छोटे उद्योगों को बाजार दो : डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

ध्यान देने की बात है कि यह सुचक्र मांग से शुरू होता है। यदि बाजार में मांग होती है तो उद्यमी किसी न किसी तरीके से उत्पादन बढ़ा ही लेता है, जैसे वह अपने क्रेता से एडवांस ले लेता है अथवा परिजनों से ऋण ले लेता है। यही सुचक्र मांग के अभाव में स्थापित नहीं होता है। बाजार में मांग नहीं है, छोटे उद्योगों को यूं ही घाटा लग रहा है, ऐसी परिस्थिति में वह ऋण लेकर लॉकडाउन को तो पार कर सकता है, लेकिन तीन माह के बाद उस पर ऋण का बोझ बढ़ जाएगा, जबकि बाजार की परिस्थिति पुराने स्तर पर भी  आ गई तो भी उसमें सुधार नहीं होगा...

लॉकडाउन से पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है, लेकिन छोटे उद्योगों को विशेष नुकसान हुआ है। सरकार ने छोटे उद्योगों को मदद करने के लिए तीन लाख करोड़ रुपए की विशाल राशि उन्हें दिए जाने वाले ऋण की गारंटी के रूप में देने का ऐलान किया है। इस पैकेज के अंतर्गत छोटे उद्योगों द्वारा वर्तमान में लिए गए ऋण का 20 प्रतिशत अतिरिक्त ऋण उन्हें दिया जा सकता है। सरकार का मानना है कि इस ऋण के उपलब्ध होने से लॉकडाउन के समय जो उनकी हानि हुई है, विशेषकर जो उनकी तरलता समाप्त हुई है, इस अवधि को वे इस ऋण के सहारे पार कर लेंगे। लॉकडाउन समाप्त होने के साथ-साथ उनकी आर्थिक गतिविधियां बढ़ जाएंगी और वे पुनः पटरी पर आ जाएंगे। लेकिन ऐसा होने में संदेह है। देश के छोटे उद्योग पहले ही संकट में थे। मार्च 2019 में बैंकों द्वारा दिए गए कृषि के अतिरिक्त ऋण में छोटे उद्योगों का हिस्सा 5.58 प्रतिशत था जो फरवरी 2020 में घटकर 5.37 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट मामूली है, लेकिन दिखाती है कि अर्थव्यवस्था में छोटे उद्योग दबाव में हैं। बड़े उद्योगों का हिस्सा बढ़ रहा है। इस संकट को लॉकडाउन ने बढ़ा दिया है। इस परिस्थिति में छोटे उद्योगों द्वारा ऋण लेना सार्थक होगा या नहीं? उद्यमी द्वारा बनाया गया माल यदि बाजार में बिकता है, मांग होती है तो दाम ऊंचे मिलते हैं और वह प्रॉफिट कमाता है। इस परिस्थिति में वह ऋण लेकर अधिक उत्पादन करता है। नई फैक्टरी लगाता है। नई फैक्टरी के उत्पादन को प्रॉफिट में बेचकर ऋण पर ब्याज अदा करता है। ध्यान देने की बात है कि यह सुचक्र मांग से शुरू होता है। यदि बाजार में मांग होती है तो उद्यमी किसी न किसी तरीके से उत्पादन बढ़ा ही लेता है, जैसे वह अपने क्रेता से एडवांस ले लेता है अथवा परिजनों से ऋण ले लेता है। यही सुचक्र मांग के अभाव में स्थापित नहीं होता है। बाजार में मांग नहीं है, छोटे उद्योगों को यूं ही घाटा लग रहा है, ऐसी परिस्थिति में वह ऋण लेकर लॉकडाउन को तो पार कर सकता है, लेकिन तीन माह के बाद उस पर ऋण का बोझ बढ़ जाएगा, जबकि बाजार की परिस्थिति पुराने स्तर पर भी आ गई तो भी उसमें सुधार नहीं होगा। जैसे पहले यदि उद्योग अपना माल 100 रुपए में बेच रहा था तो लॉकडाउन के बाद वह पुनः 100 रुपए में ही बेचेगा, लेकिन उसके ऊपर ऋण का बोझ बढ़ जाएगा।

