चुनाव से ओझल पर्यावरण

डा. ओपी जोशी

स्वतंत्र लेखक

‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ ने कुछ वर्ष पूर्व अपने एक अध्ययन में बताया था कि देश की कुल 150 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 12 करोड़ की पैदावार घट गई है एवं 84 लाख हेक्टेयर समस्या ग्रस्त है। आठ राज्यों (राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड, गोवा, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और त्रिपुरा) में लगभग 40 से 70 प्रतिशत भूमि कई कारणों से बंजर होने की कगार पर है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश में जल, जंगल, जमीन एवं खेती के हालात अच्छे नहीं हैं, लेकिन इन पर किसी भी राजनीतिक दल ने सत्रहवीं लोकसभा के इस चुनाव में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। किसानों को कर्जमाफी एवं कुछ राशि देने की ही चर्चाएं होती रही हैं, परंतु इससे जल, जंगल, जमीन एवं खेती के सुधरने के कोई आसार नजर नहीं आते...

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र एवं भारत का लोकसभा का चुनाव सिर पर है, परंतु चुनावी अभियान से लोक जीवन के जल, जंगल एवं जमीन के मुद्दे गायब हैं। सब जानते हैं कि देश का आर्थिक विकास एवं ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर रहता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो ये संसाधन पैदावार बढ़ाने के लिए भी जरूरी हैं। विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग की 1987 में जारी रिपोर्ट में बड़ी दृढ़ता एवं स्पष्टता से कहा गया था कि  ‘सभी देशों की सरकारें यह समझ लें कि उनके देश की अर्थव्यवस्था जिस नाजुक धुरी पर टिकी है, वह है - वहां के प्राकृतिक संसाधन’, लेकिन मौजूदा चुनाव अभियान बताते हैं कि हमारे देश में जल, जंगल एवं जमीन की कोई पूछ-परख नहीं है। मसलन, जीवन का आधार माने गए जल की उपलब्धता लगातार घटती जा रही है। आजादी के समय प्रति व्यक्ति 6000 घन मीटर जल उपलब्ध था, जो वर्ष 2010 में घटकर लगभग 1600 घन मीटर ही रह गया।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार यह जल उपलब्धता वर्ष 2025 में 1341 घन मीटर तथा 2050 तक 1140 घन मीटर ही रह जाएगी। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीच्यूट की मार्च 2016 की रिपोर्ट के अनुसार भारत का 54 प्रतिशत हिस्सा पानी की कमी से परेशान है। नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि एक तरफ देश के लगभग 60 करोड़ लोग पानी की भयानक कमी से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ 70 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं बचा है। भू-जल स्तर गिरने, सूखा, कृषि, कारखानों एवं निर्माण कार्यों में बढ़ती पानी की मांग, सतही जल स्रोतों के बढ़ते प्रदूषण एवं गलत जल प्रबंधन जैसी चुनौतियां, मौसमी बदलाव व जलवायु परिवर्तन के चलते और बढ़ेंगी। जल एवं जंगल के अटूट रिश्ते को कौन नहीं जानता? किसी प्रकृति प्रेमी ने वर्षों पूर्व लिखा था कि ‘जिन पेड़ों, जंगलों पर बादलों के जनवासे (बारात के ठहरने की जगह) दिए जाते थे, उनका सफाया हो रहा है’। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार मैदानी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में क्रमशः 33 एवं 66 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल होना जरूरी हैं, परंतु यह स्थिति कहीं ठीक नहीं है। आज देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग 21-22 प्रतिशत क्षेत्र पर ही जंगल हैं। इनमें भी 2-3 प्रतिशत सघन वन, 11-12 प्रतिशत मध्यम वन और 9-10 प्रतिशत छितरे जंगल हैं। देश के 16 पहाड़ी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में केवल 40 प्रतिशत भाग पर ही जंगल हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में देश के जंगलों का एक-चौथाई हिस्सा है, परंतु यहां वर्ष 2015 से 2017 के मध्य लगभग 630 वर्ग किमी जंगल क्षेत्र घट गया है। यह इलाका दुनिया के 18 प्रमुख जैव-विविधता क्षेत्रों में आता है। जानकारों के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत जैव-विविधता जंगलों में ही पाई जाती है। एक आकलन के अनुसार देश में जंगलों के घटने से 20 प्रतिशत से ज्यादा जंगली पौधों एवं जीवों पर विलुप्ति का खतरा फैल गया है। हिमालयी पर्वतमाला, अरावली पहाडि़यां, विंध्याचल एवं सतपुड़ा के पहाड़ तथा पश्चिमी-घाट क्षेत्र में भी विकास कार्यों के लिए भारी मात्रा में जंगल काटे गए हैं एवं काटे जा रहे हैं। 20वीं सदी के अंत तक अरावली पहाडि़यों पर 50 प्रतिशत हरियाली थी, जो अब घटकर महज .07 प्रतिशत रह गई है। अवैध खनन से कई स्थानों पर समाप्त पहाडि़यों के कारण थार के रेगिस्तान की रेत दिल्ली की ओर आ रही है। जाहिर है, देश की राजधानी दिल्ली रेगिस्तान विस्तार की गिरफ्त में है। जल एवं जंगल का जमीन से भी गहरा रिश्ता होता है, क्योंकि जमीन ही इन दोनों को जगह देकर खेती में मददगार होती है। खेती के लिए उपजाऊ भूमि जरूरी है, परंतु हमारे देश में खेती की भूमि पर दो प्रकार के संकट हैं। पहला, बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण एवं परिवहन योजनाओं के कारण इसका क्षेत्र घटता जा रहा है। दूसरा, बाढ़, सूखा, अम्लीयता, क्षारीयता, प्रदूषण एवं जल-जमाव आदि कारणों से इसकी उत्पादकता कम हो रही है। ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ ने कुछ वर्ष पूर्व अपने एक अध्ययन में बताया था कि देश की कुल 150 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 12 करोड़ की पैदावार घट गई है एवं 84 लाख हेक्टेयर समस्या ग्रस्त है।

