चुनाव प्रचार में नैतिक सड़ांध

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

कई बार ऐसा देखने में आया कि बेशर्मी के साथ मनघड़ंत खबरें फैलाई गईं। मिसाल के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने कुछ लोगों के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप लगाए जिन्हें वह प्रमाणित नहीं कर पाए। बाद में प्रभावित लोग न्याय के लिए अदालत में गए। जब केजरीवाल ने देखा कि वह संकट में फंस गए हैं तो उन्होंने माफी मांग ली। अरुण जेटली व नितिन गडकरी के मामले के अलावा कई अन्य मामलों में उन्होंने ऐसा ही किया...

वैधानिक तथा नैतिक क्रियाओं में अंतर होता है। नैतिकता सामाजिक मापदंडों व सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर करती है। मिसाल के तौर पर क्रांति के लिए लड़ रहा एक व्यक्ति नैतिक हो सकता है, किंतु इसका देश के कानून के साथ द्वंद्व भी हो सकता है। कानून स्वीकृत कार्रवाइयों पर आधारित होता है जैसा कि देश के कानून के चार्ट में प्रतिस्थापित होता है। एक समय था जब नैतिकता का कोई मोल होता था तथा कई अवसरों पर इसका मान होता था। गांधी जी का आमरण अनशन राष्ट्रीय सरोकार के कारण नैतिक रूप से न्यायोचित है, किंतु यह देश के कानून के हिसाब से वैधानिक नहीं हो सकता है। प्रत्येक कार्रवाई को नैतिकता में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, किंतु यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज किन मूल्यों को पोषित करता है। बिल्कुल हाल के समय तक झूठ बोलना निंदनीय माना जाता था, किंतु आज फेक न्यूज तथा राजनीतिक धुंधलेपन के वातावरण में सब कुछ स्वीकार्य प्रतीत होता है तथा इस पर ज्यादा हो-हल्ला भी नहीं होता है।॒ समाज अब स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों के संघर्ष व बलिदान के दौर की अपेक्षा ज्यादा भौतिकवादी हो गया है। देश में आजकल चल रहे चुनावों में मैं नैतिक सड़ांध की चरम सीमा देखता हूं जो कि सार्वजनिक हस्तियों के कार्यकलापों व भाषणों में दिखाई देती है।

