गणेशजी के स्वरूप का आध्यात्मिक रहस्य

गणेशजी के स्वरूप को देखकर अनेकों के खासकर नई पीढ़ी के मन में सवाल उठता है भला यह कैसे हो सकता है कि सिर हाथी का हो और बाकी शरीर मनुष्य का हो, लेकिन इसके पीछे बहुत गहरा रहस्य है। ईश्वर ने गणेशजी की रचना मनुष्यों को बहुत बड़ा संदेश देने के लिए की है। गणेशजी के पिता शिव हैं अर्थात परमात्मा का निराकार रूप।  बड़ा सिर बुद्धिमत्ता  का प्रतीक है और छोटी आंखें, दूरदर्शिता की प्रतीक हैं।  हाथी के कान सूप के समान होते हैं। सूप सार को रखकर कचरा बाहर फेंकता है। इसी प्रकार हमें भी व्यर्थ को भीतर नहीं आने देना है। सूंड शक्तिशाली पेड़ों को भी उखाड़ फेंकती है तथा फूल जैसे मुलायम सामान को भी उठा लेती है। बड़ा पेट, सभी तरह की बातों को अपने भीतर समा लेना। गणेशजी के चार हाथ दिखाए जाते हैं, जिनमें कमलपुष्प, फरसा, मोदक तथा आशीर्वाद की मुद्रा होती है। कमलपुष्प पवित्रता का प्रतीक है। फरसा अपने भीतर के अवगुणों, विकारों, आसुरी संस्कारों को हटाने का प्रतीक है। आशीर्वाद की मुद्रा यह संदेश देती है सदा सबका भला, कल्याण यही सोच बनी रहें। गणेशजी की सवारी मूषक (चूहा) दिखाई जाती है, जो हमारे मन का प्रतीक है।  गणेशजी के बैैठने की मुद्रा में एक पैर मुड़ा होता है तथा दूसरा धरती को छूता है अर्थात संसार में रहते हुए भी उससे ऊपर उठकर रहो। सभी प्राणियों में हाथी को सबसे बुद्धिमान माना जाता है इसलिए गणेशजी के सिर को हाथी का स्वरूप दिया गया है और तभी तो उन्हें बुद्धि का देवता भी कहा जाता है। आज आवश्यकता है कि उनके स्वरूप को सही अर्थों में जानकर उनके गुणों का अनुसरण किया जाए। केवल पूजा और विसर्जन तो अब तक करते आए हैं। अब उनके गुणों को भी जीवन में धारण करें, तो जीवन खुशहाल हो जाएगा। त्योहार मनाने का असली मकसद तभी सिद्ध होगा।

-नरेंद्र कौर छाबड़ा, औरंगाबाद

Related Stories: