Monday, April 06, 2020 05:25 PM

क्या राज्यपाल सिर्फ ‘मूकदर्शक’

फिलहाल संदर्भ मध्य प्रदेश का है। राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को एक और चिट्ठी भेजकर आदेश दिया था कि मंगलवार,17 मार्च को सदन में बहुमत साबित करें। यदि ऐसा नहीं किया जाएगा, तो सरकार को अल्पमत में माना जाएगा। दूसरी तरफ  स्पीकर प्रजापति ने कोरोना वायरस से उपजे संकट के मद्देनजर विधानसभा की कार्यवाही को 26 मार्च तक स्थगित किया था। तीसरा आयाम सर्वोच्च न्यायालय के भीतर का है, जहां भाजपा नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पीकर के फैसले को चुनौती दी है और कमलनाथ सरकार को अल्पमत में माना है, लिहाजा, सिरे से विश्वास मत हासिल करने की मांग की है। स्थिति संवैधानिक पेंच वाली है। कांग्रेसी प्रवक्ता और समर्थकों की दलील है कि राज्यपाल स्पीकर को आदेश या निर्देश नहीं दे सकते। उस संदर्भ में शीर्ष अदालत के कुछ पुराने फैसलों का उल्लेख किया गया है। फिलहाल हम सर्वोच्च अदालत के नए फैसले की बात या व्याख्या नहीं करते। संभव है कि जब आप यह संपादकीय पढ़ें, तब तक राज्यपाल, मुख्यमंत्री, स्पीकर और बहुमत परीक्षण से जुड़ी गुत्थियां खुल जाएं, लिहाजा उनका विश्लेषण बाद में करेंगे। फिलहाल राज्यपाल और स्पीकर के संवैधानिक पदों की मीमांसा करते हुए कुछ सवाल उठाएंगे कि क्या राज्यपाल सिर्फ  सजावटी और मूकदर्शक है? क्या स्पीकर में ही तमाम शक्तियां निहित हैं? क्या राज्यपाल एक थका हुआ चेहरा मात्र है, जो सरकार को शपथ ही दिला सकता है? दरअसल हमने कुछ संविधान विशेषज्ञों और दो पूर्व राज्यपालों से बात की और संवैधानिक पेंचों को खोलने की कोशिश की है। दरअसल राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री को मनोनीत करते हैं और नियुक्ति भी करते हैं। वह विधानसभा में शक्ति परीक्षण के लिए मुख्यमंत्री को आदेश दे सकते हैं। सदन में अविश्वास प्रस्ताव की नौबत तब आती है, जब कोई सरकार बहुमत साबित कर चुकी हो और बाद में वह विश्वास खो दे। राज्यपाल को अधिकार है कि यदि सरकार बहुमत प्रस्ताव साबित करने से इंकार करती है या किसी भी स्तर पर टालमटोल किया जाता है, तो राज्यपाल सरकार को बर्खास्त कर केंद्र सरकार को सूचना भेज सकते हैं। अपरिहार्य हालात में राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा भी कर सकते हैं। राज्यपाल और स्पीकर के दरमियान अधिकारों का टकराव नहीं है। यह आदेश राज्यपाल का ही होता है कि सरकार इतने दिनों में बहुमत साबित करे। यह दीगर है कि सदन के भीतर की प्रक्रिया स्पीकर ही तय करते हैं। कुछ मामले ऐसे भी आ चुके हैं, जिनमें स्पीकर एक 'मूकदर्शकÓ साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा का 22-23 फरवरी, 1998 का मामला ऐसा ही है, जब एक तरफ  कल्याण सिंह खड़े थे, तो दूसरी ओर जगदंबिका पाल खड़े थे। बहुमत परीक्षण की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के पर्यवेक्षक की देखरेख में सम्पन्न की गई। पूरे घटनाक्रम की वीडियोग्रॉफी भी की गई। अमूमन ऐसा होता नहीं है। कुछ दलीलें दी गई हैं कि यदि स्पीकर अड़ जाएं, तो राज्यपाल, मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री भी कुछ नहीं कर सकते। संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी 'तानाशाहीÓ की कोई गुंजाइश नहीं है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति निष्ठा होने के बजाय स्पीकर पार्टी के प्रति वफादार दिखाई दिए हैं, लिहाजा उनकी भूमिका सवालिया है। स्पीकर सदन में 10वीं अनुसूची के 'संरक्षकÓ माने जाते हैं, लिहाजा अपेक्षा रहती है कि वह दलबदल विरोधी कानून को सख्ती से लागू करें। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफे दिए थे। उनमें छह मंत्री पदों पर थे। स्पीकर ने उनके इस्तीफे मंजूर कर लिए, लेकिन शेष 16 के इस्तीफे विचाराधीन हैं। सरकार बहुमत का जुगाड़ कर सके, लिहाजा 10 दिन के लिए सदन स्थगित कर दिया। इतनी अवधि संवैधानिक लोकतंत्र में बहुत पर्याप्त होती है। सर्वोच्च अदालत तो बहुमत परीक्षण के लिए 2-4 दिन देना भी काफी समझती है, क्योंकि विधायकों की टूट-फूट की संभावनाएं बनी रहती हैं। बागी विधायकों का अपहरण नहीं किया गया है। अपनी मर्जी से उन्होंने पालाबदल किया है। यह निर्णय स्पीकर को लेना है कि दलबदल कानून के तहत कार्रवाई करें। मध्य प्रदेश स्पीकर ने ऐसा क्यों नहीं किया या विधायकों को उनके सामने उपस्थित होने का वक्त क्यों नहीं तय किया? यहां उनकी तटस्थता सवालिया होने लगती है। बहुमत परीक्षण को टालने के लिए सदन को स्थगित करना सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांत का ही उल्लंघन है। राज्यपाल को 'गूंगा गुड्डाÓ नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह राज्य के संवैधानिक मुखिया होते हैं। इसके भी कुछ मायने होते होंगे!