सोशल मीडिया ने सामाजिक क्षेत्र, विशेषकर राजनेताओं के लिए अश्लील व गंदी बात में संलिप्त होना आसान बना दिया है।  आचरण की एक साझा संहिता के विकास के लिए मीडिया तथा उपभोक्ताओं द्वारा स्वेच्छा से मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंच बनाना एक सकारात्मक कदम है। यह प्रशंसा योग्य है कि ट्विटर तथा अन्य साइट्स ने भी इस अभियान को समर्थन दिया है तथा वे वालंटियर कोड बनाने के लिए तैयार हैं। नैतिकता में कई गंभीर सेंध लगी हैं तथा उस पर चर्चा की निहायत ही जरूरत है। कई बार ऐसा देखने में आया कि बेशर्मी के साथ मनघड़ंत खबरें फैलाई गईं। मिसाल के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने कुछ लोगों के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप लगाए जिन्हें वह प्रमाणित नहीं कर पाए। बाद में प्रभावित लोग न्याय के लिए अदालत में गए। जब केजरीवाल ने देखा कि वह संकट में फंस गए हैं तो उन्होंने माफी मांग ली। अरुण जेटली व नितिन गडकरी के मामले के अलावा कई अन्य मामलों में उन्होंने ऐसा ही किया। मनघड़ंत आरोप लगाना गैर-कानूनी है तथा इन्हें कोर्ट में प्रमाणित नहीं किया जा सकता। एक समय ऐसा था जब लोग शर्मिंदगी महसूस करते थे तथा वे सार्वजनिक रूप से सामने आने से बचते थे। किंतु अब राजनीति के क्षेत्र में लोग मनघड़ंत बातें करने लगे हैं तथा आरोप लगाते हुए वे अपने विरोधियों को नामित भी कर लेते हैं। जितनी गालियां नरेंद्र मोदी को दी गईं, उतनी गालियां अब तक किसी भी प्रधानमंत्री को नहीं दी गईं। मुझे याद है किसी ने इलेक्ट्रानिक मीडिया में मनमोहन सिंह के खिलाफ भद्दी टिप्पणियां की तो उसे मुस्तैदी से इसका प्रत्युत्तर दिया गया। उधर भाजपा के राज में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तथा मोदी गालियों व कुत्सित बातों के प्रति सहिष्णु रहे हैं। एक प्रधानमंत्री को ढिठाई के साथ चोर कहना बेशक गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से उस स्थिति में अनैतिक है जबकि उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से कोई आरोप पुष्ट नहीं हुआ है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर हैरान है तथा उसने इस संबंध में व्याख्या के लिए एक नोटिस जारी किया है। देश के इतिहास में अब तक किसी ने भी प्रधानमंत्री को चोर के रूप में संबोधित नहीं किया था। यह भाजपा या किसी अन्य से जुड़ा मसला नहीं है, बल्कि यह सवाल है राष्ट्रीय सम्मान व मतदाताओं की इच्छा के सम्मान का। इससे भी ज्यादा शर्मनाक यह है कि जमानत पर छूटना शर्म का विषय नहीं माना जा रहा है तथा ऐसे कई लोग अपने विरोधियों पर ताबड़तोड़ छींटाकशी कर रहे हैं। कोर्ट से सजा पा चुके लालू प्रसाद यादव इसकी बड़ी मिसाल हैं और वे ढीठता के साथ अपने विरोधियों के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। वह भ्रष्ट नेताओं की बड़ी मिसाल हैं। एक अन्य मसला जिस पर नैतिकता के नजरिए से सवाल उठाया जा सकता है, वह यह है कि कई नेताओं के कोई आदर्श नहीं हैं तथा वे बेशर्मी के साथ स्वार्थ-पूर्ति में लगे हुए हैं।  कई नेता दावा तो यह करते हैं कि वे सामाजिक भलाई के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे केवल अपनी भलाई के लिए ही काम कर रहे होते हैं। मिसाल के तौर पर केजरीवाल को लेते हैं जो कांग्रेस से चुनाव में गठजोड़ करना चाहते हैं। अब इसमें क्या नैतिकता है कि कभी उन्होंने शीला दीक्षित को सर्वाधिक भ्रष्ट नेता कहा था, उन्होंने स्वयं को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले नेता के रूप में प्रतिपादित किया था, किंतु आज वह उसी दल से गठजोड़ करना चाहते हैं जो कभी उनके लिए भ्रष्ट हुआ करता था।

अपने ही शब्दों को खा लेना आज शर्म का विषय नहीं रह गया है। क्या वह उस समय लोगों को मूर्ख बना रहे थे जब उन्होंने कहा था कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। उधर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बसपा के साथ गठबंधन कर रही है। ये दल कभी एक-दूसरे के बड़े शत्रु थे। हिमाचल प्रदेश में आजकल सुखराम चर्चा में हैं। वह एक समय केंद्र में मंत्री थे तथा उनके घर से छापे में करोड़ों रुपए बरामद किए गए थे। ये महाशय अब तक निजी लाभ की खातिर पांच बार दल बदल चुके हैं। उन्होंने अपने पुत्र को चुनाव में जिताने के लिए काम किया तथा उन्हें मंत्री बनाने के लिए लॉबिंग भी की। वह यहां तक ही नहीं रुके, बल्कि भाजपा से अपने पोते के लिए टिकट की मांग भी उन्होंने रखी तथा जब इस पार्टी ने इनकार कर दिया तो वह कांग्रेस में शामिल हो गए और अपने पोते के लिए उन्होंने टिकट भी हासिल कर लिया।

उनके पोते को अपने गृह क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट दिया गया है।  उधर सुखराम के पुत्र अनिल शर्मा ने भी नैतिकता को ताक पर रख दिया तथा आरंभ में उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने से भी इनकार कर दिया था। वह अभी भाजपा में ही हैं तथा अपने पुत्र के खिलाफ चुनाव प्रचार करने से इनकार करते हुए उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। भाजपा का विधायक बने रहना वह अपना अधिकार मान रहे हैं। भाजपा उनसे विनम्रता के साथ पेश आती रही और वह पार्टी का अनुशासन लागू करने में विफल रही। इस तरह की अनैतिक परिपाटियां अब भारतीय राजनीति में आम हो गई हैं। अब यह जरूरी है कि हम कानून का पालन करें, किंतु साथ ही यह भी समान रूप से जरूरी है कि राजनीतिक नेताओं को सम्मानपूर्ण आचरण बनाए रखना चाहिए।

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