Saturday, July 20, 2019 11:47 PM

छात्रों के 250 करोड़ पर डाका

केंद्र और प्रदेश सरकार ने हर बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं। इसके अलावा आर्थिक तंगी के चलते किसी होनहार की पढ़ाई न छूट जाए, इसके लिए भी छात्रवृत्ति योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन बच्चों की छात्रवृत्ति पर भी कई शातिर गिद्ध दृष्टि डाले हुए हैं। हिमाचल में तो ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो अब तक छात्रों के करोड़ों रुपए डकार चुका है। 250 करोड़ रुपए के स्कॉलरशिप घोटाले की पड़ताल करता इस बार का दखल.....

सूत्रधार : आरपी नेगी, प्रतिमा चौहान

 

प्रदेश के एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की स्कॉलरशिप हड़पने वाली कई बड़ी मछलियां अब सीबीआई के जाल में फंसेगी। हालांकि पिछले एक महीने से केंद्रीय जांच एजेंसी प्रदेश और राज्य से बाहर निजी शिक्षण संस्थानों पर नकेल कसने के लिए जांच कर रही है, लेकिन पिछले कितने वर्षों से ऐसा धंधा चल रहा था, इसका पर्दाफाश सीबीआई ही कर सकती है। पूर्व की वीरभद्र सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान ही मामला प्रकाश में आया था तो मामले को गंभीरता से नहीं लिया। विपक्ष की ओर से बार-बार आवाज उठने पर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने मामले की जांच सीबीआई से करने की बात कही थी। दिसंबर 2017 में विधानसभा चुनाव हुए और सत्ता परिवर्तन हुआ। प्रदेश में जयराम सरकार बनी और मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। प्रदेश सरकार को पहले से ही हिमाचल पुलिस पर जांच का भरोसा नहीं था। इस कारण केस की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी के हवाले करने का निर्णय लिया। जून 2018 में प्रदेश की जयराम सरकार ने सीबीआई को मामले भेजा गया। आधी-अधूरी जानकारी के साथ फाइल सीबीआई को पहुंची तो वहां से वही फाइल वापस प्रदेश सरकार को आई। सीबीआई ने प्रदेश सरकार और हिमाचल पुलिस को सख्त निर्देश दिए थे कि प्रारंभिक जांच की एफआईकर उसकी कॉपी साथ भेज दें। नवंबर 2018 में हिमाचल पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर प्रारंभिक जांच शुरू दी और रिपोर्ट कार्मिक मंत्रालय भारत सरकार को भेज दी। उसके बाद कार्मिक मंत्रालय ने भी यह कह कर फाइल वापस कर दी इसमें एफआईआर नंबर नहीं हैं। मार्च 2019 में गृह विभाग ने सभी औपचारिकताएं पूरी कर फाइल फिर से कार्मिक मंत्रालय भारत सरकार को भेज दी। ठीक आठ अप्रैल 2019 को कार्मिक मंत्रालय ने सीबीआई को मामला दर्ज करने की अनुमति दी और 250 करोड़ की छात्रवृत्ति घोटाले में सीबीआई के शिमला थाना में आईपीसी की धारा 409, 419, 465, 466 और 471 के तहत पहली एफआईआर दर्ज कर दी है। उसी दिन से प्रदेश और प्रदेश के बाहर निजी शिक्षण संस्थानों में हड़कंप मच गई। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा पहले ही नामित किए गए 22 निजी शिक्षण संस्थानों में सीबीआई ने दबिश दी और जांच चल रही है।

32 स्कीम हजारों में स्कॉलरशिप

हिमाचल प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में मिलने वाला वजीफा अलग-अलग कैटेगिरी और मैरीटोरिएल बेस पर मिलता है। प्रदेश में छात्रवृत्ति की पूरी 32 स्कीमें हैं, जिस में से अठारह छात्रवृत्ति योजना सरकार की है, और चौदह राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई है। खास बात यह भी है कि प्रदेश के आईटी संबधित विभाग में ट्रेनिंग करने वाले छात्रों को राज्य सरकार हर साल 75 हजार तक की राशि भी उपलब्ध करवाती है। प्रदेश में किसी भी छात्रों को आर्थिंक स्थिति कमजोर होने की वजह से पढ़ाई से पीछे न रहना पड़े, इसके लिए हर साल समय पर छात्रवृित्त का बजट छात्रों तक पहुंचाने का प्रयास विभाग द्वारा किया जाता है।  छात्रों को मिलने वाले वजीफे की राशि 250 से लेकर 5000, 10,000 तक है।

घोटाले में अब तक क्या..

