गरीब-अमीर का बढ़ता फासला

कर्म सिंह ठाकुर

सुंदरनगर, मंडी

वैश्विक गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित 20 स्वतंत्र चैरिटेबल संगठनों के संघ ऑक्सफैम द्वारा जारी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक देश के शीर्ष एक फीसदी अमीरों ने पिछले साल प्रतिदिन 2200 करोड़ रुपए कमाए और उनकी संपत्ति में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि देश की 50 फीसदी आबादी की संपत्ति में महज तीन फीसदी की वृद्धि हुई है। एक तरफ गरीब दिन-प्रतिदिन गरीब होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ रईसों की संपत्ति दिन-दोगुनी, रात-चौगुनी वृद्धि कर रही है। देश का राजनीतिक नेतृत्व अपनी साख बचाने में लगा है तथा विपक्ष महागठबंधन की आड़ में अपने कर्मकांडों से बचने की युक्ति में लगा है। आज भारत के अधिकतर न्यूज चैनल इन रईसों या दुबई-लंदन में बैठे धनाढ्य वर्गों द्वारा संचालित होते हैं। जब चुनी हुई सरकार अंधी हो जाए, तो विपक्ष की भूमिका करोड़ों देशवासियों का सहारा बनती है, लेकिन भारत का दुर्भाग्य ही है कि यहां सब अपने स्वार्थ के जुगाड़ में एवं सत्ता के  लिए ही संघर्षरत रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में गरीब समुदाय वोटबैंक तथा भीड़ जुटाने तक ही सीमित रह गया है। सरकारें करोड़ों रुपए विज्ञापन, होर्डिंग, रैलियों के आयोजन, भाषणबाजी का साजो-सामान, आवागमन के साधन जुटाने के लिए पलभर में खर्च कर देती हैं, लेकिन गरीब और अमीर के बीच की खाई को पाटने वाली योजनाओं में कछुआ चाल प्रवृत्ति अपनाई जाती है। राजनीतिक सभाएं, विरोध रैलियां, महागठबंधन का निर्माण, आभार सभाएं 5जी की स्पीड से आयोजित होती हैं और गरीबों के उत्थान वाली योजनाएं आज भी 2जी की स्पीड से चल रही हैं। चुनी हुई सरकार लोकतंत्र में सबसे ज्यादा शक्तिशाली होती है। पलभर में प्रलय लाने की अथाह शक्ति भी रखती है। नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, सवर्ण आरक्षण इसके तत्कालीन उदाहरण हैं। गरीब शब्द आज भी राजनीतिक सभाओं को लुभाने का सबसे मजबूत हथियार बना हुआ है। सबसे पहले हमें गरीबी, बेरोजगारी, असहिष्णुता, असमानता, नकारात्मक सोच, अस्थिरता तथा अयोग्य राजनीतिक नेतृत्व को हटाना होगा। गरीबी के कलंक को सदा के लिए मिटाना होगा, तभी भारत विश्व गुरु या वैश्विक ताकत के रूप में उभर सकता है।

 

 

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