खाद्यान्न की गुणवत्ता में कब होगा सुधार  

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

सरकार की ओर से खाद्य वस्तुओं के टेंडर न होने का हवाला देकर हर महीने लोगों को पर्याप्त सामान नहीं मिल पा रहा है। विक्रेता चीनी कोटे को अपनी मनमर्जी से कम करके सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं। रिफाइंड तेल की बजाय अत्यधिक मस्टर्ड आयल को ही तवज्जो देने की जरूरत है। सोसायटी में जब तक राशन कार्ड की एंट्री मेनुअल की जाती रही तब तक वस्तुओं को लिए जाने में लोगों को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता था। अब राशन कार्ड की एंट्री बायोमीट्रिक मशीनों पर की जाने लगी हे तो लोगों को घंटों खड़े होकर सामान लेने के लिए मजबूरन इंतजार करना पड़़ता है...

कृषि सहकारी सभाओं में मिलने वाली खाद्य वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार किए जाने की जरूरत है। पैकेट बंद दालों के लिफाफों के बीच मरे हुए चूहों का मिलना, कंकरीट और कचरा मिलना आम बात है। बंद पैकेट की दाल लिफाफों में मेन्युफेक्चरिंग डेट, एक्सपायरी की कोई तारीख अंकित न किया जाना लोगों में असमंजस की स्थिति पैदा करता है। कोल्ड स्टोरों में दालें कई सालों तक रखी जाती  है जिसके चलते उनमें नमी सूखने की वजह से पौष्टिकता की कमी आना स्वाभाविक बात है। सोसायटी में वितरित किया जाने वाला आटा भी सही न होने की वजह से सरकार खुद उसमें बदलाव किया जाने का मन बना चुकी है। सोसायटियों में सप्लाई किया जाने वाला चावल भी इतना पुराना होता है कि उनमें से सफेद रंग का पाउडर तक निकलना शुरू हो जाता है। लोगों का मनना है कि पुराने चावल अकसर उबलकर ज्यादा फूल जाते हैं। ठीक यही वजह की लोग भंडारे और दूसरे शादी समारोह में इन्हीं चावलों का उपयोग ज्यादा करते जा रहे हैं।

पालिश किए चावल बाजारों में बेचे जाने का ट्रेंड चल पड़ा और यह मात्र थोड़े से खाने पर ही पेट फूलकर रह जाता है। केमिकल युक्त चावलों को अगर कई सालों बाद पकाया जाए तो उसमें न्यूट्रिशन की मात्रा भी हो सकती है, गौर करना होगा। सरकार की ओर से खाद्य वस्तुओं के टेंडर न होने का हवाला देकर हर महीने लोगों को पर्याप्त सामान नहीं मिल पा रहा है। विक्रेता चीनी कोटे को अपनी मनमर्जी से कम करके सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं। रिफाइड तेल की बजाय अत्यधिक मस्टर्ड आयल को ही तवज्जो देने की जरूरत है। सोसायटी में जब तक राशन कार्ड की एंट्री मेनुयल की जाती रही तब तक वस्तुओं को लिए जाने में लोगों को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता था।

