Saturday, November 17, 2018 12:15 AM

क्यों लुढ़क रहा है हमारा रुपया

डा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

रुपए के मूल्य गिरने का तीसरा कारण कच्चे ईंधन, तेल के बढ़ते दाम और बढ़ती मांग है। सरकार ने मेक इन इंडिया को प्रोत्साहन और देश में मेन्युफैक्चरिंग के विस्तार का प्रयास किया है। मेन्युफैक्चरिंग में ऊर्जा का उपयोग ज्यादा होता है। मेन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के साथ-साथ ईंधन तेल की खपत भी बढ़ रही है। इसका उपाय है कि हमें सेवा क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए। साफ्टवेयर बनाने, विदेशी भाषाओं में अनुवाद करने, कानूनी रिसर्च करने जैसे कार्यों को प्रोत्साहन देना चाहिए। यदि हम सेवा क्षेत्र से अपनी आय को अर्जित करेंगे, तो उसमें ऊर्जा की जरूरत कम होगी...

रुपए का मूल्य गिर रहा है। कई वर्षों से रुपए का मूल्य लगभग 64 रुपए प्रति डालर था, जो इस समय घटकर लगभग 70 रुपए प्रति डालर हो गया है। रुपए का यह मूल्य हमारे विदेशी मुद्रा बाजार में निर्धारित होता है। यह बाजार एक मंडी सरीखा है। मंडी में आलू का दाम इस बात पर निर्भर करता है कि विक्रेता कितने हैं और खरीददार कितने हैं। इसी प्रकार रुपए का दाम विदेशी मुद्रा बाजार में इस बात पर निर्भर करता है कि डालर की सप्लाई कितनी है और डिमांड कितनी है। जब विदेशी मुद्रा बाजार में डालर की सप्लाई अधिक हो जाती है, तो डालर के दाम गिरते हैं और तदानुसार रुपए का दाम ऊंचा होता है। इसके विपरीत जब विदेशी मुद्रा बाजार में डालर की डिमांड बढ़ जाती है, तो डालर का दाम बढ़ जाता है और तदानुसार रुपए का दाम गिरता है, जैसा कि वर्तमान में हो रहा है। रुपए के मूल्य की गिरावट के कारण जानने के लिए हमें देखना होगा कि डालर की सप्लाई कम क्यों है और डिमांड ज्यादा क्यों है। पहले सप्लाई को लें। डालर की सप्लाई का प्रमुख स्रोत हमारे निर्यात हैं। हमारे उद्यमी जब इलेक्ट्रोनिक उपकरण अथवा गलीचे का निर्यात करते हैं, तो विदेशी खरीददार उसकी पेमेंट डालर में करते हैं। हमारे निर्यातक इन डालर को हमारे विदेशी मुद्रा बाजार में बेचते हैं और इनके बदले रुपए खरीदते हैं। डालर की सप्लाई कम होने का प्रमुख कारण यह है कि हमारे निर्यात कम हो रहे हैं। इसलिए निर्यातकों द्वारा कम मात्रा में डालर अर्जित किए जा रहे हैं और निर्यातों के माध्यम से डालर की सप्लाई कम है। डालर की सप्लाई कम होने का दूसरा कारण विदेशी निवेश में गिरावट है।

विदेशी निवेश डालर को भारतीय मुद्रा में बेचकर रुपए में बदलते हैं और तब उस रुपए का भारत में निवेश करते हैं। जनवरी से अप्रैल 2017 में विदेशी निवेशकों ने 1400 करोड़ डालर का भारत में निवेश किया था। जनवरी से अप्रैल 2018 में यह रकम गिरकर मात्र 30 करोड़ रह गई है। इसलिए विदेशी निवेश से डालर की सप्लाई कम आ रही है। डालर की डिमांड ज्यादा होने का एक और कारण यह है कि भारत से अमीर लोग पलायन कर रहे हैं। वे भारत की नागरिकता छोड़कर अपनी पूंजी को भारत से दूसरे देशों में ले जा रहे हैं और वहां की नागरिकता स्वीकार कर रहे हैं। इस कार्य के लिए भी वे रुपए को विदेशी मुद्रा बाजार में जमा करके डालर खरीद रहे हैं।

