Wednesday, September 18, 2019 05:15 PM

छिलकों की छाबड़ी

अशोक गौतम

साहित्यकार

ये तो सरेआम गुंडागर्दी है यार हे इतिहासकारो! आप किसी भी सरकारी आफिस के भूत, वर्तमान और भविष्य का इतिहास उठा कर देख लीजिए। वहां आपको दो किस्मों के ही कर्मठ वर्कर मिलेंगे। एक साहब प्रिय, दूसरे सरकार प्रिय। इसके सिवाय कोई तीसरी किस्म का प्राणी जो आपको वहां मिल जाए तो आपके जूते पानी पीऊं। साहब के बंदे साहब के सिवाय कोई दूसरा काम करें तो नरक के भागीदार बनें। सरकार के बंदे अपनी सरकार के होते काम के नाम पर तिनका भी तोड़े तो लानत है उन पर। असल में साहब के बंदों को साहब को सजाते-भरमाते ही इतना वक्त लग जाता है कि आफिस के दूसरे कामों को वक्त ही नहीं निकल पाता, चाहकर भी। नई सरकार के गठन होते ही कई दिनों से जिस बात का डर था, सुबह जब आफिस पहुंचा तो वह हो चुका था। पुरानी वाली सरकार में जो मेरे साथ वाली कुर्सी के पुरानी सरकार के मंत्री के भाई के दोस्त होकर हाथ पर हाथ धरे पांच साल काम को हराम करार देते काट चुके थे, वे खुल्लम-खुल्ला नई सरकार के मंत्री के चाचा के अघोषित-घोषित, स्वयं पोषित घनिष्ठ दोस्त हो चुके थे। इतना सब पता होने के बावजूद भी पता नहीं क्यों साहब ने उसे आफिस में कुछ काम करने को कह दिया। सरकार के बंदे को आफिस का काम करने को कहना सोए नहीं बल्कि जागे शेर की मांद में हाथ डालने से कम नहीं होता। बस, फिर क्या था! हो गया हंगामा। हंगामा तो होना ही था। पर जब तक मैं गिरता पड़ता आफिस पहुंचा, हंगामा खत्म होकर उसकी कुर्सी के पास आ चुका था। कमरे में घुसा तो उसने साहब के बदले कमरा सिर पर उठाया हुआ, अकेला ही बड़बड़ाए जा रहा था, गिरा आसमान सिर पर उठाए। मुझे देखा तो कुछ और जोर से बड़बड़ाने लगा, ज्यों मैं बहरा हो।  हद है ! ये तो सरेआम गुंडागर्दी है यार! बड़ा अफसर बना फिरता है साला अपने आपको ! जुगाड़ कर प्रमोशन क्या करवा ली कि... चार दिन में ही जो इसका तबादला न करवा दिया तो... मेरा नाम भी.... ये कहां का इंसाफ  है कि सरकार का बंदा अपनी सरकार होते हुए भी आफिस में काम करे? उसने जब गई सरकार के वक्त ही इधर-उधर की हांकते टाइम काट दिया तो अब तो उसकी अपनी सरकार है। साला ये होता कौन है मुझे पूछने वाला? अपनी सरकार होते हुए जो बंदे को आफिस में काम करना पड़े तो वह सरकार का बंदा ही काहे का! लानत है ऐसे बंदों पर जो अपनी सरकार आने पर अपनी कार्य शैली बदलते हैं। मुझसे काम करवाने से पहले अपने चमचों से काम करवा कर देखे तो जानूं। उनको तो बस जब देखो, अपनी कुर्सी से बांध कर रखे रहता है। उनके काम तो कभी इसको, तो कभी उसको देता रहता है। अरे यार! हमने तो तब भी काम नहीं किया, जब दूसरों की सरकार थी। अब तो अपनी सरकार है अपनी। अब तो मैंने भी कसम खा ली कि जब तक इस साहब का तबादला नहीं करवा लेता, तब तक तो कुछ भी नहीं करूंगा। लगा ले जितना जोर हो इसमें मुझसे काम करवाने का, और भी न जाने फिर वह क्या-क्या मन ही मन साहब को उल्टा सीधा बकता कभी मुझे घूरता रहा तो कभी पांच महीने से एक ही जगह जमी फाइलों को। पर क्या मजाल जो उसने फाइलों को हाथ तो छोड़ो, अंगुली भी लगाई हो। सरकार का तथाकथित बंदा जो ठहरा!