Tuesday, August 20, 2019 01:46 PM

‘जन्नत’ की वापसी

जम्मू में पहली बार कुछ लोगों को तिरंगे के साथ झूमते-नाचते देखा है। वे सभी मुसलमान लग रहे थे। अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद जम्मू में तो हालात बेहतर हो गए हैं। बाजार खुल रहे हैं। दूध-दवाई की दुकानें खुली हैं। बच्चे बसों में बैठकर स्कूल जाने लगे हैं। कालेज में सहेलियां मुद्दत के बाद मिलीं। लोगबाग ईद की खरीददारी में सड़कों पर निकले हैं, लिहाजा कुछ रौनकें भी लौटी हैं। अब औसतन एटीएम में नकदी भी मिल रही है। हैरानी और चौंकाने वाला दृश्य यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल शोपियां के बाद अनंतनाग भी गए, लोगों से मिले-जुले और एक बच्चे से मजाक किया- 'स्कूल में छुट्टी से खुश हो न...!' तो पास खड़े एक अधेड़ कश्मीरी का जवाब था- 'खुश कैसे होंगे साहिब!Ó बहरहाल देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को कई दिनों से लोगों के बीच उनके मन टटोलते और उन्हें भरोसा परोसते कभी देखा है क्या? लेकिन ये सामान्य हालात के संकेत नहीं हैं। कश्मीर में असाधारण हालात हैं, क्योंकि भारत की संसद ने असाधारण, ऐतिहासिक फैसला लिया है। कुछ कश्मीरियों से संवाद हुए, तो उन्होंने कहा कि वे 'मातमÓ में हैं, उनकी 'पहचान' ही छीन ली गई है। केंद्र की मोदी सरकार ने कश्मीर को 'जेलखानाÓ बना दिया है। ऐसी भावनाएं एक तबके की होना स्वाभाविक है। सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर कुछ पाबंदियां भी जरूरी थीं। लोगों को असुविधाएं भी हुई हैं। परिजनों के बीच एक जबरन असंवाद की स्थितियां पैदा की गई, लेकिन हमारा मानना है कि एक राष्ट्रहित के फैसले के कारण ऐसे कष्ट जरूरी थे, ताकि कमोबेश कश्मीर घाटी में अराजकता न फैल सके, पत्थरबाज सड़कों पर सक्रिय न हो सकें और दंगों के हालात न बनें। अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद कुछ भी बड़ी अनहोनी नहीं हुई। अब तमाम सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं, जुमे की नमाज भी अमन-चैन से संपन्न हुई और आज सोमवार को मुसलमानों का पाक पर्व 'बकरीदÓ भी शिद्दत से मनाए जाने के आसार हैं। तो माना जा सकता है कि कश्मीर के 'जन्नत' की वापसी हो रही है। असंतोष, भड़काऊपन और तल्खियों के एक मु_ी भर तबके को छोड़ दें, तो कश्मीर में असामान्य हालात कौन से हैं? श्रीनगर की सड़कों पर छोटे बच्चे साइकिल चला रहे हैं, गृहिणियां बाजार में आई हैं, कुछ वाहन भी दिखाई दिए हैं, दूध-दवाई तक पहुंच भी आसान है। बेशक 'जन्नतÓ के हालात सुधर रहे हैं, लेकिन असली चुनौतियां तब सामने आएंगी, जब सुरक्षा व्यवस्था में ढील दी जाएगी, फोन और इंटरनेट आजाद हो जाएंगे, नेताओं को भी हिरासत से मुक्ति मिलेगी। दरअसल तभी कश्मीर की असली अग्नि-परीक्षा होगी। देश ने जम्मू-कश्मीर को बहुत कुछ दिया है, उसे मुख्यधारा में समझा है, लेकिन देश के भीतर एक और देश स्वीकार्य कैसे हो सकता है? 370 के तहत ऐसी ही व्यवस्था थी। हालांकि भारत के वित्त आयोग के मुताबिक विशेष दर्जा प्राप्त अन्य राज्यों की तुलना में कश्मीर को ज्यादा सहूलियतें दी गई हैं। दूसरे राज्यों से औसतन सात गुना प्रति व्यक्ति मदद दी गई है। कश्मीर की आबादी देश की आबादी की एक फीसदी से भी कम है, लेकिन राजस्व का औसतन 10 फीसदी कश्मीर को दिया जाता रहा है। औसतन 8.2 फीसदी केंद्रीय मदद मिलती रही है। हालांकि देश की राष्ट्रीय आय में जम्मू-कश्मीर की हिस्सेदारी 0.7 फीसदी ही रही है। आप देश के तमाम पांच सितारा होटलों, पर्यटन स्थलों और बड़े शहरों पर एकबारगी निगाह डाल लें, तो सबसे अधिक दुकानें कश्मीरियों की मिलेंगी। यही नहीं, राजधानी दिल्ली के गली-मुहल्लों, घरों में भी कश्मीरी व्यापारी आते रहते हैं और सूट, शॉल, बादाम, अखरोट आदि बेचते रहे हैं। न उन्हें आतंकवाद से वास्ता है, न अनुच्छेद 370 से और न ही अपनी विशेष पहचान का दर्द है। दरअसल मूल कश्मीर यही है। कश्मीर को किस सरकार ने उपेक्षित रखा है? अलबत्ता वे कभी 'हिंदुस्तानÓ के नहीं हुए थे। अब असल में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख का भारत में विलय हुआ है।