Monday, October 21, 2019 10:57 AM

चूक के लिए सूली

जनमंच की वकालत में एक जेई को मिली सजा के कई मायने देखे जाएंगे। सरकारी कार्यसंस्कृति के बिखराव की कहानी में कनिष्ठ अभियंता का रुतबा अगर कठघरे में खड़ा है, तो यह स्थिति यहीं खत्म नहीं होती। कमोबेश हर विभाग की कार्यप्रणाली से आहत जनभावनाएं आक्रोशित हैं और अगर जनमंच की पैरवी में कार्रवाई होगी, तो सुजानपुर के मामले की तरह हर चूक के लिए कोई न कोई सूली तैयार होगी। सुजानपुर के पटलांदर क्षेत्र में छह माह से चल रही बिजली समस्या पर आंखें मूंद कर बैठी कार्यसंस्कृति के कान पकड़े गए, तो पता लगाया जा सकता है कि किस क्षेत्र में कौन सारी व्यवस्था को चौपट कर रहा है। कार्यालयों की दीवारें इतनी असंवेदनशील क्यों हो रही हैं और सरकारी नौकरी का फालूदा इतने सस्ते में क्यों जाया हो रहा है, विचारणीय है। पहली बार जनमंच ने आम जनता और सरकार के बीच बाधाओं के रोड़े हटाने का काम किया और यह श्रेय पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री को जाता है कि उन्होंने अकर्मण्यता को सजा देते हुए जेई को चार्जशीट करने के लिए निर्देश जारी किए। दरअसल सरकारी क्षेत्र की निगरानी व जवाबदेही का कोई सबूत ढूंढना मुश्किल हो चला है, जबकि ऐसे दायित्व में निजी क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतरीन रहता है। सरकारी क्षेत्र का जरूरत से अधिक विस्तार तथा लचर प्रबंधन इसके लिए जिम्मेदार रहा है। इसके साथ ही आर्थिक संसाधनों का दुरुपयोग भी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए कुछ विभागीय कार्यालय, सरकारी परिवहन सेवा, प्रयोगशालाएं, किसान-बागबान से जुड़ी सेवाएं तथा जनसुविधाओं से जुड़े सेवा क्षेत्र को पूछने वाला ही कोई नहीं। सरकारी तौर पर बीजों का वितरण हो या विभिन्न योजनाओं का प्रसार, सरकार का ढांचा केवल शिकायतें जोड़ता है। जनता को न पूछने का हक और न ही पाने का रास्ता मिलता, लिहाजा जनमंच में हर आक्रोश का जायजा कठोर कदमों से लेना होगा। जनमंच की रसीद में अगर कार्यसंस्कृति सुधर जाए, तो इसका उद्देश्य पूर्ण होगा, वरना यह भी कहीं रस्साकशी का मजमून न बन जाए। जिस तरह बिलासपुर के पूर्व विधायक बंबर सिंह ने जनमंच से ऊंचा अपने विरोध का मंच खड़ा किया, उसे भी समझना होगा। जनमंच भी एक तरह की जवाबदेही से ओतप्रोत दायित्व की दिशा में बढ़ रहा है, अतः इसके आसपास लोकतांत्रिक विरोध के बहाने ढूंढे जाएंगे। ऐसे में इसकी पद्धति और कर्मठता को अपने सांचे में विद्रूप होने से बचना है। हमारा मानना है कि हर बार जनमंच किसी न किसी एक विषय को निर्धारित करे। जैसे अगली बार बरसात के साथ विभागीय कसौटियों पर जनमंच हो तो किसान-बागबान के अलावा अधोसंरचना के साथ जुड़े विभाग और सेहत महकमे की तफतीश हो जाएगी। जनमंच की गद्दी पर बैठे मंत्री के हिसाब से भी विभागीय परीक्षण का नया दौर शुरू किया जा सकता है। हर मंत्री जनमंच के मार्फत अपने विभाग के कार्यों से रू-ब-रू हो सकता है और इसके लिए जनमंच से उतर कर उस हलके का जायजा लेना होगा। उदाहरण के लिए अगर सिरमौर के किसी जनमंच में एक दिन शिक्षा मंत्री जनता की नब्ज टटोल रहे हैं तो दूसरे दिन उन्हें उसी विधानसभा के संपूर्ण क्षेत्र की शिक्षा से संबंधी यथार्थपूर्ण पड़ताल करते हुए राज्य स्तरीय फीडबैक सिस्टम को वरीयता देनी होगी। जनता बहुत कुछ बताना-आजमाना चाहती है, लेकिन जनमंच को सदा गैरराजनीतिक सदाशयता में सबके सामने पेश होना होगा।