चीन पर भारतीय प्रभाव, डा. चंद्र त्रिखा, वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार

चीन की नई पीढ़ी को तो यह पता भी नहीं होगा कि एक समय था जब चीन के विद्वान यात्री के रूप में भारत आते थे। उनका उद्देश्य ज्ञान-साधना होता था। इनमें ़फाहियान (399-414 ई.), ह्यू-एन-सांग (629-645 ई.)  और इत्सिंग (671-695 ई.) विशेष रूप से चर्चा में आए। इसी तरह भारत से बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चीन जाने वालों में भी कुमार जीव (401 ई.), बुद्धभट्ट (421 ई.) और बोधि-धर्मण्ण (520 ई.) का नाम विशेष उल्लेखनीय रहा है। उन दिनों चीनी समाज में एक जनश्रुति यह भी फैल गई थी कि जो भी अच्छा आता है, भारत से आता है। यहां तक कि हांगचाऊ नगर के पास एक छोटे से सुंदर पहाड़ के बारे में भी यही किंवदंती थी कि यह पहाड़ भारत से उड़कर चीन पहुंचा था। इस पहाड़ को अब भी उड़न पहाड़ (फ्लाइंग माउंटेन) कहा जाता है। इसी पहाड़ के पार्श्व भाग में एक विशाल बौद्ध मंदिर है, जिसकी स्थापना एक भारतीय बौद्ध संत ने ही की थी। बुरे एवं तनावपूर्ण रिश्ते तो हाल ही की देन हैं। अच्छे रिश्तों की कहानियां सदियों पुरानी हैं। राहुल सांकृत्यायन कहते थे, ‘चीन में अब भी लगभग 1500 ऐसी पांडुलिपियां हैं, जो या तो संस्कृत में है या पाली में। दरअसल भारत से विद्वानों, संतों व पंडितों का चीन में आना-जाना लगा रहता था। वे जब भी जाते, ज्ञान के प्रसार के लिए यहां से पांडुलिपियां ले जाया करते थे। दरअसल, चीन में भारतीय विद्वता के प्रति सम्मान की भावना जगाने में ़फाहियान, ह्यूनसांग और इत्सिंग की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। ़फाहियान पांचवीं सदी में भारत आया था। उसने बरसों तक पाटलीपुत्र में रहकर ज्ञान साधना की थी। उस समय के बौद्धिक समाज एवं आध्यात्मिक आंदोलनों की संरचना को प्रामाणिक रूप में समझना हो तो हमें ़फाहियान के यात्रा-संस्मरणों से गुज़रना पड़ेगा। वह चंद्रगुप्त द्वितीय का समय था, जब ़फाहियान भारत आया था। उसका मुख्य उद्देश्य कुछ विशिष्ट बौद्ध-धर्मस्थलों की यात्रा करना और वहां से बौद्ध धर्म से संबंधित मूल सामग्री की प्रतिलिपियां बना कर उन्हें अपने देश ले जाना था। अपनी इन यात्राओं के मध्य उसने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रचलनों का वर्णन लिपिबद्ध किया था। किंवदंती है कि वह दिन भर सामग्री एकत्र करता और फिर रात को मशालों के प्रकाश में उन्हें लिपिबद्ध करता। वह अपनी भारत यात्रा पर 399 ईस्वी के प्रारंभ में पहुंचा था। गोबी के रेगिस्तानी क्षेत्रों से होता हुआ वह खोतान पहुंचा था, जहां पर उन दिनों बड़ी संख्या में बौद्ध स्तूप व स्थावर स्थित थे। उन दिनों कुशाग्रा क्षेत्र में उसे विशेष मदद मिली थी क्योंकि तब वहां का राजा एक बौद्ध था। वहां से विस्तृत सामग्री एकत्र करता हुआ पामिर घाटी के रास्ते वह स्वात पहुंचा, जहां से वह गांधार क्षेत्र में प्रवेश कर गया था। वह कुल 11 वर्ष (400 ई. से 411 ई.) तक भारत में रहा। अपनी इस यात्रा के मध्य वह पेशावर, तक्षशिला, मथुरा, कन्नौज, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, सारनाथ और अन्य स्थानों पर गया। कुछ वर्ष इन्हीं क्षेत्रों में बिताने के बाद वह ताम्रलिप्ति (पश्चिमी बंगाल) की समुद्री बंदरगाह से श्रीलंका चला आया। लगभग दो वर्ष वहां पर अध्ययन व अध्यापन के बाद वह जावा होता हुआ 414 ईस्वी में वापस चीन लौटा था। ़फाहियान ने अपने यात्रा-संस्मरणों में यथासंभव राजनीतिक परिस्थितियों पर अधिक टिप्पणी से परहेज़ रखा। यहां तक कि उसने चंद्रगुप्त-द्वितीय की चर्चा भी नहीं की, यद्यपि वह पांच वर्ष तक उसके द्वारा शासित क्षेत्रों में ही घूमता रहा। लेकिन उसने अपने संस्मरणों में वह अवश्य दर्ज किया कि उस समय के शासक उदारवादी थे। प्रजा आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न थी और उस पर राजस्व-प्राप्ति के लिए किसी भी प्रकार का अनावश्यक दबाव नहीं डाला जाता था। आय का मुख्य साधन भू-राजस्व ही था। लोगों के आने-जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं होते थे। न्याय के लिए राजा के दरबार में जाने की आवश्यकता बहुत कम पड़ती थी, लेकिन राजद्रोह के मामले में कड़े दंड दिए जाते थे। ऐसे मामलों में अपराधी का दाहिना हाथ काट दिया जाता था। सरकारी कारिंदों को इतनी छूट भी नहीं थी कि वे प्रजा से पर्वों-उत्सवों के दिनों में कोई उपहार भी स्वीकार कर सकें। मंदिरों, बौद्धजनों और स्थानकों से किसी भी प्रकार का कोई टैक्स नहीं लिया जाता था। विदेशी व स्वदेशी पर्यटकोें के लिए अलग से विश्राम गृहों एवं धर्मशालाआें की व्यवस्था थी। ़फाहियान ने इस बात की भी पुष्टि की थी कि उन दिनों पंजाब (विशेष रूप से मथुरा जनपद), बौद्ध गया, श्रावस्ती, कपितवस्तु, मालवा क्षेत्र आदि में भी हीनयानों और महायानों के अलग-अलग बौद्ध स्थानक थे। पाटलीपुत्र में लंबी अवधि तक रहा था फाहियान : यहीं पर उसने संस्कृत व पाली का विशेष अध्ययन किया। उसका विशेष अध्ययन ‘महा परिनिर्वाण-सूत्र’ पर केंद्रित था। वह लौटते समय असंख्या हस्तलिखित पांडुलिपियां, खच्चरों पर लादकर चीन ले गया था। वहां उसने इसमें से अधिकांश का अनुवाद भी स्वयं ही किया था।

