Friday, September 20, 2019 12:14 AM

जन्माष्टमी व्रत का महत्त्व

जन्माष्टमी के संदर्भ में इस बात पर विशेष रूप से बल दिया गया है कि इस व्रत को किस दिन मनाया जाए। जन्माष्टमी में अष्टमी को दो प्रकारों से व्यक्त किया गया है, जिसमें से प्रथम को जन्माष्टमी और अन्य को जयंती कहा जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत होता है। यदि दिन या रात्रि में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करना चाहिए। कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाना चाहिए तथा व्रत का पालन करना चाहिए। विष्णु पुराण के अनुसार कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद माह में हो तो इसे जयंती कहा जाएगा। वसिष्ठ संहिता के कथन के अनुसार अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में पूर्ण न भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में व्रत करना चाहिए। स्कंद पुराण के एक अन्य कथन के अनुसार जो व्यक्ति जन्माष्टमी व्रत को करते हैं, उनके पास लक्ष्मी का वास होता है। विष्णु पुराण के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से अनेक जन्मों के पापों का क्षय होता है। भृगु संहिता के अनुसार जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि, ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अंत में पारणा करना चाहिए। कृष्ण जन्माष्टमी को और कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे कृष्णाष्टमी, सातम आठम,  गोकुलाष्टमी तथा अष्टमी रोहिणी इत्यादि। किंवदंतियों के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म रात्रि के समय कारागार में हुआ था जहां कंस ने उनके माता-पिता को बंदी बनाकर एक कारागृह में रखा था। जन्म के तुरंत पश्चात उनके पिता वासुदेव ने उनको उसी रात्रि एक टोकरी में रखकर अपने मित्र नंद और यशोदा के घर पहुंचाया था। जन्माष्टमी व्रत को अपना कर भक्त समस्त संकटों से मुक्ति पाता है। इसी प्रकार एक अन्य ग्रंथ ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए तथा भविष्यपुराण में कहा गया है कि जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह राक्षस के समान होता है।