Tuesday, August 20, 2019 01:22 PM

क्या 370 सांप्रदायिक था?

मणिशंकर अय्यर को जम्मू-कश्मीर के हालात फिलिस्तीन जैसे लगते हैं। उनका मानना है कि जिस तरह फिलिस्तीन में लोगों के मूल अधिकार छीन लिए गए थे, उसी तरह कश्मीर में किया जा रहा है। मणिशंकर तकनीकी तौर पर कांग्रेस में हैं अथवा नहीं हैं, लेकिन हम उन्हें सोच और संस्कारों से कांग्रेसी ही मानते हैं। पी.चिदंबरम तो फिलहाल राज्यसभा में कांग्रेस सांसद हैं और पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य भी हैं। गांधी परिवार की करीबियत यह देश बखूबी जानता है। उनका मानना है कि अनुच्छेद 370 को हटाने की वजह ‘धर्म’ है। यदि जम्मू-कश्मीर हिंदू बहुल राज्य होता, तो भगवा पार्टी विशेष दर्जा नहीं छीनती। भाजपा ने ताकत से 370 को समाप्त किया। चूंकि जम्मू-कश्मीर मुस्लिम राज्य था, लिहाजा 370 को खत्म किया गया। क्या अनुच्छेद 370 कश्मीर में मुसलमानों के लिए ही लागू किया गया था? क्या 370 की व्यवस्था करने से पहले अवाम से पूछा गया था? इन सवालों के जवाब पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम से ही पूछे जाने चाहिए, क्योंकि उन्हीं की सत्ता के दौरान ‘हिंदू या भगवा आतंकवाद’ का जुमला उछाला गया था। कांग्रेस ने लंबे शासन के दौरान 370 को बरकरार रखा। चिदंबरम भी मुस्लिम-परस्त नेता माने जाते रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस महासचिव, सांसद और दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह की सोच भी मुस्लिम-परस्त रही है। हालांकि वह पार्टी के पक्ष में ठोस मुस्लिम वोट बैंक तैयार नहीं कर सके। उन्होंने भी बयान दिया है कि कश्मीर जल रहा है! कश्मीर भारत के हाथों से निकल न जाए! हकीकत यह है कि जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों ने बकरीद का पाक त्योहार बड़ी शिद्दत, अमन, भाईचारे के साथ मनाया है। यह 370 खत्म करने के बाद की पहली ईद थी। करीब 20,000 छात्रों ने ईद मनाई। एक भी गोली नहीं चली। छुटपुट घटनाओं को छोड़ कर कश्मीर शांत रहा। राज्यपाल के प्रवक्ता एवं प्रधान सचिव रोहित कंसल के इस बयान पर यकीन करें या न करें, लेकिन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का यथार्थ यही है। कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल हो सकती है , लेकिन पुराना राज्य मुस्लिम बहुल नहीं कहा जा सकता। जम्मू और लद्दाख के हिंदुओं और बौद्धों की गिनती कौन खारिज कर सकता है? बेशक शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के लिए ‘विशेष दर्जा’ मांगा था। वह दर्जा ऐसे देश ने दिया था, जो खुद ‘धर्मनिरपेक्ष’ होने का दावा करता था। संविधान सभा की बैठकों में भी शेख अब्दुल्ला ने 370 की पैरवी की थी, लेकिन 370 का मुखर विरोध डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था। हालांकि आज के कुछ अधकचरे बौद्धिक डा.मुखर्जी की पैरोकारी की गलत व्याख्याएं करते रहे हैं। बहरहाल इतिहास को मत खंगालिए। यह 2019 के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने का वक्त है कि क्या 370 का प्रावधान हिंदू-मुस्लिम के लिए किया जा सकता था? यानी क्या 370 सांप्रदायिक भी हो सकता है? तो फिर संविधान में अनुच्छेद 370 के सामने ‘अस्थायी और संक्रमणकालीन’ क्यों लिखा गया था? बेशक कांग्रेस चिदंबरम, मणिशंकर, दिग्विजय सिंह आदि के बयानों को ‘निजी’ करार दे, लेकिन ये कांग्रेस के भी बयान हैं और देश ऐसी राजनीति को बखूबी समझता है। दरअसल कांग्रेस जानबूझ कर आत्मघाती होने पर आमादा है। इस सवाल का जवाब भी कांग्रेस से ही पूछना चाहिए कि उसे जम्मू-कश्मीर में 370 क्यों चाहिए? यह मसला संवैधानिक है अथवा सांप्रदायिक है? बेशक कश्मीर में अब भी कई पाबंदियां हैं, धारा 144 है, सड़कें  सुनसान ही रहती हैं, लेकिन जम्मू और लद्दाख के ज्यादातर इलाकों में फोन, इंटरनेट आदि चलने लगे हैं। वहां आम आदमी की सक्रियता क्यों है? क्योंकि वहां अफवाहें फैलाने वाले अलगाववादी तत्त्व बहुत कम हैं। गृह मंत्रालय को हुर्रियत नेता गिलानी समेत आठ लोगों के ट्विटर अकाउंट बंद करने की सिफारिश क्यों करनी पड़ी है? क्योंकि वे पाकिस्तान के इशारे पर नाचने के आदी हैं। ऐसे घोर संवेदनशील समय में अफवाहें किसी भी हद तक अराजक स्थितियां पैदा कर सकती हैं। बहरहाल नए कश्मीर का स्वागत करना चाहिए और कुछ वक्त दिया जाना चाहिए, क्योंकि वही राष्ट्रहित में होगा। कुछ अंतराल के बाद देश के राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की परिस्थितियों का पोस्टमार्टम करें और आकलन करें कि 370 हटाए जाने के बाद कितना विकास और बदलाव हुआ है? कितना सांप्रदायिक साबित हुआ है? तब तक अनर्गल अलाप खामोश रखा जाना चाहिए।