* जनवरी, 2016 में आई थी  पहली शिकायत

* पूर्व सरकार ने सीबीआई से जांच करवाने को कहा था

* प्रदेश की जयराम सरकार ने गंभीरता दिखाते हुए 2018 में केस सीबीआई के हवाले कर दिया

* दिसंबर 2018 में शिक्षा विभाग ने अधूरा ब्यौरा सीबीआई को भेजा

* जनवरी में शिमला पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर शिक्षा विभाग को सौंपी थी रिपोर्ट

* तीन महीने तक कार्मिक मंत्रालय भारत सरकार में फंसी रही केस की फाइल

* आठ मई को शिमला थाने में दर्ज की एफआईआर

* शुरुआती जांच में खुलासा, 22 निजी शिक्षण संस्थानों ने हड़प लिए करोड़ों रुपए

22 संस्थानों के कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर जब्त

ई-पास पोर्टल से छेड़खानी, विभागाय कर्मचारी संदेह के घेरे में

स्कॉलरशिप घोटाले मामले में निजी शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ शिक्षा विभाग के कुछ अधिकरी और कर्मचारियों पर भी गाज गिर सकती है। सीबीआई जांच में सामने आया है कि शिक्षा विभाग में छात्रों के लिए तैयार किया गया ई-पास पोर्टल से भी छेड़खानी की गई है। प्रदेश सरकार द्वारा पहली जांच रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है। इसे देखते हुए अब सीबीआई कभी भी उच्च शिक्षा विभाग के ऐसे अधिकारी और कर्मचारी जिन्होंने पोर्टल के साथ छेड़खानी की, उनसे पूछताछ कर सकती है।  बता दें कि इस पोर्टल में दो लाख 90 हजार कर्मचारी शामिल है। सीबीआई अभी पहले चरण में निजी शिक्षण संस्थानों से रिकार्ड कब्जे में ले रही है, लेकिन आने वाले दिनों में शिक्षा विभाग की स्कालरशिप ब्रांच के अधिकारियों सहित कर्मचारियों पर भी गाज गिर सकती है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने शिक्षा विभाग से वर्ष 2013 से लेकर 2018 तक का पूरा ब्यौरा मांगा। जिसमें से अभी तक 2013 और 2014 को नहीं दिया। कारण यह है कि सीबीआई को हार्ड कॉपी चाहिए, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग के कर्मचारी माथापच्ची कर रहे हैं। ऐसे में जाहिर है कि स्कॉलरशिप घोटाले में निजी शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ उच्च शिक्षा विभाग भी सीबीआई के राडार पर हैं।

ऑनलाइन ही जारी होता है वजीफा

स्कॉलरशीप के लिए छात्रों की ऑनलाइन ई-पास सॉफ्टवेयर के तहत ऑनलाइन सम्बीशन करवाई जाती है, जिसका पोर्टल विभाग निर्धारित समय सीमा के  तहत खोलता है। इस दौरान छात्रों को ऑनलाइन सम्बीशन का समय दिया जाता है। सम्बीशन  समय पर भरने के लिए और छात्रों को जागरूक करने के मकसद से विज्ञापन भी जारी होते है। अंतिम तिथि के बाद छात्रों की आई ऑनलाइन एप्लीकेशन को वैरिफाई किया जाता है। शिक्षा विभाग तीन जगह से छात्रवृत्ति के दस्तावेज वैरिफाई होते हैं, इसके बाद ही छात्रों का वजीफा उन्हें ऑनलाइन जारी किया जाता है।

