Sunday, September 15, 2019 01:00 PM

छत्रपति मेरे अस्तित्व की रचना

किताब के संदर्भ में लेखक

दिव्य हिमाचल के साथ

साहित्य में शब्द की संभावना शाश्वत है और इसी संवेग में बहते कई लेखक मनीषी हो जाते हैं, तो कुछ अलंकृत होकर मानव चित्रण  का बोध कराते हैं। लेखक महज रचना नहीं हो सकता और न ही यथार्थ के पहियों पर दौड़ते जीवन का मुसाफिर, बल्कि युगों-युगों की शब्दाबली में तैरती सृजन की नाव पर अगर कोई विचारधारा अग्रसर है, तो उसका नाविक बनने का अवसर ही साहित्यिक जीवन की परिभाषा है, जो बनते-संवरते, टूटते-बिखरते और एकत्रित होते ज्वारभाटों के बीच सृजन की पहचान का मार्ग प्रशस्त करता है। यह शाृंखला किसी ज्ञान या साहित्य की शर्तों से हटकर, केवल सृजन की अनवरत धाराओं में बहते लेखक समुदाय को छूने भर की कोशिश है। इस क्रम में जब हमने प्रो. परमानंद शर्मा के वीर रस प्रधान महाकाव्य ‘छत्रपति’ की पड़ताल की तो कई पहलू सामने आए... 

दिहि : जिस सृजन को आपने आयुपर्यंत महसूस किया या उम्र के हर दौर ने कलम को जो अनुभव परोसा, उसे कैसे देखते हैं?

पीएन शर्मा : मैं अपनी रचनाओं तथा उनकी रचना-धर्मिता से पूर्ण-रूपेण संतुष्ट हूं। यदि आप बहु-भाषा विज्ञ हैं तो आपके आत्मबोध की अभिव्यक्ति विविध भाषायी रचनाओं में भी हो सकती है। उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, पहाड़ी में मेरी समान नीति है। अतः मेरी काव्य साधना इन सब भाषाओं में अनवरत रूप से प्रफुल्लित हुई है।

दिहि : साहित्य की विभिन्न छवियों के बीच ऐसी कौन सी आकृति बना पाए, जो वास्तव में अदृश्य कल्पना का अनुराग, अनुनाद या अनुपथ रही?

पीएन शर्मा : मेरी छवि मुख्यतः एक राष्ट्रवादी कवि की रही है, क्योंकि मेरे काव्य-गं्रथों के नायक राष्ट्र के प्रेरणा-स्वरूप राष्ट्र-नायक ही रहे - शिवाजी, बंदा बहादुर, पोरस, लाल बहादुर शास्त्री आदि-आदि। हां, फुटकर कविताएं और गीत इनसे भिन्न श्रेणी में आते हैं।

दिहि : ‘छत्रपति’ की रचना आपके लिए कृति से कहीं अधिक शोध, संकल्प या संवेदना का मंचन सरीखी रही या यह आपके भीतर से अस्तित्व की अभिव्यक्ति है?

पीएन शर्मा : आप ने ठीक कहा कि ‘छत्रपति’ मेरे भीतर के अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। अपितु यह वीर-रस प्रधान महाकाव्य शतशः शास्त्र-सम्मत निर्धारित पूर्ववर्ती मानंदडों के अनुरूप है। प्रकृति का संजीदा वर्णन, छंद यात्रा की परिपाटी, सब-रस उपस्थिति, कवित्व तथा चरित्र-चित्रण संयोग, कथानक की ऐतिहासिकता आदि-आदि मणियों की भांति वीर-रस के सूत्र में प्रोत दृष्टिगत होते हैं।

दिहि : जिस शख्स ने ‘छत्रपति’ जैसे महाकाव्य का सृजन किया हो, उसके लिए अद्यतन धाराओं के संसर्ग में कोई नया ‘युग पुरुष’ अदायगी कर रहा है?

पीएन शर्मा : अद्यतन धाराओं के संसर्ग में मुख्य भूमिका रही है तथाकथित प्रगतिशील लेखक समूह की। फलतः चिर-स्थापित सभी मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ और सृजन में अराजकता की बाढ़ आई। मेरा ‘वाक्यं रसात्मक काव्यम्’ की धारणा में आज भी अटूट विश्वास है। मुक्त छंद में रसात्मकता अनिवार्य है और सब बंधनों से उन्मुक्त होकर मात्र अनुशासनहीनता का पर्याय बनता जा रहा है।

दिहि : वैचारिक गर्दो-गुबार की आंधियों के छोर पर क्या आपके भीतर के लेखक का द्वंद्व आज भी जारी है?

