चमकदार निवेश के सपने

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

आज राज्य का ऋण भार 49,000 करोड़ है जो कि अच्छी योजना या प्रबंधन के लिए पर्याप्त राजस्व का स्रोत नहीं है। एक इच्छा है कि मात्र इन्वेस्टर्स मीट का आयोजन करने के बजाय सरकार को ही बेहतर प्रबंधन करने के तरीकों की तलाश करनी चाहिए और राजस्व के नए स्रोत बनाने चाहिए। इसके पास बहुत सारे संसाधन हैं, लेकिन अप्रयुक्त हैं, जो कि राज्य को ऋण लेने की आसान प्रक्रिया के तहत छोड़ देते हैं। दुकानों को स्थापित करने के लिए मात्र निजी उद्यमियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है क्योंकि राजस्व पैदा करने के लिए राज्य की क्षमता को ऐसी किसी भी बैठक में संबोधित नहीं किया गया है। राजनेता सिर्फ  दूसरों को आने के लिए पैसे देने और नौकरी देने के लिए निवेश के आसान तरीकों के बारे में सोचते हैं...

हाल ही में हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य ने उच्च विकास और नौकरियों का बड़े पैमाने पर सुनहरी सपना देखा। यह उच्च विकास दर हासिल करने के लिए एक उभरता हुआ हिमाचल था। उस राज्य की संभावित समृद्धि का सपना देखना और उसकी कल्पना करना गलत नहीं है, जिसने अब तक गरीबी और उपेक्षा देखी थी, लेकिन यह गरीबी बहुत पहले ही छोड़ी गई थी जब इसने बागों और चाय बागानों को हथिया लिया था या जब इसने पड़ोसियों की छाया से निकलने के बाद अपना रास्ता खुद बनाया था। दुर्भाग्य से राज्य अपने छोटे आकार के बावजूद और मात्र 74 लाख की आबादी वाले प्रदेश के कुछ सर्वेक्षणों में दिखाया गया है कि यह भारत में कम भ्रष्ट राज्य है।

राज्य के पास उच्च विकास हासिल करने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन इसकी क्षमता का उपयोग नहीं किया गया है क्योंकि यह प्रायः कर्ज में रहने के लिए केंद्र और अन्य संस्थानों पर निर्भर है। आज राज्य का ऋण भार 49,000 करोड़ है जो कि अच्छी योजना या प्रबंधन के लिए पर्याप्त राजस्व का स्रोत नहीं है। एक इच्छा है कि मात्र इन्वेस्टर्स मीट का आयोजन करने के बजाय सरकार को ही बेहतर प्रबंधन करने के तरीकों की तलाश करनी चाहिए और राजस्व के नए स्रोत बनाने चाहिए। इसके पास बहुत सारे संसाधन हैं, लेकिन अप्रयुक्त हैं, जो कि राज्य को ऋण लेने की आसान प्रक्रिया के तहत छोड़ देते हैं। दुकानों को स्थापित करने के लिए मात्र निजी उद्यमियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है क्योंकि राजस्व पैदा करने के लिए राज्य की क्षमता को ऐसी किसी भी बैठक में संबोधित नहीं किया गया है। तथ्य यह है कि राजनेता सिर्फ  दूसरों को आने के लिए पैसे देने और नौकरी देने के लिए निवेश के आसान तरीकों के बारे में सोचते हैं, लेकिन वे प्रत्येक परियोजना के लिए एक निश्चित नीति और मिशन नहीं रखते हैं। उदाहरण के लिए कुल्लू की बिजली परियोजनाओं को ले लीजिए जहां 16 जलविद्युत परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई है, जिनका गुमान सिंह व उनके साथी यह कह कर विरोध कर रहे हैं कि यह कुल्लू क्षेत्र के शांतिपूर्ण व स्वास्थ्यकर पर्यावरण के लिए खतरे का एक संकेत है। ऐसी सभी निवेशकों की परियोजनाओं को राज्य की जलवायु को संरक्षित करना चाहिए। इन निवेशों का दूसरा पहला पहलू अधिक प्रशंसा और हो-हल्ले के प्रदर्शनवाद के बिना प्रस्तावों का कार्यान्वयन है।

सरकार का कहना है कि हमारे पास 92 हजार करोड़ की परियोजनाएं हैं, जिनके लिए 603 एमओयू किए गए हैं, किंतु यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि विकास के लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कार्यान्वयन बहुत जरूरी है। उत्तराखंड में भी 2018 में ऐसी बैठक हुई थी और 70,000 करोड़ रुपए के एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। दो साल में वे 17,000 करोड़ की लागत वाली परियोजनाओं को भी धरातल पर उतारने में विफल रहे। इस तरह का बेदम कार्यान्वयन सरकार के अक्षम प्रबंधन को दर्शाता है जो हिमाचल के काम करने की गति से बेहतर नहीं है, जहां पिछले 20 वर्षों से हवाई अड्डे के विस्तार की बात की जा रही है। आज तक राज्य ने एक मीटर रनवे का भी रास्ता नहीं जोड़ा है। साथ ही साथ एयरलाइन और केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित परियोजनाएं सुस्त चाल से चल रही हैं। यह किसी एक पार्टी की राजनीतिक विफलता नहीं है, बल्कि सभी दलों की है क्योंकि वे स्पष्ट मिशन उन्मुख प्रशासन का पालन नहीं करते हैं। कार्यान्वयन के अलावा एक और मुद्दा यह है कि सरकार किस तरह से उद्योग को संभालती है और परिचालन बाधाओं को दूर करने के लिए सही व्यापार दृष्टिकोण प्रदान करने में अपनी विफलता को किस तरह दूर करेगी।

मेरे अध्ययनों के अनुसार उत्तराखंड, हिमाचल की तुलना में उद्यमियों की मांगों को पूरा करने के लिए बहुत बेहतर और सुसज्जित है। सबसे महत्त्वपूर्ण कारण स्थानीय राजनेताओं द्वारा इंडस्ट्री की कार्यशैली में बहुत अधिक हस्तक्षेप है। कई जगहों पर उद्योगपतियों को राजनेताओं के कारण निचले स्तर के कर्मचारियों के उपेक्षापूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। यहां महिंद्रा, जो एक प्रतिष्ठित व्यापारिक घराना है, के कथनों पर गौर करें जिनमें उन्होंने स्वीकार किया कि उत्तराखंड में 18 साल के अस्तित्व के भीतर, चाहे सरकार किसी की भी रही हो, उन्होंने कभी उपेक्षापूर्ण व्यवहार के मुद्दों का सामना नहीं किया। हिमाचल में कई लोगों ने इस तरह के मुद्दों के कारण मैदान छोड़ दिया है। यहां तक कि स्की विलेज की एक प्रतिष्ठित परियोजना को स्थानीय झड़पों के कारण अधर में ही छोड़ दिया गया। यहां तक कि सेज का प्रस्ताव भी गिर गया जबकि अंब में हर मौसम के अनुकूल एक हवाई अड्डे को निजी क्षेत्र द्वारा बनाया जा सकता था। यहां तक कि अब भी इस विचार का मोल है क्योंकि चीजें अब शांत हो गई हैं और बिना किसी समस्या के एक बड़े प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए पर्याप्त सरकारी भूमि भी उपलब्ध है।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com