शिक्षा विभाग की निगरानी में पूरा प्रोजेक्ट

छात्रवृत्ति के पूरे प्रोजेक्ट को शिक्षा विभाग ही हैंडल करता है। हालांकि स्कूल लेवल पर जो पात्र छात्र वजीफे के लिए अप्लाई करते हैं, उनके आवेदन व दस्तावेज उपनिदेशक लेवल पर वैरिफाई किए जाते हैं, वहीं अगर बात करें, कालेजों की तो यहां पर छात्रों को मिलने वाली स्कॉलरशिप सीधे शिक्षा निदेशालय से वैरिफाई कई बार की जाती है।

शिक्षा विभाग ने अभी नहीं की कोई कार्रवाई

वर्ष 2014 में हुए छात्रवृित्त घोटाले को लेकर शिक्षा विभाग की तरफ से अभी तक किसी भी कर्मचारी पर कोई भी कार्रवाई नहीं हो पाई है। हालांकि करोड़ों के इस घोटाले में शिक्षा विभाग से लेकर निजी शिक्षण संस्थानों के कई कर्मचारियों के नाम शामिल हैं। शिक्षा विभाग का तर्क है कि वह अभी तक इस वजह से भी अपने लेवल पर कार्रवाई नहीं कर पाए हैं, क्योंकि इस पूरे मामले की जांच सीबीआई कर रही है। बता दें कि वर्ष 2016 में एक बार शिक्षा विभाग ने अंबाला के एक निजी शिक्षण संस्थान को 77,000 तक का जुर्माना लगाया था। यह जुर्माना तब लगाया गया था क्योंकि उक्त संस्थान में पढ़ने वाले छात्र की छात्रवृत्ति समय गलत खाते में डाली गई थी। हालांकि बाद संस्थान ने इस बारे में माफी कर पात्र छात्र को वजीफा समय पर डाल दिया था। कुल मिलाकर 250 करोड़ के घोटाले में अभी तक शिक्षा विभाग की कार्रवाई जीरों रही है। हालांकि उसके बाद विभाग ने छात्रवृित्त आबंटन को लेकर कई नए नियम तैयार किए हैं।

लाहुल-स्पीति से उठी चिंगारी

राज्य सरकार को शिकायत मिली थी कि जनजातीय क्षेत्र लाहुल-स्पीति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति राशि नहीं मिल रहीं है। मामला वर्ष 2016 में प्रकाश में आया, लेकिन पूर्व की वीरभद्र सिंह सरकार ने जांच करने में रुचि नहीं दिखाई। बाद में जयराम सरकार में कृषि मंत्री डा. रामलाल मार्कंडेय जो स्वयं लाहुल-स्पीति से संबंध रखते हैं, उनके क्षेत्र के बच्चों ने फिर से दुखड़ा उनको सुनाया और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कड़ा संज्ञान लिया।

फ्रॉड में कई निजी संस्थानों की भूमिका

स्कॉलरशिप घोटाले में शिमला पुलिस ने शिक्षा विभाग की शिकायत के आधार पर जो एफआईआर दर्ज की थी, उसमें भी कुछ निजी शिक्षण संस्थानों के नामों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद कुछ संस्थानों के प्रतिनिधि सचिवालय भी पहुंचे थे। स्कॉलरशिप घोटाला देश के कई राज्यों में फैला हुआ है। कई राष्ट्रीयकृत बैंक भी इसमें शामिल हैं। शिक्षा विभाग द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि कई निजी शिक्षण संस्थानों ने फर्जी एडमिशन दिखाकर सरकारी धनराशि का गबन किया है।

कई 420 संस्थानों में खौफ

प्रदेश सहित अन्य राज्यों में संचालित निजी शिक्षण संस्थानों को खौफ सताने लगा है। इस मामले में कई बडे़ शिक्षण संस्थान जांच के दायरे में हैं। बताया गया कि शिमला पुलिस ने शिक्षा विभाग की शिकायत के आधार पर जो एफआईआर दर्ज की थी, उसमें भी कुछ निजी शिक्षण संस्थानों के नामों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद कुछ संस्थानों के प्रतिनिधि सचिवालय भी पहुंचे थे। स्कॉलरशिप घोटाला देश के कई राज्यों में फैला हुआ है। कई राष्ट्रीयकृत बैंक भी इसमें शामिल हैं। शिक्षा विभाग द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में पाया गया था कि कई निजी शिक्षण संस्थानों ने फर्जी एडमिशन दिखाकर सरकारी धनराशि का गबन किया है। अभी तक जांच के दौरान सीबीआई ने किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया है।

 छात्रवृत्ति का 80 फीसदी बजट निजी संस्थानों में बंटा

80 फीसदी छात्रवृत्ति का बजट सिर्फ  निजी संस्थानों में बांटा गया, जबकि सरकारी संस्थानों को छात्रवृत्ति के बजट का मात्र 20 फीसदी हिस्सा मिला।  बीते चार साल में 2.38 लाख विद्यार्थियों में से 19 हजार 915 को चार मोबाइल फोन नंबर से जुड़े बैंक खातों में छात्रवृत्ति राशि जारी कर दी गई। इसी तरह 360 विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति चार ही बैंक खातों में ट्रांसफर की गई। 5729 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने में तो आधार नंबर का प्रयोग ही नहीं किया गया है।

अब वजीफे को अपना पोर्टल

हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग का देरी से ही सही, लेकिन अब वजीफे के लिए अलग से पोर्टल होगा। शिक्षा विभाग ने पहली बार वजीफे के लिए अपना-अलग पोर्टल तैयार किया है। खास बात यह है कि इस नए पोर्टल को राज्य सरकार ने भी मंजूरी दे दी है। अब जल्द ही शिक्षा विभाग इस पोर्टल का छात्रों को जाने वाली स्कॉलरशिप के लिए इस्तेमाल करेगा। जानकारी के मुताबिक शिक्षा विभाग का वजीफे से संबंधित पोर्टल लांच होने के बाद पात्र छात्रों को पीएफएमएस और डीबीटी के माध्यम से छात्रवृत्ति की राशि जारी होगी। नए पोर्टल को पूरी तरह से सिक्योर रखा जाएगा। कोई भी अधिकारी इस पोर्टल को आसानी से नहीं खोल पाएंगे। आईटी विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर शिक्षा विभाग ने यह ऑनलाइन मॉड््यूल तैयार किया है। शिक्षा विभाग का दावा है कि छात्रों को अब डीबीटी यानी कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कॉलरशिप का फायदा मिलेगा। विभागीय जानकारी के अनुसार शिक्षा विभाग ने तय किया है कि संस्थान लेवल पर भी अलग से छात्रवृत्ति जारी होने के बाद वेरिफिकेशन की जाएगी। वहीं विभिन्न कैटेगरी से छात्रों को मिलने वाली वजीफे की राशि सही अकाउंट में गई है या नहीं, इस पर भी संस्थान से लेकर शिक्षा निदेशालय तक कई बार वेरिफिकेशन होगी।

हैदराबाद की कंपनी से लिया था पोर्टल

इतने वर्षों से शिक्षा विभाग का अपना छात्रवृत्ति पोर्टल नहीं था। हैदराबाद कंपनी से विभाग ने पोर्टल किराए पर लिया है, जिस पर विभाग को हर साल लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। ऐसे में अब यह अच्छी खबर है कि विभाग ने अपना पोर्टल तैयार कर लाखों के बजट को भी बचा दिया है। जानकारी के मुताबिक गत वर्षों में कंपनी ने विभाग से इस पोर्टल का किराया लगभग 15 से 20 लाख तक वसूला था, लेकिन इस साल कंपनी ने इसका किराया बढ़ाया है। इस बार विभाग को इस पोर्टल के लिए 30 लाख रुपए देने होंगे। यहां बतां दें कि गत वर्ष जब करोड़ों रुपए का छात्रवृत्ति घोटाला सामना आए था, तो विभागीय जांच में इसी पोर्टल में अनियमितताएं पाई गई थी। छात्रवृत्ति में हुए करोड़ों के घोटाले में हैदराबाद के इस पोर्टल पर भी कई सवाल उठाए गए थे।  बताया जा रहा है कि  इस पोर्टल को हैंडल करने के लिए शिक्षा विभाग में चुनिंदा ही अधिकारी होंगे।