Thursday, December 03, 2020 06:37 AM

गांव में सभ्यता विमर्श खंगालने का समय

आत्मा रंजन

मो.-9818450763

कर्फ्यू के भीतर साहित्यिक जिंदगी-6

मन के ताले खोले बैठे साहित्य जगत के सृजन को कर्फ्यू कतई मंजूर नहीं। मुखातिब विमर्श की नई सतह पर और विराम हुई जिंदगी के बीचों-बीच साहित्य कर्मी की उर्वरता का कमाल है कि कर्फ्यू भी सृजन के नैन-नक्श में एक आकृति बन जाता है। ऐसे दौर को हिमाचल के साहित्यकारों, लेखकों और पत्रकारों ने कैसे महसूस किया, कुछ नए को कहने की कोशिश में हम ला रहे हैं यह नई शृांखला और पेश है इसकी छठी किस्त...

विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है। लॉकडाउन और कर्फ्यू का लंबा और अप्रत्याशित दौर चल रहा है। मानव और मानवता घोर संकट से घिरी है। विश्वयुद्ध से भी बदतर स्थिति कि जब हवाई, रेल, बस सेवाएं आदि तक सब ठप्प हैं। अचानक आए इस घोर संकटकाल ने मनुष्य की चेतना को ही झकझोर कर रख दिया है। संवेदनशील और विचारवान मनुष्य को सभ्यता विकास के तौर-तरीकों और अपनी जीवनचर्या के मूल प्रश्नों का ही जैसे पुनः संधान करने पर विवश कर दिया है। लोग घरों में घुसे रहने को अभिशप्त हैं। खूब चहल-पहल और उत्सव के शोर में डूबे रहने की आदी सड़कें और बाज़ार गहरे सन्नाटे में हैं। यह सन्नाटा मनुष्य के भीतर भी कहीं गहरे तारी है। लॉकडाउन शुरू होते-होते अपने गांव लौट आया मैं भी। लौटकर भिन्न दृश्य पाता हूं यहां भी। कुछ सुखद सा। गहराई से अहसास दिलाता हुआ कि दुख किस तरह हमें जोड़ता है। अपनों से और अपने से भी! गांव-पड़ोस में सभी अपने-अपने घर लौट आए हैं। पूरे परिवार सहित। शहर से पच्चीस-तीस किलोमीटर दूर के गांव। ज़्यादातर लोग नौकरी या काम-धंधे के सिलसिले में शिमला रहते हैं या सुबह जाते, शाम लौटते हैं। घरों में अकसर बुजुर्ग और महिलाएं ही।

एक दो दो ही लोग। लेकिन इन दिनों भरे पूरे परिवार हैं। तीन या चार पीढि़यों को इकट्ठे रहने-देखने का दुर्लभ दृश्य। कोई अपने खेत मुंडेरों पर उग आई कंटीली झाडि़यां साफ  कर रहा है, कोई पुश्तैनी घर आंगन की सफाई करता हुआ कहीं मरम्मत बारे सोच रहा है। सबसे ज़्यादा अकेलापन झेल रहे घरों के बुज़ुर्ग सबसे ज़्यादा खुश नज़र आ रहे हैं। सभी जैसे अपनी वर्तमान जीवन शैली से जुड़े प्रश्नों पर सोचते-विचारते, खंगालते-बतियाते हुए से...! दुख और चिंताओं से आच्छादित भी...। सचमुच दुख हमें जोड़ता है। सुख और खुशी के पलों में हम बाहर भागते-दौड़ते पाए जाते हैं अलबेले। लेकिन दुख के पलों में अपने घर, अपनों और अपनी ओर दौड़ सिमट आते हैं...। यह घरों में लौटने और घरों में ही रहने का समय है। हमारे आका भी यही कह रहे हैं बार-बार और हर कोई यही दोहरा रहा है! घरों में रहिए, सुरक्षित रहिए! जैसे हम मान कर चल रहे हैं कि सभी के पास एक अदद घर है और सुरक्षित रहने की ज़रूरी रसद भी। सोच रहा हूं उनका क्या जिनके अपने घर ही नहीं। लॉकडाउन में उनका क्या जिनकी रोज़ कमा कर रोटी चलती है...। वे इस हिदायत का क्या करें। उनके लिए यह पंक्ति संबोधित ही नहीं है। ढूंढ़ते रहिए उनके लिए इस आपदा में लगभग कोई पंक्ति संबोधित नहीं है। बहुत उथल-पुथल भरा समय है यह कोरोना काल। जीवन और मृत्यु के बीच चल रही भयंकर खींचतान। कहते हैं संकट और दुख में ही होती है असल परख और पहचान। बहुत कुछ दिखाए, सिखा और समझा रहा है कोरोना काल। अपनी-अपनी भूमिकाओं की बहस के बीच धर्म और विज्ञान अपनी भूमिकाओं की नज़ीर जैसे स्वयं पेश कर रहे हैं। सबसे बड़े पूजाघर और इबादतगाहों में ताले लटके हैं और अस्पताल ही मनुष्य की घोर पीड़ा और संकट निवारण में लगे हुए हैं। ऐसे में करोड़ों की लागत से मंदिर, मस्जिद या विशालकाय मूर्तियां बनाम अस्पताल बनाए जाने जैसी बहस भी जोरों पर है। वुहान की मांस मंडी के बहाने खान-पान की सीमा-मर्यादाओं और मनुष्य के जैव सह अस्तित्व और प्रकृति से खिलवाड़ पर भी आज एक ज़रूरी बहस हो रही है।

