Saturday, September 21, 2019 04:37 PM

  चंदा मामा दूर के…

मिशन चंद्रयान-2 नाकाम नहीं हुआ। वैज्ञानिक मिशन नाकाम नहीं हुआ करते, कुछ फासले  रह सकते हैं, लिहाजा बार-बार प्रयोग और प्रयास ही विज्ञान को परिभाषित करते हैं। चंदा मामा दूर के...यह गीत गुनगुनाते और सुनते हुए हम सब बड़े हुए हैं। वह कल्पना साकार होने वाली थी। चंदा मामा का घर सिर्फ  2 किमी दूर रह गया था, 335 मीटर के फासले पर...! उन लम्हों में हम भी अर्द्धरात्रि में जाग कर टीवी में निगाहें गड़ाए बैठे थे। इसरो के वैज्ञानिक और इंजीनियर तालियां बजा रहे थे, खुश और उत्साहित थे। आखिरी कामयाबी का लम्हा बेहद करीब था। अचानक ऐसा कुछ हुआ कि खिलखिलाते चेहरों पर सन्नाटा और तनाव पसर गया। उन क्षणों के साक्षी प्रधानमंत्री मोदी भी थे। उन्होंने भांप लिया कि कुछ अनिष्ट हुआ है। प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों की पीठ थपथपाई। इसरो प्रमुख डा. के.सिवन ने जब कहा कि लैंडर विक्रम का संपर्क टूट गया है, तो मायूसी की वजह पता चली। प्रधानमंत्री मोदी सुबह होते ही फिर इसरो कंट्रोल सेंटर, बंगलुरू में आए और देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा-संपर्क टूटा है, संकल्प नहीं। चांद की सतह से 2.1 किमी दूर तक पहुंचना भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। चांद के दक्षिणी धु्रव वाले इलाके में भारत ही सर्वप्रथम गया है। मैं और यह देश आपके साथ खड़े हैं। हमें आप वैज्ञानिकों पर गर्व है। आपको यहीं से आगे बढ़ना है। आप मक्खन पर नहीं, पत्थर पर लकीर खींचने वाले लोग हैं। चंद्रयान-2 की यात्रा शानदार और जानदार रही है। हमारा आर्बिटर अब भी शान से चंद्रमा के चक्कर (अब कक्षा में) लगा रहा है। मिशन नाकाम नहीं हुआ, सिर्फ  2 कदम दूर रह गया। हो सकता है कि लैंडर विक्रम चंद्रमा की ओर भाग गया हो, ताकि उसे आगोश में ले सके।’ प्रधानमंत्री मोदी ने आखिरी शब्दों को साहित्यकारों की कल्पना से जोड़ा। बेशक नाकामी के एहसास के उन लम्हों में प्रधानमंत्री ने इसरो चीफ  को गले लगाया, तो वह फफक कर रो पड़े। उनकी पीठ सहला कर प्रधानमंत्री ने ढाढस बंधाया और उन्हें साहस देने की कोशिश की। उन लम्हों में प्रधानमंत्री के शब्द और भूमिका बड़े सार्थक साबित हुए। प्रधानमंत्री का संदेश अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। इसरो और उसके वैज्ञानिकों का मनोबल टूटते यह देश देख नहीं सकता था। इसरो ने दुनिया भर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। अब अमरीका का नासा भी इसरो के सहयोग से मिशन शुरू करने की बात कर रहा है। प्रधानमंत्री ने देश के सामने साफ  कर दिया कि मिशन रुकेगा नहीं। मिशन को नए सिरे से आगे बढ़ाना है। चांद को छूना ही हमारा संकल्प होना चाहिए। उसके लिए सरकार इसरो के साथ है। बेशक चंद्रयान-2 के निष्कर्ष अधूरे रह गए, लेकिन हमारे मिशन चंद्रयान ने शोध के जरिए बहुत कुछ विश्व को दिया है। चंद्रमा पर बर्फ  और पानी है। चांद मानव-जीवन का प्लेटफार्म बन सकता है। आर्बिटर से हमें कई दुर्लभ चित्र मिलेंगे, चंद्रमा का नक्शा बनाया जाएगा, वहां भूकंप आते हैं या नहीं, इसकी जानकारी मिलेगी, आर्बिटर 14 दिनों तक लैंडर और रोवर का पता लगा सकता है, पानी की मात्रा के अलावा चांद पर खनिजों के भंडार का डाटा हमें मिल सकेगा। एक साक्षात्कार में इसरो प्रमुख डा. सिवन ने चंद्रयान-2 की कामयाबी 99.5 फीसदी आंकी है, क्योंकि आर्बिटर चांद की कक्षा में साढ़े सात सालों तक चक्कर काट सकता है। उसमें इतना ईंधन है। यदि आर्बिटर काम जारी रखता है, तो हीलियम-3 जैसे भंडारों के खुलासे भी हो सकते हैं, जो परमाणु ऊर्जा के लिए बेहद उपयोगी है। अभी इसरो को गगनयान और स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन सरीखे मिशन पूरे करने हैं। वे भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। नाकामियों की तुलना की जाए, तो वे अमरीका, रूस, जापान, इजराइल के हिस्से ज्यादा रही हैं। मंगल ग्रह पर सबसे पहले भारत ही गया था। लिहाजा इस अवरोध पर उदास होने की जरूरत क्या है? यह जश्न मनाने का मौका है। कमोबेश वैज्ञानिकों की 11 लंबे सालों की कड़ी मेहनत का परीक्षण हुआ है। वैज्ञानिक हफ्ते-हफ्ते प्रयोगशालाओं में काम करते रहे हैं। दिन-रात उनके लिए मायने नहीं रखते। इसरो और उसके वैज्ञानिकों को कोटि-कोटि सलाम, आभार और मिशन की आगामी शुरुआत के लिए ढेरों शुभकामनाएं...। अब चंदा मामा दूर के नहीं रहेंगे, यह गीत गाना शुरू कर देना चाहिए।