दूसरी तरफ हमारे विदेशी मुद्रा बाजार में हमारे डालर की डिमांड बढ़ रही है। इसका एक कारण कच्चे ईंधन तेल के दाम में वृद्धि है। अमरीका में अर्थव्यवस्था तीव्र गति से बढ़ रही है। इससे अमरीका में तेल की डिमांड बढ़ रही है और विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम 60 रुपए प्रति बैरल से बढ़कर वर्तमान में 80 रुपए प्रति बैरल हो गया है। इसी क्रम में हमारे दूसरे आयातों में भी वृद्धि हो रही है। चीन से खिलौने, फुटबाल आदि का आयात भारी मात्रा में हो रहा है। इन आयातों के लिए हमारे आयातक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपए जमा करते हैं और डालर खरीदते हैं। आयातकों द्वारा रुपए ज्यादा मात्रा में हमारे विदेशी मुद्रा बाजार में जमा किए जा रहे हैं और तदानुसार डालर की डिमांड बढ़ रही है। सारांश है कि हमारे निर्यात और विदेशी निवेश कम होने से डालर की सप्लाई कम हो रही है, जबकि ईंधन, तेल तथा अन्य माल के आयात बढ़ने से डालर की डिमांड बढ़ रही है। इस असंतुलन के कारण डालर का मूल्य बढ़ रहा है और तदानुसार रुपया फिसल रहा है। इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या किया जाए? मुख्य विषय निर्यातों में कमी और आयातों में वृद्धि का है। विश्व बैंक के एक अधिकारी के अनुसार भारत में उत्पादन की लागत ज्यादा होने के तीन कारण हैं। पहला कारण शिक्षा का है। हमारी यूनिवर्सिटियों द्वारा दी जा रही शिक्षा अनुपयोगी है। इसका उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करके सरकारी नौकरी हासिल करने का हो गया है। वर्तमान में शिक्षा पर किया जा रहा खर्च मुख्यतः निष्प्रभावी सरकारी टीचरों को भारी वेतन देने में खप रहा है। समाधान है कि शिक्षा बजट को सभी छात्रों के बीच में वाउचरों के माध्यम से वितरित कर दिया जाए। छात्र इन वाउचरों से प्राइवेट अथवा सरकारी संस्थान में शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। ऐसा करने से अच्छे शिक्षा संस्थानों को वाउचर ज्यादा मिलेंगे और शिक्षा में सुधार हो जाएगा। दूसरा कारण बताया गया कि भारत में धंधा करना कष्टप्रद है। इसका मुख्य कारण यह दिखता है कि भारत सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी तथा इनकम टैक्स नोटिसों द्वारा उद्यमियों में एक भय का वातावरण बना दिया है। आज देश की भ्रष्ट नौकरशाही को ईमानदार माना जा रहा है और जो उद्यमी श्रम करके पैसा कमाता था, उसे चोर कहा जा रहा है। उद्यमियों में उत्साह नहीं है कि वे निवेश करें। इसलिए देश में उत्पादन कम हो रहा है और हमारे निर्यात कम और आयात ज्यादा हो रहे हैं। तीसरा कारण अपने देश में श्रम की उत्पादकता है। जानकार बताते हैं कि एक ही प्रकार की मशीन से चीन में श्रमिक भारत की तुलना में दोगुना माल का उत्पादन करते हैं। अपने देश में श्रमिकों के हित को साधने के लिए इतने जटिल श्रम कानून बना दिए गए हैं कि श्रमिकों से कार्य लेना लोहे के चने चबाने जैसा हो गया है। समाधान है कि श्रम कानूनों को सरल बनाया जाए और साथ में उन उद्योगों को इंसेंटिव (प्रोत्साहन) दिया जाए, जो कि अधिक मात्रा में श्रमिकों को रोजगार देते हैं। ऐसा करने से देश में श्रम की उत्पादकता भी बढ़ेगी और रोजगार भी बढ़ेंगे। डालर की सप्लाई कम होने का एक कारण विदेशी निवेश का कम आना है। यह एक अच्छी उपलब्धि है। विदेशी निवेश से मिली रकम का उपयोग मुख्यतः सरकार द्वारा फिजूलखर्ची के लिए किया जाता है। इस खर्च को वहन करना होगा। रुपए के मूल्य गिरने का तीसरा कारण कच्चे ईंधन, तेल के बढ़ते दाम और बढ़ती मांग है। सरकार ने मेक इन इंडिया को प्रोत्साहन और देश में मेन्युफैक्चरिंग के विस्तार का प्रयास किया है। मेन्युफैक्चरिंग में ऊर्जा का उपयोग ज्यादा होता है। इसलिए मेन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के साथ-साथ ईंधन तेल की खपत भी बढ़ रही है।

इसका उपाय यह है कि हमें सेवा क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए। साफ्टवेयर बनाने, विदेशी भाषाओं में अनुवाद करने, कानूनी रिसर्च करने जैसे कार्यों को प्रोत्साहन देना चाहिए। यदि हम सेवा क्षेत्र से अपनी आय को अर्जित करेंगे, तो उसमें ऊर्जा की जरूरत कम होगी। तदानुसार कच्चे ईंधन तेल का हमें आयात कम करना पड़ेगा। वर्तमान में रुपए की गिरावट किसी अंतरराष्ट्रीय घटना के कारण नहीं है। रुपए की गिरावट मूलतः सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों के कारण है। सरकार को अपनी नीतियों में सुधार करना होगा, अन्यथा आने वाले समय में हमारे रुपए पर और भी संकट गहरा सकता है।

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