इस घोर विपत्ति से लड़ने में जिस तरह मात्र सरकारी क्षेत्र (स्वास्थ्य, पुलिस और सफाई कर्मी और संबंधित विभाग) ही कारगर लड़ाई लड़ रहा है, उससे अंधाधुंध निजीकरण के पैरोकार भी कुछ सकते में हैं और सबको लग रहा है कि सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र का बचा रहना कितना ज़रूरी है। और भी बहुत कुछ घट रहा है कोरोना समय में। महामारी के खिलाफ़  अवैज्ञानिक टोनों-टोटकों और धर्मांधता के लकदक दृश्य, बहुत जिम्मेदार लोगों के बहुत गैरजिम्मेदाराना बयान और व्यवहार! टीआरपी और सनसनी की छौंक में टीवी पर क्रिकेट स्कोर की तरह चल रही लाशों की गिनती। कोरोना की मूर्ति पूजा, कर्फ्यू बीच थालियां बजाती निकलती रैलियां, पटाखे फोड़ती भीड़, इबादतगाहें न छोड़ने के धर्मगुरुओं के जाहिलाना आह्वान, जान जोखिम में डाल सेवा कर रहे सिपाही के धर्मांधता की तलवार से कटते हाथ, विवेकी विज्ञान द्वारा जोड़ें जाते हुए भी...! सब मिलजुल कर जैसे इस कोरोना काल का एक कोलाज बना रहे हैं। रहनुमाओं की हांक पर अंधसमर्थन में बिना सोचे कुछ भी कहते और करते चले जाना लोकतंत्र का भीड़तंत्र और भीड़तंत्र का भेड़तंत्र में बदलते चले जाना भी कोरोना काल के शोकगीत में शुमार है। सचमुच यह सृजन से ज़्यादा चिंता और चिंतन का समय है। चिंता और चिंतन में संबल बनती हैं कुछ अच्छी किताबें। कुछ अच्छे रचनात्मक संवाद। बेतरतीब सा पढ़ना भी जारी है इन दिनों। और बहुत कम सा लिखना और कुछ संवाद भी। ऐसे ही रचनात्मक संवाद में कवि मित्र विनोद बिठ्टल कहते हैं कि ‘कोरोना काल से जूझ निकलने के बाद एक नई मानव सभ्यता का उदय होना चाहिए।’ ज़रूर होना चाहिए मित्र कवि। लेकिन जिस तरह महामारी के बीच भी हम हिंदू-मुस्लिम करने में डटे हैं, वह सब बेहतरी की हमारी उम्मीदों पर पानी सा फेरता प्रतीत हो रहा है। इसी समय में पालघर में साधुओं की लिंचिंग गहरे आहत करती है। और हैरत यह भी कि इस पर वे सब भी चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं जो पहले लिंचिंग को सही ठहरा रहे थे। लगातार गिरती लाशों और अवसाद की गंध के बीच अग्रज कथाकार एसआर हरनोट जी ठीक ही कहते हैं यह रचना के लिए बहुत मुफीद समय नहीं। सही है ऐसे माहौल में सृजन के लिए ज़रूरी रचनात्मक एकाग्रता बन नहीं पाती। कहने की गहरी ज़रूरत और दबाव में एक लंबी सी कविता इस बीच लिखी। लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच हज़ारों की संख्या में महानगरों से उमड़ते मज़दूरों के पैदल रेवड़ और उनकी बेचारगी लगातार कचोटती रही। भीतर की इस पीड़ा को साझा करने के प्रयास की तरह एक कविता। जिसे सोशल मीडिया पर बहुत से मित्रों ने (अपनी टिप्पणियों सहित भी) साझा किया। दिव्य हिमाचल के कहे अनुसार कि ताज़ा लिखे को कुछ उद्धृत करूं, इसी कविता की कुछ पंक्तियां यहां ज़रूर साझा करना चाहूंगा अंत में:

ठठरियों पर गठरियां लादे यह जनसैलाब/किसी पिकनिक पर नहीं निकला है मेरे कुलीन दोस्त/किसी विरोधी दल के आह्वान पर भी नहीं जुटा है ये जुटान/किसी रैली में ढोकर लाई गई किराए की भीड़ नहीं है ये/सड़क पर पसरी है मौत/यूं ही तो मौत के मुंह में नहीं झौंकता है कोई खुद को/इस जनसैलाब को समझो मेरे देश!/टीवी पर पसरे राम राज्य की मुग्धता के बीच/कहां समझा जा सकता है इसे!...लौट रहे हैं इस विपद समय में/सिर पर लादे दुख की गठरियां/तिरस्कारों दुत्कारों बीच/छपाते दबाते अपनी सिसकियां/पिराती देह और आत्मा संग/बुलेट ट्रेन रफ्तार वाले समय में/सैकड़ों मील पैदल पांव/यूं लुटे पिटे सा यह लौटना बदहाल/गांव से शहर होते निरंतर/हमारे सभ्यता विकास का/चरित्र भी है/और निष्कर्ष भी! उम्मीद की जानी चाहिए कि आपदा के इस विकट दौर से विश्व शीघ्र उबर पाएगा और इस भीषण संकट से उबरने के बाद हम कुछ बेहतर दुनिया और बेहतर मनुष्य समाज से रूबरू हो पाएंगे!