घर में आयुर्वेद

पिप्पली में औषधीय गुण

पिप्पली को अपनी भाषा में मग भी कहते हैं। इसका संस्कृत नाम पिप्पली और बोटेनिकल  नाम पाइपर लोंगम है। यह झाड़ीनुमा बेल होती है, इसके फल को औषधीय प्रयोग में लाया जाता है। इसमें पिपरिन नाम का रासायनिक तत्त्व पाया जाता है।

मात्रा-1 से 3 गम चूर्ण के रूप में।

गुण व कर्म- यह पाचन क्षुधावर्धक उदरशूल निवारक कासश्वासहर व प्लीहारोघर तथा मधुमेहनाशक है ।

उदर रोगों में -पीपली उदर के पाचक रस को बढ़ाती है तथा खाए हुए भोजन को पचाती है व भूख को बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त यह अतिसार व प्रवाहिका में भी गुणकारी है। अपचन की वजह से पेट में होने वाली जलन को भी दूर करती है ।

कास व श्वास में - इसका कास श्वास वात कफ जन्य रोगों में प्रयोग किया जाता है। कास व श्वास में इसके साथ बराबर मात्रा में सोंठ व काली मिर्च के चूर्ण को मिला लिया जाए, जिसे त्रिकटु चूर्ण भी कहते हैं का उपयोग अति उत्तम माना जाता है। इसका प्रयोग गले कि खराबी में भी ठीक रहता है।

 मैटाबॉलिज्म में- पिप्पली के साथ सामान मात्रा में पिप्पलामूल चव्य चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिलाकर लेने से थाइराइड, मोटापा व आमपाचन ठीक होता है। अगर फैक्टर जब पॉजिटिव हो तो इस चूर्ण को मिलाकर लेने से आमवात में विशेष लाभ होता है।