Monday, August 10, 2020 10:35 AM

गृहमंत्री पर अमरीकी पाबंदी

नागरिकता संशोधन बिल को लेकर एक अमरीकी आयोग ने बड़ी तीखी और अनावश्यक टिप्पणी की है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के अमरीकी आयोग ने अपनी सरकार से आग्रह किया है कि यदि नागरिकता बिल भारतीय संसद के दोनों सदनों में पारित हो जाता है, तो भारत सरकार के गृहमंत्री अमित शाह और अन्य प्रमुख नेतृत्व पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। अमरीका की हैसियत और भारत के गृहमंत्री पर प्रतिबंध! आश्चर्य ही नहीं, अनावश्यक भी है। यह आयोग अमरीका की संघीय सरकार ने 28 अक्तूबर,1998 को गठित किया था। आयोग में सिर्फ 15 कर्मचारी  हैं और मुख्यालय वाशिंगटन डीसी में है। आयोग ने बिल को गलत दिशा में बढ़ाया गया एक खतरनाक कदम करार दिया है और भारत की उदार, धर्मनिरपेक्ष परंपराओं तथा संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ माना है। लगभग वही आरोप हैं, जो भारतीय विपक्ष के हैं। हालांकि आयोग का अधिकार-क्षेत्र अमरीका ही है, लेकिन वह अपनी ‘दादागीरी’ भारत जैसे ताकतवर देश पर भी आजमाना चाहता है। हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति या प्रशासन ने इस संदर्भ में कोई बयान नहीं दिया है या कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी है, लेकिन भारत सरकार ने इसे फिजूल का हस्तक्षेप मानते हुए अमरीकी आयोग की निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने पलटवार करते हुए कहा है कि आयोग का पुराना टै्रक रिकार्ड सभी जानते हैं। यह टिप्पणी और मांग सही नहीं है और न ही वांछित है। नागरिकता बिल और एनआरसी किसी भी धर्म के भारतीय नागरिक से उसकी नागरिकता नहीं छीनते हैं। अमरीकी आयोग ने इस संदर्भ में अपने पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण रवैये से निर्देशित होना चुना है, जिस पर उसका ज्ञान बेहद सीमित है और उसका कोई अधिकार-क्षेत्र भी नहीं है। दरअसल अमरीकी आयोग को भारतीय नागरिकता कानून की जमीनी पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं है, लिहाजा बयान खंडित होना चाहिए था। गंभीर सवाल यह है कि क्या अमरीका हमारे गृहमंत्री का वीजा रद्द कर सकता है, क्योंकि राज्यसभा से भी पारित होने के बाद बिल पूरी तरह पारित हो चुका है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून में संशोधन भी होना तय है। एक अंतरराष्ट्रीय आयोग की टिप्पणी पर अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप की प्रतिक्रिया आनी चाहिए और सार्वजनिक तौर पर आयोग के कथन को खारिज करते हुए उस पर कार्रवाई की जानी चाहिए। नागरिकता संशोधन बिल के प्रावधान और सरोकार परिभाषित हैं और धार्मिक प्रताड़ना के शिकार हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी समुदायों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, जो 31 दिसंबर, 2014 तक भारत में किसी भी तरह आ चुके हैं। ऐसे शरणार्थियों की संख्या 2 लाख से भी अधिक है। कई हजार शरणार्थी तो नागरिकता के लिए आवेदन भी कर चुके हैं। यह मुद्दा हमारा अपना है और आंतरिक व्यवस्था के तहत बिल पारित किया गया है। अमरीका, यूरोपीय यूनियन या किसी भी विदेशी संस्था को आपत्ति किस आधार पर हो सकती है? पाकिस्तान ने एक गंभीर, निजी आरोप चस्पा किया है कि इस तरह आरएसएस के ‘हिंदू राष्ट्र’ के एजेंडे को पूरा किया गया है। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय सन्धियों और द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन करार दिया है, लेकिन वह इसका जवाब क्यों नहीं देता कि 1947 में हिंदुओं की जो आबादी करीब 24 फीसदी थी, वह आज घटकर मात्र 1.6 फीसदी कैसे हो गई? इसी सवाल में पाकिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना का सच छिपा है। पहले कुल अल्पसंख्यक 23-24 फीसदी थे, लेकिन आज महज 3-4 फीसदी रह गए हैं। क्या इस नारकीय स्थिति पर भारत मूकदर्शक बना रहे? बहरहाल विषय अमरीकी आयोग का था। भारत अमरीका का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। अमरीकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री बार-बार मिलते हैं। जाहिर है कि आपस में कुछ तो गंभीर साझापन होगा! भारत दुनिया में सबसे बड़ा बाजार भी है। यदि उसने कुछ अमानवीय किया है, तो हस्तक्षेप किया जाए। यदि अपनी संसद में अपने संविधान के मुताबिक वह कोई निर्णय ले रहा है, तो उसकी व्याख्या अमरीकी आयोग करेगा क्या? इन सवालों पर लगातार सोचना चाहिए, नहीं तो अंतरराष्ट्रीय रिश्ते बेमानी होने लगेंगे।