Monday, June 24, 2019 05:04 PM

छात्र राजनीति में हिंसा

कुलभूषण उपमन्यु

अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

 

हमारे शिक्षण में बुनियादी तौर पर ही यह दोष है कि हम सत्य के खोजी बनने के बजाय अपने-अपने मंतव्य को दूसरों पर थोपने में ज्यादा रुचि लेते हैं। फिर चाहे धार्मिक शिक्षण हो या भौतिक शिक्षण, हम सभी का हाल तो यही है। फिर छात्र हिंसा की ही बात क्यों की जाए। इसका कारण यह है कि पिछली पीढ़ी की गलतियों से सीखकर ही समाज आगे बढ़ा है...

छात्र जीवन जिंदगी के समारंभ की नींव डालने का समय है। जैसी नींव पड़ जाती है, उसके इर्द-गिर्द ही जीवन चलता है। उसके स्तर में गुणात्मक बदलाव बाद में लाना आसान नहीं होता है। जीवन का लक्ष्य निर्धारण भी उसी समझ के आधार पर होता है, जिसका विकास छात्र जीवन में हो जाता है। समझ का अर्थ है जानना। जानना यानी सच्चाई को जानना। भौतिक जगत की सच्चाई, सामाजिक सच्चाई, आध्यात्मिक सच्चाई। या यूं कहें कि हर उस बात की सच्चाई को जानना, जिससे हमारा सामना रोज होता है, ताकि हम अपने निर्णय ठीक तरह से ले सकें। हम कदम उठाते हैं, तो देखते हैं कि जहां कदम रख रहे हैं, वह जगह कैसी है। उस जगह के धरातल के अनुसार ही हम कदम रखते हैं। यदि हमारी नजर कमजोर हो या गलती से हम ठीक से न देख पाएं, तो जाहिर है कि हमारे कदम डगमगा जाएंगे, हम गिर भी सकते हैं। इसलिए ठीक से देखने-समझने का महत्त्व है, फिर चाहे कोई सिद्धांत हो या भौतिक जगत की वास्तविकताएं हों, सामाजिक उलझनें या आध्यात्मिक और धार्मिक आग्रह, सबके विषय में हमारी जानकारी सच्चाई के नजदीक होनी चाहिए।

जितनी हमारी जानकारी सच्चाई के नजदीक होगी, उतना ही हमारा कोई भी अगला कदम धरातल पर ठीक से टिक सकेगा। विज्ञान सृष्टि की भौतिक सच्चाई को जानने के प्रयास में सतत लगा हुआ है। नित नए-नए ज्ञान के स्तर उद्घाटित हो रहे हैं, किंतु कोई यह नहीं कह  सकता कि हमने ज्ञान का ऐसा स्तर हासिल कर लिया है कि अब उससे आगे जानने की कोई जरूरत नहीं है। ज्ञान की खोज की अनंत संभावनाएं हमेशा ही बनी रहेंगी।  आध्यात्म में भी जीवन और सृष्टि के सत्य को जानने का ही प्रयास होता है। यह सृष्टि कैसे बनी, कल को इसका क्या होगा, आत्मा और ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं है, सृष्टि की शुरुआत कहां से हुई। यह अपने भौतिक स्वरूप में ही संपूर्ण है या इसे आत्मिक चेतना से पूर्णता मिलती है, चेतना का भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने के साथ ही नाश हो जाता है या चेतना या आत्मा का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है आदि अनेक प्रश्न अनंत काल से मनुष्य मस्तिष्क को उद्वेलित करते रहे हैं। इनमें से बहुत से प्रश्न ऐसे हैं, जिनका कोई संतोषजनक उत्तर आज दिन तक मिल नहीं पाया है। इसका अर्थ है कि सत्य को पूर्णता से जान पाना संभव नहीं है। भारतीय मनीषियों ने इसलिए यह घोषणा की कि सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म, यानी सत्य ही ईश्वर है, वह ज्ञानवान है और अनंत है। अतः भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर सत्य को अनंत माना गया है। तो फिर जिस ज्ञान की हम बात करते हैं या पाने का प्रयास करते हैं, वह क्या है? उसे हम कहेंगे तुलनात्मक सत्य। जो भी सत्य, चाहे आध्यात्मिक हो या भौतिक, हमारी उसके बारे में समझ तुलनात्मक रूप से कम या ज्यादा होती है। कोई भी संपूर्ण सत्य को जानता नहीं है। इसलिए अपनी-अपनी विचारधारा को लेकर जो हमारे आग्रह या दुराग्रह होते हैं, उनको जब हम अंतिम सत्य मान लेते हैं और दूसरे को भी मनवाने का प्रयास करते हैं, तो संघर्ष और झगड़ों का जन्म होता है।

पांच अंधों के हाथी वाली कहावत की सच्चाई से तो हम सभी जूझ रहे हैं, किंतु हम इस बात को मानना नहीं चाहते और अपने-अपने विचार के आग्रह को झूठे आत्म सम्मान से जोड़ कर उग्र व्यवहार के शिकार हो जाते हैं। छात्र जीवन, क्योंकि जवानी के जोश से भरा रहता है, इसलिए यह उग्रता हिंसक भी हो सकती है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे शिक्षण में बुनियादी तौर पर ही यह दोष है कि हम सत्य के खोजी बनने के बजाय अपने-अपने मंतव्य को दूसरों पर थोपने में ज्यादा रुचि लेते हैं। फिर चाहे धार्मिक शिक्षण हो या भौतिक शिक्षण, हम सभी का हाल तो यही है। फिर छात्र हिंसा की ही बात क्यों की जाए। इसका कारण यह है कि पिछली पीढ़ी की गलतियों से सीखकर ही समाज आगे बढ़ा है।

अतः क्योंकि छात्र आने वाले समाज का निर्माता है,  यदि वह इस बात को समझ ले, तो आने वाला समाज तुलनात्मक दृष्टि से सत्य के पास जाने की ज्यादा शक्ति से संपन्न लोगों का होगा। इससे निस्संदेह बेहतर समाज की रचना में मदद मिलेगी। हालांकि ऐसा समय कभी भी नहीं आ सकता, जब कोई समस्या बाकी नहीं रहे, क्योंकि सृष्टि की बनावट द्वंद्वात्मक है। यह बदली नहीं जा सकती। इसमें दिन के साथ रात और गर्मी के साथ सर्दी तो बनी ही रहेगी। फिर भी वास्तविकता के करीब ज्ञान में बढ़ोतरी से तुलनात्मक रूप से सुधार होना, तो निश्चित ही है। किसी भी प्रयास को वांछित ऊर्जा देने के लिए इतनी आशा बहुत होती है।