आठ राज्यों (राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड, गोवा, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और त्रिपुरा) में लगभग 40 से 70 प्रतिशत भूमि कई कारणों से बंजर होने की कगार पर है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश में जल, जंगल, जमीन एवं खेती के हालात अच्छे नहीं हैं, लेकिन इन पर किसी भी राजनीतिक दल ने सत्रहवीं लोकसभा के इस चुनाव में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। किसानों को कर्जमाफी एवं कुछ राशि देने की ही चर्चाएं होती रही हैं, परंतु इससे जल, जंगल, जमीन एवं खेती के सुधरने के कोई आसार नजर नहीं आते। ये सारे संसाधन मनुष्य के जीवनयापन के लिए जरूरी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। यही मनुष्य आखिरकार चुनाव में भी वोटर या मतदाता होता है। पिछले पंद्रह सालों में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के दौरान राजधानी भोपाल में अंधाधुंध काटे गए पेड़ों और इस वजह से करीब दो डिग्री तक बढ़े शहर के तापमान के बारे में जब नई सरकार के मुख्यमंत्री को बताया गया, तो उनका कहना था कि ‘विकास के लिए पेड़ तो काटने ही पड़ते हैं’।

जीने-मरने के बुनियादी मुद्दों और मौजूदा राजनीति के बीच लगातार बढ़ती खाई को समझने के लिए यह एक उदाहरण भर है। राजनीतिक दल इन संसाधनों के रख-रखाव, संरक्षण एवं उन्हें बढ़ाने की ओर प्रतिबद्धता दर्शाते, तो यह वोटरों को लाभ पहुंचाने का ही प्रयास माना जाता। देश में जलवायु परिवर्तन से पैदा समस्याओं के प्रति भी विभिन्न राजनीतिक दलों ने उदासीनता ही दिखाई है। कई देशों में तो अब पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग से दल तक बन रहे हैं, परंतु हमारे यहां अभी तक किसी भी लोकसभा चुनाव में पर्यावरण, कोई मुद्दा तक नहीं बना है।

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