कुछ वर्ष पहले मुझे किसी गांव में किसी स्वयं सहायता समूह द्वारा भैंस खरीदने के लिए दिए गए ऋण का मूल्यांकन करने का अवसर प्राप्त हुआ था। गांव वालों ने बताया कि उन्होंने ऋण लिया, भैंस खरीदी, दूध बेचा और उनके जीवन स्तर में सुधार आया। लेकिन मैंने जब उनसे पूछा कि आप यह बताइए कि आपके गांव में कुल भैंस की संख्या में कितनी वृद्धि हुई, तो स्पष्ट उत्तर मिला कि भैंस की संख्या में वृद्धि नहीं हुई। अर्थ हुआ कि ऋण से केवल टोपी बदली जा रही थी। एक व्यक्ति ने अपनी भैंस को दूसरे को बेचा, उसने तीसरे को बेचा और सभी ने स्वयं सहायता समूह से ऋण लिया। भैंसों की संख्या वही रही। गांव में दूध का उत्पादन उतना ही रहा। गांव वालों की आय भी उतनी ही रही, लेकिन गांव पर ऋण का बोझ बढ़ गया। उन्हें अब बैंक को ब्याज भी देना पड़ रहा था। पूर्व में उतनी ही भैंसों से जो आय हो रही थी, वह गांव के लोगों को मिलती थी। आज उतनी ही भैंसों से जो आय हो रही है, उसका एक हिस्सा बैंकों को ब्याज के रूप में जाने लगा। गांव वालों की आय कम हो गई। अतः यदि बढ़ी हुई मांग और उत्पादन के अभाव में ऋण दिया जाता है तो उससे जीवन स्तर में गिरावट आती है। आज हमारे छोटे उद्योगों की परिस्थिति ऐसी ही है। उनके सामने उत्पादन पूर्ववत ही है, जबकि ऋण का बोझ बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा बड़ी संख्या में छोटे उद्योगों को ऋण देने में बैंक कर्मियों का बोझ भी बढ़ जाता है। कागजी कार्यवाही बढ़ जाती है। अंत में परिणाम यही होता है कि छोटे उद्योगों पर बोझ बढ़ गया। दूरदराज के इलाकों में बैंक कर्मियों को वैसे ही कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। इनके ऊपर यह अतिरिक्त कार्य का बोझ भी आ पड़ता है। इस परिस्थिति में सरकार को छोटे उद्योगों को ऋण देने के स्थान पर उनके द्वारा बनाए गए माल की मांग में वृद्धि करने के उपाय करने चाहिएं। यहां हमारी दो समस्याएं हैं। पहली समस्या विश्व व्यापार संगठन की है। हमने वचन दे रखा है कि हम आयातों पर आयात कर एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ाएंगे। इस कारण चीन और दूसरे देशों में बनने वाला सस्ता माल हमारे देश में प्रवेश कर रहा है और हमारे छोटे उद्योगों की हालत खराब हो रही है। इसलिए सर्वप्रथम सरकार को विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत रहते हुए जो आयात कर की अधिकतम सीमा है, उस स्तर पर आयात कर आरोपित कर देना चाहिए। यदि इसके बाद भी छोटे उद्योगों को राहत न मिले तो हमें विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने का साहस रखना चाहिए। लेकिन केवल आयातों पर सख्ती करने से बात नहीं बनेगी। यदि अपने देश के बड़े उद्योग उसी माल को बना कर बाजार में बेचते रहे तो छोटे उद्योग पूर्ववत संकट में ही रहेंगे। छोटे उद्योगों की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। उनके पास तकनीकी क्षमता कम होती है और छोटे स्तर पर उत्पादन करने से उसमें ईंधन आदि की खपत ज्यादा होती है। अतः प्रश्न यह उठता है कि हम छोटे उद्योगों को समर्थन क्यों दें, यदि उनके द्वारा माल महंगा बनाया जा रहा है? इसका पहला कारण यह कि छोटे उद्योग हमारे देश की उद्यमिता के विकास की प्रयोगशालाएं हैं। दूसरा यह कि इनके द्वारा रोजगार अधिक उत्पन्न किया जाता है और रोजगार उत्पन्न होने से समाज में अपराध की प्रवृत्ति कम होती है। सरकार पर कल्याणकारी योजनाओं का बोझ कम होता है। तीसरा यह कि छोटे उद्योग कम ही सही लेकिन कुछ तो टैक्स अदा करते हैं जबकि इन्हें बंद कर दिया गया तो बेरोजगार हुए कर्मियों के लिए सरकार को अपने कल्याणकारी खर्च बढ़ाने पड़ेंगे। मेरा मानना है कि उद्यमिता, रोजगार और राजस्व के लाभ को जोड़ कर छोटे उद्योगों के महंगे माल को ही देश को खरीदना चाहिए। सरकार को बड़े उद्योगों पर अधिक टैक्स लगाना चाहिए। यदि कुछ उत्पादों को छोटे उद्योगों के लिए पहले की तरह आरक्षित कर दिया जाए तो भी उनकी मांग बढ़ेगी। मांग बढ़ेगी तो वे स्वयं अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए पूंजी जुटा लेंगे। इसलिए उन्हें अतिरिक्त ऋण के बोझ से दबाने से लाभ नहीं बल्कि नुकसान होगा।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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