हैं। पांवों में छाले फूटने लगे हैं। गरमी की तपती सड़क पर उसका छोटा-सा बच्चा भी एक कपड़े पर लेटा है और टुकुर-टुकुर माहौल को देखने-समझने की कोशिश कर रहा है। हम मानते हैं कि एक स्थान विशेष के मजदूरों के लिए घर-वापसी एक मनोवैज्ञानिक जिद भी है। यह भी मानते हैं कि वे अनपढ़, अनजान और घोषणाओं से बेखबर हैं, लेकिन मानवीय आस्थाओं और परंपराओं वाले देश में ऐसे अमानवीय, हृदयविदारक दृश्य लगातार क्यों दिख रहे हैं? देश के प्रधानमंत्री भी इन दृश्यों को जरूर देखते होंगे, तभी ट्वीट करते रहते हैं! गृहमंत्री और रेलमंत्री भी मजदूरों की लावारिस जिंदगी देखते रहे होंगे! वित्त मंत्री की व्यस्तता तो प्रधानमंत्री के पैकेज के आंकड़े जुटाने में मान सकते हैं। यदि कोरोना वायरस के आपदाकाल में भी राष्ट्रीय आपदा कानूनों और केंद्र के असीमित विशेषाधिकारों का इस्तेमाल कर देश की मजबूर जमात को इंसाफ, राहत और आर्थिक मदद नहीं दी जा सकती, तो मान सकते हैं कि व्यवस्था ने आंखें मूंद रखी हैं और चेतना को सुन्न कर रखा है। वित्त मंत्री ने पैकेज की घोषणा करते हुए दावा किया है कि निर्माण मजदूरों को 50.35 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद देने की व्यवस्था की गई है। मनरेगा के तहत 40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है, जबकि करीब 61,000 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान पहले से ही है। सरकार मजदूरों का पूरा ख्याल रखे हुए है और राज्य सरकारों से मिलकर इंतजाम किए गए हैं। यदि गरीब कल्याण और आत्मनिर्भर भारत सरीखे शब्द सार्थक हैं, तो लाखों मजदूर सड़कों पर लावारिस-से क्यों हैं? कोरोना ने करीब 91,000 लोगों को संक्रमित कर दिया है। रविवार की सुबह तक 24 घंटों के दौरान करीब 5000 लोग नए मरीज बने हैं। यह एक दिन में अभी तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है, लेकिन औसत मजदूर के लिए यह खौफजदा नहीं है। अब उन महानगरों के माहौल उसे डराने लगे हैं, जिन्हें खुद मजदूरों ने आकार दिया था। नीतियों, घोषणाओं और यथार्थ के बीच कोई विरोधाभास जरूर है। हालांकि पुलिस और प्रशासन सड़क पर उतरे मजदूरों को समझाने-बुझाने में जुटे हैं। बसों और खाने-पीने, शेल्टर होम आदि की व्यवस्थाएं कर सरकारें घोषणाएं कर रही हैं, लेकिन मजदूर को भरोसा नहीं है। यदि प्रधानमंत्री के 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की पूरी घोषणाओं और उनके ब्योरों के बावजूद मजदूर भूखा रहता है और सड़कों पर पैदल चलता या साइकिल से ठेलता हुआ दिखता है, तो यह देश का दुर्भाग्य ही है। फिर कितनी भी सफाइयां दी जाती रहें।