Saturday, September 22, 2018 11:02 AM

गंगा पर मनमोहन और मोदी

डा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दायर की गई एक याचिका में केरल सरकार ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इस संस्तुति के अनुसार पर्यावरणीय प्रवाह छोडऩे की शर्त लगाई जा रही है। इसके सामने चार साल बीत जाने के बाद भी वर्तमान में चल रहे जल विद्युत परियोजना जैसे टिहरी, विष्णुप्रयाग इत्यादि से 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोडऩे के प्रति मोदी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। आज भी श्रीनगर, टिहरी और विष्णुप्रयाग परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण के लिए पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। गंगा पर ढुलाई करने की योजना बहुत पुरानी है, लेकिन मनमोहन सिंह ने भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं लिया था...

मनमोहन सिंह कहा करते थे कि गंगा मेरी मां है। प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के शीघ्र बाद नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि ‘गंगा ने मुझे बुलाया है, अब हमें गंगा से कुछ भी लेना नहीं, बस देना ही है’। आइए अब देखें इन्होंने अपने-अपने कार्यकाल में गंगा के लिए क्या किया है। टिहरी बांध का निर्माण नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू हुआ था। इसके बाद वाजपेयी की सरकार 1999 में सत्ता में आई और उस समय प्रश्न उठा कि क्या गंगा पर बांध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस विषय पर तथा टिहरी की भूकंप संबंधी संभावनाओं को देखने के लिए मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में वाजपेयी ने एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने भूगर्भीय दृष्टिकोण से टिहरी को हरी झंडी दे दी। गंगा की आध्यात्मिक शक्ति के विषय में कमेटी ने कहा कि 4 इंच की एक पाइप बांध में डाल दी जाएगी, जो गंगा की अविरलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगी। चार इंच के पाइप से झील में सडऩे वाले पानी निकालने को अविरलता मान लिया गया। वाजपेयी सरकार यह भूल गई कि अविरलता की जरूरत इसलिए होती है कि झील में रुका हुआ पानी सडऩे लगता है और उसकी आध्यात्मिक शक्ति खत्म हो जाती है। बांध के अवरोध से मछलियां भी आवाजाही नहीं कर पाती और कमजोर हो जाती हैं। टिहरी बांध के ऊपर अब महसीर मछली नहीं पाई जाती है। मछलियां ही पानी में बहने वाली गंदगी को साफ करती हैं। मछलियों के कमजोर हो जाने से पानी की गुणवत्ता में गिरावट आती है।

गंगा के लिए समर्पित सानंद स्वामी डा. जीडी अग्रवाल, पूर्व प्रोफेसर, आईआईटी कानपुर, का कहना है कि मुरली मनोहर जोशी की इस रिपोर्ट के बाद ही टिहरी के ऊपर लोहारी नागपाला, भैरव घाटी और पाला मनेरी के बांधों को भी शुरू करने का क्रम हुआ। उनका मानना है कि भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने जब मान लिया कि बांध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास नहीं होगा, तब गंगा पर दूसरे बांधों को बनाने का रास्ता खुल गया। यद्यपि जोशी रिपोर्ट मूलत: टिहरी बांध के विषय में थी, परंतु इसका दीर्घकालिक प्रभाव हुआ और गंगा के ऊपर अन्य परियोजनाएं भी शुरू हो गईं। मनमोहन सिंह ने 2009 में ‘नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथारिटी’ का गठन किया। इस अथारिटी में दस विशेषज्ञ सदस्यों को पूर्ण सदस्य बनाया गया था। इन सदस्यों में राशिद सिद्दकी, सुनीता नारायण, राजेंद्र सिंह, बीडी त्रिपाठी, आरके सिन्हा जैसे गंगा के ऊपर श्रद्धा से काम करने वाले व्यक्ति सम्मिलित थे। वर्ष 2016 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस अथारिटी के पुराने प्रारूप को निरस्त करके नया प्रारूप जारी किया, जिसमें अथारिटी के सदस्य केवल मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रह गए और व्यवस्था की गई कि एक्सपट्र्स से चर्चा की जा सकती है। गंगा के बारे में जानकार लोगों का पद सदस्य से घटकर केवल मांगे जाने पर सुझाव देने का ही रह गया। जहां तक चर्चा का सवाल है वह, तो कभी भी की ही जा सकती है। प्रारूप में इसे कहना उसी प्रकार है, जैसे कहा जाए कि सूर्य पूर्व में निकलता है।

सानंद स्वामी के अनशन के फलस्वरूप मनमोहन सिंह ने गंगा की मुख्य सहायक धारा भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन जल विद्युत परियोजनाएं पाला मनेरी, भैरव घाटी और लोहारी नागपाला को निरस्त कर दिया था। इसके सामने मोदी की सरकार के प्रमुख मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि उनका प्रयास रहेगा कि बंद हुई परियोजनाओं को पुन: शुरू किया जाए। मनमोहन सिंह की सरकार ने सात आईआईटी के कंसोर्टियम को गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान बनाने का कार्य दिया था। आईआईटी ने यह प्लान बनाकर जनवरी, 2015 में केंद्र सरकार को सौंप दिया है। इस प्लान में कहा गया है कि गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए उसके प्रवाह के बहाव की निरंतरता बनाए रखना जरूरी है। आईआईटी ने कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए, जिससे गंगा की निरंतरता बाधित होती है, लेकिन आज सरकार इस रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं करती है और न ही इस पर कोई निर्णय लिया है। मनमोहन सिंह की सरकार ने गंगा के ऊपर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं पर विचार करने के लिए बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने निर्णय लिया कि जल विद्युत परियोजनाओं को 20 से 30 प्रतिशत पानी, पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में निरंतर छोडऩा होगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दायर की गई एक याचिका में केरल सरकार ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इस संस्तुति के अनुसार पर्यावरणीय प्रवाह छोडऩे की शर्त लगाई जा रही है। इसके सामने चार साल बीत जाने के बाद भी वर्तमान में चल रहे जल विद्युत परियोजना जैसे टिहरी, विष्णुप्रयाग, मनेरी भाली इत्यादि से 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोडऩे के प्रति मोदी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। आज भी श्रीनगर, टिहरी और विष्णुप्रयाग परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण के लिए पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। गंगा के ऊपर ढुलाई करने की योजना बहुत पुरानी है, लेकिन वर्ष 2014 तक मनमोहन सिंह ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं लिया था। नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद सितंबर 2014 में ही नेशनल वाटरवे की डीपीआर बनाने के लिए ठेकों का निमंत्रण जारी कर दिया गया। विश्व बैंक से लोन लिया और आज इस पर तेजी से कार्य हो रहा है।

जहां तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का विषय है, हमारी जानकारी में मनमोहन सिंह के समय में भी इनकी वैसी ही स्थिति थी, जैसी वर्तमान में है। यानि केंद्र सरकार द्वारा अच्छी रकम उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर ये प्रोजेक्ट नहीं चल रहे हैं। यद्यपि बनारस के लोगों का कहना है कि बीते कुछ समय में मोदी की सरकार के समय में गंगा का पानी कुछ साफ हुआ है, लेकिन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से गंगा में कूड़ा-कचरा रोकने का काम पहले जैसा ही चल रहा है। आईआईटी कंसोर्टियम ने सुझाव दिया था कि गंगा में जाने वाले गंदे पानी को साफ करके सिंचाई के उपयोग में लाया जाना चाहिए। यह रिपोर्ट नरेंद्र मोदी के समय दी गई थी, लेकिन इस पर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। अब पाठक स्वयं निर्णय करें कि वास्तव में कौन मां गंगा के प्रति कारगर है।

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