Thursday, June 20, 2019 02:27 PM

छायावाद के प्रमुख स्तंभ थे पंत

जयंती विशेष

प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाने वाले सुमित्रानंदन पंत छायावाद व प्रगतिवाद के प्रणेता होने के नाते आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकार हैं। उन्होंने जहां हिंदी साहित्य को नई ऊंचाई दी, वहीं वह एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी भी थे। आजादी की लड़ाई में उनका योगदान भी कमतर नहीं आंका जा सकता। उनका जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) के कौसानी गांव में 20 मई 1900 को हुआ था। उनके जन्म के कुछ घंटों पश्चात ही उनकी मां चल बसी। उनका पालन-पोषण उनकी दादी ने ही किया। उनका वास्तविक नाम गुसाई दत्त रखा गया था। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही हुई। 1918 में वह अपने भाई के साथ काशी आ गए और वहां क्वींस कालेज में पढ़ने लगे।  मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वह इलाहाबाद आ गए। वहां इंटर तक अध्ययन किया। 1919 में महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गए। हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला का स्वाध्याय किया। उनका प्रकृति से असीम लगाव था। बचपन से ही सुंदर रचनाएं लिखा करते थे। जहां तक पुरस्कार व सम्मान की बात है, ‘चिदंबरा’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ, लोकायतन के लिए सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। सन् 1905 में घर के पुरोहित द्वारा विद्यारंभ कराए जाने के पश्चात सुमित्रानंदन को कौसानी के वर्नाक्युलर स्कूल में प्रवेश दिलाया गया। संस्कृत तथा पर्शियन भाषा का ज्ञान उन्हें उनके फूफा जी ने कराया तथा अंग्रेजी व संगीत का ज्ञान भी उन्हें घर पर ही प्राप्त हुआ। इस प्रकार घर पर ही पंत जी को अपने कवि व्यक्तित्व के प्रस्फुटन का अनुकूल वातावरण प्राप्त होता रहा। अल्मोड़ा में इंटर फर्स्ट इयर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात सेकंड इयर की पढ़ाई करने के लिए वह अपने बड़े भाई के साथ बनारस चले गए। सन् 1919 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सुमित्रानंदन पंत प्रयाग आ गए और 10 वर्ष तक प्रयाग में ही रहे। अपने ‘वीणा’ तथा ‘पल्लव’ काव्य संग्रह की अधिकांश कविताओं की रचना उन्होंने प्रयाग में ही की। सन् 1931 में पंतजी अपने बड़े भाई हरिदत्त पंत के पास लखनऊ चले गए जहां उनकी मुलाकात महाकवि निराला व कालाकांकर स्टेट के कुंवर सुरेश सिंह व उनकी धर्मपत्नी से हुई। कुंवर सुरेश सिंह को उनका सान्निध्य इतना भाया कि कुछ ही समय में वह प्रगाढ़ मैत्री में बदल गया। इसी मैत्री के फलस्वरूप उनके जीवन का अधिकांश समय कालाकांकर में बीता। कुंवर सुरेश सिंह के आग्रह पर ही उन्होंने वर्ष 1938 में रूपाभ नामक प्रगतिशील मासिक पत्रिका का संपादन किया। उनके साहित्य सृजन पर नजर डालें तो सात वर्ष की उम्र में जब वह चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। 1918 के आसपास तक वह हिंदी की नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। 1926-27 में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वह अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोड़ा आ गए। इसी दौरान वह मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आए। 1938 में उन्होंने एक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर रघुपति सहाय आदि के साथ वह प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े रहे। वह 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे़ रहे और मुख्य निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविंद से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। ‘वीणा’ तथा ‘पल्लव’ में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। ‘युगांत’ की रचनाओं के लेखन तक वह प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े प्रतीत होते हैं। ‘युगांत’ से ‘ग्राम्या’ तक उनकी काव्य-यात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखर स्वरों की उद्घोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पड़ाव हैं-प्रथम में वह छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविंद दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। 1907 से 1918 के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएं वीणा में संकलित हैं। सन् 1922 में उच्छवास और 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ। साहित्य लेखन के अलावा उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी योगदान किया। सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने कालेज छोड़ दिया था, पर देश के स्वतंत्रता संग्राम की गंभीरता के प्रति उनका ध्यान 1930 के नमक सत्याग्रह के समय से अधिक केंद्रित होने लगा। इन्हीं दिनों संयोगवश उन्हें कालाकांकर में ग्राम जीवन के अधिक निकट संपर्क में आने का अवसर मिला। उस ग्राम जीवन की पृष्ठभूमि में जो संवेदन उनके हृदय में अंकित होने लगे, उन्हें वाणी देने का प्रयत्न उन्होंने युगवाणी और ग्राम्या में किया। यहां से उनका काव्य युग का जीवन-संघर्ष तथा नई चेतना का दर्पण बन जाता है। 28 दिसंबर 1977 को उनका निधन हो गया। अब वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन साहित्य के जरिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।

प्रमुख कृतियां

वीणा, उच्छवास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन, पल्लवी, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ और सत्यकाम उनकी रचनाएं हैं।

प्रकृति के सुकुमार कवि

पंत को प्रकृति से बहुत प्यार था। प्रकृति पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है। प्रकृति के लिए वह सुंदर युवती को भी छोड़ने के लिए तैयार हैं, यह उनकी प्रमुख कविता से साफ झलकता है :

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से माया

बाले तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन।