Wednesday, May 22, 2019 12:36 PM

चीन का गिरता ग्राफ

डा. अश्विनी महाजन

एसोसिएट प्रो. पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विवि

पिछले लगभग दो दशकों से दुनिया के मानचित्र पर सबसे तेज अर्थव्यवस्था के रूप में ही नहीं, बल्कि दुनिया के ‘मेन्युफैक्चरिंग हब’ के नाते स्थापित होता चीन, आज भारी संकटों से गुजर रहा है। दुनिया के सभी मुल्क चीन के मॉडल को एक आदर्श के रूप में एक तरफ चीन मेन्युफैक्चरिंग में आगे बढ़ा, तो दूसरी ओर दूसरे मुल्क इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, उपभोक्ता वस्तुओं, मशीनरी, केमिकल्स, दवाइयों, कच्चे माल आदि के लिए चीन पर निर्भर होते गए। यही नहीं, उनके देशों में रोजगार का संकट भी उत्पन्न हो गया, क्योंकि चीनी उत्पादों के कारण उनके उद्योग-ध्ांधे बंद होते गए। भारत के ही नहीं, बल्कि अमरीका, यूरोप और अन्य देशों के औद्योगीकरण को भी धक्का लगा। भारी निर्यातों और व्यापार में अतिरेक के चलते चीन के विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने लगे। 2014 तक आते-आते उसका विदेशी मुद्रा भंडार 4000 अरब डालर के पास पहुंच गया। भारी विदेशी मुद्रा भंडार के बलबूते चीन ने दूसरे मुल्कों में काफी मात्रा में भूमि ही नहीं खरीदी, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में भी भारी निवेश किया। अब उसकी कंपनियां विश्वभर में इन्फ्रास्ट्रक्चर के ठेके लेने लगी। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सड़क निर्माण, श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह समेत कई स्थानों पर चीन द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश इसके उदाहरण हैं। चीन दुनिया में एक महाशक्ति के रूप में दिखाई देने लगा, लेकिन पिछले कुछ समय से चीन संकट में दिखाई दे रहा है। आज उसकी जीडीपी ग्रोथ घट रही है। विदेशी व्यापार में धीमेपन के कारण विदेशी मुद्रा भंडार घटकर अब 3000 अरब डालर ही रह गया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए अब देश  उसे शंका की दृष्टि से देख रहे हैं, चीन की कई कंपनियां बंद हो चुकी हैं। पिछले साल चीन के निर्यातों में भी भारी कमी आई है। पूर्व में जो चीनी आयातों का लाल गलीचे बिछाकर स्वागत होता था, अब चीनी आयातों पर आयात शुल्क बढ़ाकर उनको रोका जा रहा है। चीनी हुक्मरान, जो चीन को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था बना रहे थे, अब कह रहे हैं कि घरेलू उपभोग भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अब चीन का विदेशी बाजार सिकुड़ रहा है। काफी समय से चीन के निर्यात बढ़ने की बजाय घटने लगे हैं। वर्ष 2010 की दिसंबर तिमाही में जीडीपी ग्रोथ की दर, जो बढ़ते-बढ़ते 12.2 प्रतिशत पार कर गई थी, वर्ष 2018 की दिसंबर तिमाही तक आते-आते घटकर मात्र 6.4 प्रतिशत ही रह गई है। इसमें ज्यादा नुकसान मैन्युफेक्चरिंग को हुआ है और यह मैन्युफेक्चरिंग के महत्त्वपूर्ण सूचकांक (पीएमआई) में प्रदर्शित भी हो रहा है। फरवरी 2019 तक आते-आते चीन का पीएमआई सूचकांक 49.2 प्रतिशत पहुंच चुका था। गौरतलब है कि पीएमआई सूचकांक का 50 से नीचे होना मैन्यूफेक्चरिंग में गिरावट को प्रदर्शित करता है। मैन्यूफेक्चरिंग में घटती ग्रोथ इस बात से भी इंगित होती है कि अब चीन में आयात भी घटने लगे हैं। पिछले साल चीन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में ग्रोथ एक प्रतिशत से भी कम (0.9 प्रतिशत) आंकी गई है। गौरतलब है कि पिछले साल चीन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की ग्रोथ 7.9 प्रतिशत थी। हालांकि चीन की मैन्यूफेक्चरिंग की ग्रोथ में तो गिरावट आई ही है, यह गिरावट लगभग सभी क्षेत्रों में देखी जा सकती है। द्वितीयक क्षेत्र जिसमें मैन्युफेक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन दोनों आते हैं, की ग्रोथ 2010 में 20 प्रतिशत से घटकर 2018 तक मात्र 10 प्रतिशत ही रह गई। सेवा क्षेत्र में ग्रोथ 2010 में 17.6 प्रतिशत से घटकर 2018 में मात्र 10 प्रतिशत रह गई और प्राथमिक क्षेत्र, जिसमें कृषि, वानिकी एवं खनन शामिल है, की ग्रोथ 2011 में 16.5 प्रतिशत से घटती हुई 2018 तक 4.2 प्रतिशत ही रह गई है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की दर 2010 में 17.7 प्रतिशत थी, अब 2018 तक घटकर 9.2 प्रतिशत ही रह गई है। वर्ष 2001 में डब्ल्यूटीओ का सदस्य बनने के बाद, डब्ल्यूटीओ के व्यापार नियमों का फायदा उठाकर चीन ने अपने निर्यात काफी बढ़ा लिए थे। वास्तविकता तो यह है कि उधर अपने निर्यातों को गुपचुप तरीके से सबसिडी देकर, वह अपनी प्रतिस्पर्द्धा शक्ति बढ़ाने का काम कर रहा था, लेकिन अब दुनिया भर में चीनी माल की भारी आवक के चलते, जब फैक्टरियां बंद हो गईंऔर रोजगार पर भारी प्रभाव पड़ा, तो इन देशों ने आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं। चीन ने श्रीलंका में हंबनटोटा नाम के बंदरगाह के निर्माण का जिम्मा लिया और इस के लिए श्रीलंका को बड़ा कर्ज भी दिया। कर्ज इतना ज्यादा था, जिसे श्रीलंका सरकार चुका नहीं पाई और इसके बाद चीन ने श्रीलंका को इस के लिए बाध्य किया कि वह इस बंदरगाह को उसे 99 वर्ष की लीज पर दे दें। श्रीलंका का यह अनुभव शेष दुनिया के लिए एक नसीहत बन गया है और अन्य मुल्कों को यह लगने लगा है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर चीन इन देशों को फांसकर उन्हें अपने ऊपर आश्रित करते हुए उनके लिए सुरक्षा खतरा बन सकता है, इसलिए ऐसे सभी मुल्क, जो चीन के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए समझौते के रास्ते पर थे या समझौते कर चुके थे, अब पीछे हटने लगे हैं। हाल ही में मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद, जिन्होंने चीन के लगभग 23 अरब डालर के समझौतों को हरी झंडी दे दी थी, अब उन्हें रद्द कर दिया है। बंगलादेश, हंगरी और तंजानिया जैसे मुल्कों ने बैल्ट रोड परियोजनाओं को या तो रद्द कर दिया है या उसके स्वरूप को घटा दिया है। म्यांमार ने चीन को यह धमकी देकर कि वह उसके समझौते को रद्द कर सकता है, क्यावपीयू बंदरगाह की पूर्व लागत 7.3 अरब डालर से घटाकर मात्र 1.3 अरब डालर पर ले आया है। यहां तक कि चीन के साथ पहले साझेदारी और मित्रता निभाने वाले पाकिस्तान जैसे देश भी परियोजनाओं का पुनरावलोकन करने लगे हैं। ऐसे में इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि चीन का दुनिया के इंफ्रास्ट्रक्चर में एक महाशक्ति बनने का सपना धूमिल होता जा रहा है। आर्थिक रूप से चीन का घटता ग्राफ उसे कहां ले जाएगा, यह तो समय ही बताएगा।