पीएन शर्मा : मेरे भीतर के लेखक में कभी द्वंद्व नहीं हुआ। मैंने ‘सत्य’ धर्म-शांति प्रेम के शाश्वत मूल्यों के आधार पर जीवन जीया है। ‘वैचारिक गर्दो-गुबार’ मंथन प्रक्रिया का आवश्यक एवं अभिन्न अंग है, जिसके पश्चात वातावरण निरभ्र हो जाता है। यह द्वंद्व चिंता का विषय नहीं बनना चाहिए।

दिहि : भीड़ में चेहरे पढ़ने की कोई तो वजह रही होगी या आपका व्यावसायिक दर्पण इतना ऊंचा रहा कि पल और पलकें समानांतार देख पाईं?

पीएन शर्मा : मैंने सत्य और यथार्थ की कसौटी पर भीड़ में चेहरे पढ़ने का प्रयास किया तथा मानव जीवन की विविधता को परखा।

दिहि : क्या देशभक्ति से भारतीयता की पहचान है या अब ‘राष्ट्रवाद’ की अनिवार्यता में देश अपनी ऊर्जा खोज रहा है?

पीएन शर्मा : भारत की पहचान ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सार्वभौम आदर्श से है न कि राष्ट्रवाद की अनिवार्यता मात्र से। केवल राष्ट्रवाद में अपनी ऊर्जा की खोज में सीमित कर लेना महज एक राजनीतिक स्टंट है। सभी राष्ट्र अपने राष्ट्र हेतु राष्ट्रवादी ही होते हैं न कि राष्ट्र विरोधी। अतः राष्ट्रवाद को अलग से मुख्य मुद्दा बनाना ठीक नहीं।

दिहि : आपको अपने भावों का कवितामय जीवन रास आया या समय, समाज की पड़ताल से अलग कहीं जीवन के उपवन में अर्जित ऊर्जा का स्रोत रहा लेखन?

पीएन शर्मा : निस्संदेह मुझे अपने भावों का कवितामय जीवन भाया और पूर्णतः रास आया।

दिहि : इतिहास के गौरव में आपके लेखन की अस्मिता और जगह किस तरह तय होती रही?

पीएन शर्मा : इतिहास के गौरव में उचित स्थान पाने से वंचित रहा हूं, क्योंकि इतिहास पर उत्तर प्रदेश के मेधावियों की एक छत्र जकड़ रही है। हां, अनेक साहित्यिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा मुझे भरपूर सम्मान मिला है समय-समय पर।

दिहि : वैचारिक दुनिया की टूट-फूट के बीच जो जीया या लेखन की पुरातन से नई परिपाटी तक के सफर में जहां जिंदगी के मुहावरे चिर युवा रहे। कोई निरंतरता जिसके सेतु पर आप सैदव विजयी महसूस करते हैं?

पीएन शर्मा : वैचारिक दुनिया की टूट-फूट के बीच अनेक बार विवाद उभरे, परंतु मैं उनसे सरासर अछूता रहा और अपनी साहित्य साधना में यथावत व्यस्त रहा। गुटबंदी से अलग-थलग रहते हुए सृजन पथ पर चलता रहा। 

दिहि : जिंदगी का सुकून कहां मिला। जिन लोगों-किताबों, स्थानों या कलाओं ने आपको प्रभावित किया?

पीएन शर्मा : जिंदगी का सुकून सृजनशीलता की अनवरतता में मिला। उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी का ज्ञान रहते इनके साहित्य का भरपूर अध्ययन मेरे भाव-जगत की अमूल्य पूंजी है। समस्त धर्म ग्रंथों का गहन स्वाध्याय जिनमें कुरान, बाइबल, जेंदावस्ता, सिखों का आदि ग्रंथ और दशम ग्रंथ भी आते हैं। फैजी का फारसी गीता-अनुवाद, दाराशकोह और खुसरो की रचनाएं, बुल्लेशाह आदि का सूफी कलाम आदि-आदि। कहां तक गिनाऊं?

दिहि : कोई शब्द, विचार या विचारधारा। दार्शनिक, कवि या शायर का कहा हुआ जो अकसर जुबान पर आ जाता है?

पीएन शर्मा : मिज़र्ा ग़ालिब का यह शेर मुझे बहुत पसंद हैः ‘देखना तकरीर की लज्जत कि जो उसने कहा, मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है।’ अर्थात कलाम/कविता वह जो श्रोता-मन मोह ले।

दिहि : जीवन में जो खोया-पाया या जिसे लौटा पाए। हमारे पाठकों को आपका मंत्र?

पीएन शर्मा : मैंने जीवन के विविधता पूर्ण आयामों को एक यायावर की तरह सहर्ष साहस से भोगा। मनुष्य जीवन को एक ईश्वर-प्रदत्त अमूल्य अवसर के रूप में लेना चाहिए। इसके प्रति सकारात्मक दृष्टि की चेष्टा ही संतोष-सुख प्रदान करती है। सत्य का पथ कठिन है, पर सही है, क्योंकि अंततोगत्वा ‘सत्यमेव जयते नाऽनृतं’।  

-विनोद कुमार, धर्मशाला