Sunday, November 18, 2018 07:07 AM

गीता रहस्य

स्वामी रामस्वरूप

ईश्वर के अनंत गुण हैं। यहां श्रीकृष्ण महाराज ने अक्षर एवं अव्यक्त यही दो गुण कहे हैं। अक्षर का अर्थ है जो कभी नाश नहीं होता। नाश वह नहीं होता जो कारण और कार्य से रहित अर्थात न तो वह किसी वस्तु आदि से बनता है न कोई उसे बनाता है और न ही उससे कोई पदार्थ बनाया जा सकता है...

श्रीकृष्ण महाराज ने इस अक्षर शब्द को वेदों से लेकर यहां प्रस्तुत किया है। यजुर्वेद मंत्र 40/8 में ईश्वर को अकायम कहा अर्थात उसका शरीर नहीं होता अतः वह उपयुक्त पुरुष है।

अवयक्त पद के भाव से युक्त कई वेदमंत्र चारों वेदों में है। यह अवयक्त शब्द भी श्रीकृष्ण महाराज ने वेदों से लिया है। प्रत्येक ऋषि-मुनि ने तप, स्वाध्याय करके वेदों के शब्दों को अपनी वाणी में लेकर प्रकट किया है और करना भी चाहिए, यही सत्य भी है।

ईश्वर के अनंत गुण हैं। यहां श्रीकृष्ण महाराज ने अक्षर एवं अव्यक्त यही दो गुण कहे हैं। अक्षर का अर्थ है जो कभी नाश नहीं होता। नाश वह नहीं होता जो कारण और कार्य से रहित अर्थात न तो वह किसी वस्तु आदि से बनता है न कोई उसे बनाता है और न ही उससे कोई पदार्थ बनाया जा सकता है।

भाव यह है कि ईश्वर कारण और कार्य रहित है। ईश्वर का कोई कारण नहीं है अर्थात वह किसी से नहीं बना है और न ही उसका कोई कार्य है अर्थात ईश्वर से आगे कभी कुछ नहीं बनता। केवल ईश्वर की चेतना शक्ति जड़ प्रकृति में कार्य करती है और प्रकृति से यह सारा संसार रच दिया जाता है। अव्यक्त का अर्थ है जो प्रकट नहीं होता, जो दिखाई नहीं देता। संपूर्ण वेदों में ईश्वर के यह भाव प्रकट किए गए हैं, परंतु यहां इस भाव को हम पुनः यजुर्वेद मंत्र 40/8 में देखें जो ‘ स्वयंभूः’ पद से उदधृत किए हैं।

स्वयंभू का अर्थ है अनादि अनंत जो किसी के द्वारा बनाया नहीं जाता और न ही उससे कोई पदार्थ बन सकता है। यह निराकार परमेश्वर जन्म-मरण में नहीं आता।

इसको यहां ‘परमाम गतिम’, ‘परमाम-धाम’ से वर्णन किया गया है। इस अक्षर अव्यक्त ब्रह्म को ही प्राप्त करके साधक सर्वोत्तम पद जो मोक्ष का पद है, उसे प्राप्त कर लेता है और जैसा कि श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 8/21 में कहा ऐसा मोक्ष प्राप्त साधक ‘ न निवर्तंते’ पुनः जन्म-मृत्यु में वापस नहीं लौटता।

अतः वेदों और श्रीकृष्ण महाराज, ऋषि-मुनियों जैसी असंख्य विभूतियों ने इस एक अक्षर, अव्यक्त, जो निराकार ब्रह्म है उसकी वेदानुसार यज्ञ में स्तुति, प्रार्थना, उपासना, वेद मंत्रों के द्वारा करने को कहा है। सभी महान पुरुषों का परम धाम भी अक्षर ब्रह्म है।