Monday, June 01, 2020 02:30 AM

चिंता ते सभी लोकां दी तू तारेयां मां…

वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’

मो.-9316076175

मैं चंडीगढ़ में निजी क्षेत्र की एक कंपनी में सेल्ज एवं मार्केटिंग विभाग में कार्यरत हूं और लगभग हर तीसरे दिन कार्य हेतु व्यावसायिक क्रियाकलापों के सिलसिले में चंडीगढ़ से बाहर अन्य प्रदेशों में भी जाना पड़ता है। इसके अलावा हर माह के दो से तीन रविवार चंडीगढ़, हिमाचल या किसी अन्य प्रदेश में साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी हेतु जाना होता है और इस तरह प्रति माह करीब करीब दस से बारह हजार किलोमीटर का सफर तय हो जाता है, किंतु जब से संपूर्ण मानवता के दुश्मन एक अनदेखे शत्रु ने वैश्विक महामारी कोरोना के रूप में दस्तक दी है और सरकार द्वारा लॉकडाउन घोषित किया गया है, तब से सारी भागदौड़ थम सी गई है और समय की मांग के अनुसार प्रत्येक पल अपने घर की दहलीज के भीतर ही व्यतीत हो रहा है। जहां एक ओर सरकारें नित नए दिशा-निर्देश देकर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही हैं तो वहीं दूसरी ओर डाक्टर, पुलिस विभाग, सफाई कर्मचारी व कई निजी संगठन जनसेवा में दिन-रात एक किए हुए हैं। फिर भी इसकी वजह से संपूर्ण विश्व की करीब 800 करोड़ जनता को अवसाद रूपी राक्षस ने भी घेरना शुरू कर दिया है। इसी विकट स्थिति में दायित्व साहित्य से जुड़े हर रचनाकार के कंधों पर आ जाता है। हालांकि यह कर्फ्यू संपूर्ण मानव-जाति की भलाई के लिए है, फिर भी कर्फ्यू के दौरान आम जनमानस का जीवन कैसा होता है, यह बहुत नजदीक से महसूस हो रहा है। औसतन 500 किलोमीटर प्रतिदिन सफर कर लेने वाला मेरे जैसा व्यक्ति पांच सप्ताह से अगर 500 कदम प्रतिदिन भी न चले तो स्थिति का तकाजा आसानी से लगाया जा सकता है। नौकरी के साथ-साथ क्योंकि साहित्य से भी जुड़ाव है और लगातार पठन-पाठन तथा साहित्यिक कार्यक्रमों आदि में भागीदारी रहती है तो बैठे-बैठे यूं ही मन में एक ख्याल आया कि भगवान अगर कुछ बुरा करते हैं तो उसके पीछे भी कुछ न कुछ तो अच्छा संदेश भी छुपा होता है। लॉकडाउन के पहले दो दिन तो सुबह से देर रात तक लगातार समाचार ही सुने, किंतु तभी मन में ख्याल आया कि क्यों न अन्य कोरोना वारियर्स की तरह मैं भी अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर सक्रिय भागीदारी निभा लूं। तो स्थितियों का मूल्यांकन करते हुए सबसे पहले यह पाया कि चंडीगढ़ में समूचे उत्तर भारत से मरीज अपना इलाज करवाने पहुंचते हैं, उनको अगर और रक्त की जरूरत पड़ी तो ये कमी कैसे पूरी होगी, क्योंकि आम दिनों की भांति कोई भी रक्तदानी आसानी से अस्पताल तक नहीं पहुंच पाएगा। इसके लिए अपने रक्तवीर समूह चंडीगढ़ से जुड़े मित्रों को पुनः सक्रिय होने का आग्रह करते हुए रक्त की उपलब्धता को लेकर गतिविधियां शुरू कर दीं। लॉकडाउन के लंबे संभावित समय बारे सोच मन में यह भी ख्याल आया कि यह तो साहित्य के पठन-पाठन एवं लेखन के लिए बहुत ही उपयोगी एवं उपजाऊ समय है तो कुछ और भी करना चाहिए। इस कड़ी में सबसे पहले कवि प्रदीप के एक भजन की धुन पर आधारित गीत लिखा और एक दिन बाद ही हिमाचली भाषा में कोरोना से रक्षा हेतु प्रार्थना करते हुए माता रानी की एक भेंट लिखी। इसके बाद अठारह-अठारह घंटे लगाकर अगले मात्र सात-आठ दिन में अपने पुस्तकालय से सभी धर्मों की पवित्र धार्मिक पुस्तकों को निकालकर न केवल पढ़ लिया, अपितु भविष्य में एक पुस्तक के रूप में पांडुलिपि पर काम करते हुए ‘सभी धर्म, कितने दूर कितने पास’ शीर्षक से नोट्स बनाने शुरू कर दिए।

इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के राजे-रजवाड़ों के चुनिंदा अनचीन्हे किलों से जुड़े हुए प्रसंगों, लोक कथाओं एवं सामरिक दृष्टि से ऐतिहासिक स्थलों पर लेखन कार्य शुरू किया है। इसके साथ एक बात और महसूस हुई कि यह सब तो अपने लिए कर रहा हूं, किंतु लेखक का धर्म तो एक प्रेरक पुंज के रूप में स्थापित हो सदैव समाज के लिए सभी कार्य करना होता है तो वर्तमान समय में इस दिशा में मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूं। फिर क्या था, स्थितियों को भांपने के लिए मैंने प्रतिदिन अपने जानकारों-मित्रों से बात करनी शुरू की और पाया कि अधिकतर लोगों को भविष्य की चिंता सता रही है। बहुत से लोग निराशावादी होते जा रहे हैं। उन्हें इस बात से कैसे निकाला जाए, इस पर जब चिंतन-मनन किया तो जो रोचक हल चेतन मन ने बताया, वह यह था कि अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले लोगों को न केवल अपनों के बचने हेतु कहा जाए, बल्कि उन्हें किसी न किसी तरह व्यस्त रखने के भी तरीके अपनाए जाएं। इसी कड़ी में सबसे पहले सोशल मीडिया पर अपील की कि जो भी व्यक्ति लेखन, पेंटिंग, स्केच आर्ट, खानपान आदि जिस किसी भी विधा से जुड़ा हुआ महसूस करता है और सृजन रुचि रखता है, उसमें समय का उचित निवेश करें। एक दिन मेरे किन्हीं जानकार मित्र का हिमाचल से ही फोन आया कि तुमने कलम तो बहुत पकड़ ली, कभी कड़छी भी पकड़ कर देखो, बचपन से तुम्हारा तो यह शौक भी रहा है, देखना तुम्हें बहुत लोग फॉलो करेंगे। बस फिर क्या था, परिवार के साथ सलाह कर किसी न किसी रूप में उनकी सहायता लेकर नए तरीके से प्रतिदिन एक नया पकवान  बनाना और फेसबुक पर डालना शुरू किया जिसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया और स्वयं भी हाथ आजमाने शुरू कर दिए। इस तरह अब मैं रोज एक नया पकवान बनाकर अपलोड करता हूं और प्रतिक्रिया स्वरूप लोग भी अपनी ओर से सफल कोशिश कर रहे हैं। संतोष है कि इस तरह अपने दायरे में जुड़े हुए करीब सौ लोगों को कुछ सकारात्मक करने एवं अवसाद से दूर रखने में कामयाब हो रहा हूं। समाज से बारंबार एक ही अपील है कि हम सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करें, संयमित रहें, लक्ष्मण रेखा न लांघने का संकल्प लें। याद रहे यह दौड़ जीतेगा वही जो हिलेगा नहीं। अगर हम कामयाब हो गए तो इस तरह हम न केवल विश्व के सामने एक उदाहरण पेश कर सकेंगे, बल्कि भारत पुनः विश्व गुरु बन कर उभरेगा। अब आपसे स्व-रचित मां की भेंट शेयर कर रहा हूं:

इस कोरोने राकसे जो मारयां मां

चिंता ते सभी लोकां दी तू तारेयां मां

रक्तबीज बनी करि आया है चीन ते

काबू नी ओआ दा ये कुसी बीन ते

शेरे अपणे, सिंहे अपणे बैठी तू हुंकारेयां मां...

एह कदेह नवराते तेरे बंद चुबारे मां।

कजो होये सुनसान तेरे सोहणे द्वारे मां।

घर घर जाई अपने सबनां भक्तां तारेयां मां

दोनों हत्थां जोड़ी मैं अर्ज़ लगावां मां

भोग लगावण तैनू मैं घर पे बुलावां मां।

हुण मत करदी देर, न लायां लारेयां मां।

वीर गलाए एहो माता राकसे जो मारेयां मां

चिंता सभी लोकां दी तू तारेयां मां।