ह्यून सांग : ऐसा ही ज्ञान-पिपासु था चीनी यात्री ह्युन सांग। वह सातवीं सदी में भारत आया था। मूलतः वह चीनी बौद्ध भिक्षु था और दोनों देशों के बौद्ध भिक्षुओं के बीच संवाद का आयोजन करता रहता था। वर्ष 602 ईस्वी में वह आया था और 62 वर्ष तक जीवित रहा। अपनी यात्रा के मय वह पाकिस्तान (तब पंचनद प्रदेश), भारत, नेपाल और बांग्लादेश के अनेक प्रमुख बौद्ध केंद्रों पर गया था। वैसे 13 वर्ष की उम्र में ही बौद्ध-भिक्षु बन गया। वह 17 वर्ष तक भारत में रहा। उसका अधिकांश समय नालंदा में बीता था। संस्कृत भाषा का वह दीवाना था। उसने हुन्जा और खैबर दर्रे वाले क्षेत्रों में भी दो वर्ष गुज़ारे। अपने यात्रा वृत्तांतों में उसने बौद्ध धर्म के केंद्र कनिष्क-स्तूप का विशेष वर्णन दिया था। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल में भी जालंधर, कुल्लू, कुरुक्षेत्र में कुछ माह बिताने के बाद वह कौशाम्बी और काशीपुर की ओर निकल गया था। वहीं से लुम्बिनी व बाद में नेपाल में कुछ वर्ष तक वह शोध व अनुवाद कार्य करता रहा।

इत्सिंग : तीसरा बहुचर्चित चीनी यात्री इत्सिंग था। दरअसल उसके संस्मरणों से तत्कालीन इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझी थी। संस्कृत व पाली भाषा से मंडारिन यानी चीनी भाषा में अनुवाद में वह पारंगत था। वह भी 14 वर्ष की उम्र में ही बौद्ध भिक्षु बन गया था। वह 676 इस्वी से 695 ईस्वी तक भारत में रहा था। कुल यात्रा-अवधि 25 वर्ष रही थी और लौटते समय वह लगभग 400 ग्रंथों की अनुकृतियां साथ ले गया था। उसने हीनयान व महायान दोनों बौद्ध-शाखाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन किया और दोनों के ही ग्रंथ यहां से स्वदेश ले गया था। उसने कुल 60 ग्रंथों के मंडारिन अनुवाद किए थे। ज़ाहिर है चीन कभी भारत का प्रशंसक भी था और वहां के ज्ञान का मुख्य स्रोत भी यहीं से था।

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