Thursday, June 20, 2019 03:04 PM

चुनावी चकल्लस में‘भारत बोध’ की किताब

किताब पर सवाल

राजनीतिक नजरिए और विज्ञापन की मानसिकता के साथ जब किसी पुस्तक की समीक्षा होती है तो वह ‘चुनाव आचार संहिता’ के लिए विषय बन जाती है। धर्मशाला में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित पुस्तक मेले के दौरान ‘भारत बोध का संघर्ष-2019 का महासमर’ को लेकर जिस तरह की राजनीतिक और पत्रकारीय सरगर्मी दिखी, वह कई तरह के प्रश्न खड़े करती है। मसलन क्या कोई विमर्श आधारित पुस्तक का विमोचन मतदान-व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। क्या केवल चित्र के कारण किसी भी पुस्तक को राजनेता की आत्मकथा माना जा सकता है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह कि बिना पुस्तक पढ़े ही क्या उस पर टिप्पणी की जा सकती है, उसे किसी साहित्यिक-राजनीतिक बाड़े में खड़ा किया जा सकता है?

यदि किताब जीवनी हो या आत्मकथात्मक हो तो इस बात की संभावना बन भी सकती है कि वह मतदान व्यवहार को प्रभावित करे, लेकिन जिस किताब में 2004-2018 तक का राजनीतिक लेखा-जोखा साभ्यतिक नजरिए से प्रस्तुत किया गया है, वह ‘चुनाव आचार संहिता’ का विषय बन सकती है क्या? हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की यह पुस्तक इस समय कई कारणों से देश भर में चर्चा बटोर रही है। डा. अग्निहोत्री जहां देश भर में इस पुस्तक को हाथोंहाथ लिए जाने से गदगद दिखते हैं, वहीं विमोचन को  आदर्श आचार संहिता से जोड़ने को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। वह कहते हैं कि किताब पिछले 15 वर्षों में समाचार पत्रों के लिए लिखे गए लेखों का संग्रह जैसा है, इसमें आई अधिकांश बातें पहले से ही सार्वजनिक हैं। इसलिए इसे चुनाव और पार्टी से जोड़ना दुर्भाग्यपूर्ण है। 

 -डा. जयप्रकाश सिंह