ग्लेशियरों को लेकर किया गया है व्यापक अध्ययन

हिमाचल का भौगोलिक परिचय  भाग-12

प्रदेश की विज्ञान एवं तकनीकी परिषद ने पहले ही राज्य के ग्लेशियरों को लेकर व्यापक अध्ययन किया है। परिषद के अध्ययनों से साफ प्रतीत होता है कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वजह से ग्लेशियरों के सिकुड़ने के साथ-साथ मौसम की प्रकृति भी बदल रही है। प्रदेश में आम तौर पर दिसंबर महीने में बर्फबारी होती थी…

गतांक से आगे

इन दर्रों पर युगों से व्यापार चलता रहा है और भेड़ बकरियों सहित चरवाहे आते-जाते रहे हैं। जहां इन दर्रों से घोड़ों और खच्चरों द्वारा व्यापार होता रहा है। वहीं इन दर्रों से दुश्मन देश के ऊपर आक्रमण भी करते रहे हैं। ये दर्रे शीत ऋतु में अकसर बंद रहते हैं और अप्रैल से अक्तूबर तक खुल जाते हैं। स्थानीय भाषा में दर्रों को ‘जोत व गलू’ के नाम से जाना जाता है।

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध हिमनद

हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं। ग्लेशियरों के सिकुड़ने की वजह से जहां एक ओर मैदानी क्षेत्रों में पहाड़ों की अपेक्षा तापमान कम होता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर पहाड़़ों में बर्फबारी कम होने से नदियों के जल स्तर में भी गिरावट आ रही है। ग्लेशियरों के सिकुड़ने की घटना को वैज्ञानिकों ने गंभीरता से लिया है। प्रदेश की विज्ञान एवं तकनीकी परिषद ने पहले ही राज्य के ग्लेशियरों को लेकर व्यापक अध्ययन किया है। परिषद के अध्ययनों से साफ प्रतीत होता है कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वजह से ग्लेशियरों के सिकुड़ने के साथ-साथ मौसम की प्रकृति भी बदल रही है। प्रदेश में आम तौर पर दिसंबर महीने में बर्फबारी होती थी, मगर अब बर्फ से ढकी रहने वाली चोटियों भी जनवरी तक खाली ही रहती हैं। सर्दियों में बर्फबारी कम होने को प्रदेश में विद्युत उत्पादन से जोड़ कर भी देखा जाने लगा है। साथ ही ग्लेशियरों के सिकुड़ने की स्थिति से भी राज्य में विद्युत उत्पादन के आंकलन गड़बड़ा सकते हैं। राज्य विज्ञान एवं तकनीकी परिषद में हिमाचली क्षेत्र के ग्लेशियरों को लेकर, जो अध्ययन किया है वह चौंकाने वाला है। विज्ञान एवं तकनीकी  परिषद के विशेषज्ञों ने शौन गंगा तथा जनपा ग्लेशियरों का अध्ययन किया है। इसके बाद कुछ अन्य ग्लेशियरों का अध्ययन भी वैज्ञानिकों  ने किया है। परिषद के विशेषज्ञों ने 1963 से 1997 तक के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अपना अध्ययन किया तथा निष्कर्ष निकाला है कि शौन गंगा ग्लेशियर लगभग 1050 मीटर पीछे हट चुका है। जाहिर है कि यह ग्लेशियर हर साल तीस मीटर सिकुड़ रहा है। इसी तरह जनपा हिमखंड भी 1963 के मुकाबले 650 मीटर सिकुड़ चुका है।                          -क्रमशः

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