अब राशन कार्ड की एंट्री बायोमेट्रिक मशीनों पर की जाने लगी तो लोगों को घंटों खड़े होकर सामान लेने के लिए मजबूरन इंतजार करना पड़ता है। दूर संचार कंपनियों के सिग्नल हवाओं के झोंके की तरह आने से बायोमीट्रिक मशीनों बराबर काम नहीं कर रही हैं। नतीजन एक राशन कार्ड की एंट्री करने में ही बहुत ज्यादा समय लग जाता है। सोसायटियों के बाहर इसी वजह से शाम तक भीड़ देखने को मिलती है। सोसायटियां भी भ्रष्टाचार का अड्डा बनी रही यह बात किसी से  छुपी नहीं है। मिट्टी तेल का सरेआम अवैध रूप से बेचा जाने से कोई अनजान नहीं है। अब भी सरकारी राशन बड़े पैमाने पर बाहरी राज्यों में बेचा जा रहा है और सरकारें जानबूझ कर बेखबर बनी हुई हैं। सोसायटी विक्रेता जनता से बायोमीट्रिक मशीन पर अंगूठे का निशान बतौर सामान की आदायगी किए जाने की एवज में लोगों से लगवा लेते हैं। मगर बदले में जनता को अपनी मनमर्जी से खाद्य वस्तुएं वितरीत किया जा रहा हैं। प्रदेश सरकार ने इस लूट को खत्म करने के लिए एक सतर्कता कमेटी बनाए जाने की घोषणा की थी, मगर यह कमेटी कब धरातल पर काम करके जनता को राहत पहुंचाएगी कोई नहीं जानता है। जनता के पैसों से चलाई जाने वाली कृषि सहकारी सभाएं अधिकतर घाटे में क्यों चलती हैं। खाद्य आपूर्ति विभाग कर्मचारियों और कृषि सहकारी सभाओं कमेटियों की आपसी खींचातानी के चलते ग्रामीण लोगों को अपने शेयरों का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। सच्चाई तो यह कि सोसायटियां जहां गबन राशि की मार झेल रही है, वहीं कमेटियों का चुनाव भी राजनीतिक अखाड़ा बनकर रह चुका है। ग्रामीण जनता कृषि सहकारी सभाओं में अपना पैसा शेयर के रूप में लगाती है। जनता की सोच यही रहती है कि अगर सोसायटी मुनाफे में रहेगी तो उन्हें भी इसका कुछ प्रतिशत हिस्सा लाभ के रूप में मिलेगा। सोसायटी का कामकाज कमेटी सचिव और विक्रेता को देखना होता है।

खाद्य आपूर्ति और सहकारिता विभाग कमेटियों को सारी शक्तियां प्रदान कर देता है जिससे वह आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। सोसायटी से लिए जाने वाले कर्जे पर बेतहाशा ब्याज वसूला जाता है। अत्यधिक ब्याज होने की वजह से जनता एक तो इनसे कर्जा लिए जाने से सदैव कतराती रहती है। कमेटियों ने कामकाज चलाने के लिए क्षेत्रीय बैंकों से कर्जा तो वसूल कर लिए मगर विक्रेताओं और सचिवों ने इस पैसे का गलत इस्तेमाल करके कृषि सहकारी सभाओं को डुबोकर रख दिया है। कृषि सहकारी सभाओं की कमेटियों को लेकर भी लोगों में पैसे गबन किए जाने को लेकर पुलिस थानों तक में रिपोर्ट दर्ज करवा रखी हैं। कृषि सहकारी सभाओं की कमेटियां नियमों को ताक पर रखकर विक्रेताओं का चयन करती जा रही हैं। कमेटियां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को बतौर विक्रेता काम करने के लिए अधिकृत करती जा रही हैं। प्रदेश सरकार की ओर से जनता के लिए क्या खाद्य सामग्री भेजी जा रही कोई सही जानकारी नहीं  मिलती है।

उचित मूल्य की दुकानों पर सस्ते दामों की आड़ में अन्य सामान भी लोगों को थमाया जा रहा है। दालों से कहीं अधिक पैकेट लोगों को नमक के पकड़ा कर उनसे भद्दा मजाक किया जा रहा है। सोसायटियों के कामकाज में सुधार किए जाने की सरकारों को बहुत गुंजाइश है। वैसे तो सरकारों ने इनकी देख-रेख का जिम्मा दो विभागों के कंधों पर छोड़ रखा है। क्या कभी किसी अधिकारी को सार्वजनिक रूप में जनता की समस्याओं को सुनते हुए किसी  विक्रेता पर शिकंजा कसा गया हो। सच्चाई तो यह हर साल सोसायटियों का आडिट करवाया जाता है। आडिट कर्ता कुछ इश्यु भी ढूंढ़ ही लेता है, मगर चढ़ावा चढ़ने तदोपरांत कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।

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