जरा याद करो कुर्बानी

भारत की आजादी की लड़ाई में यूं तो लाखों-करोड़ों हिंदुस्तानियों ने भाग लिया, लेकिन कुछ ऐसे सपूत भी थे जो इस आजादी की लड़ाई के प्रतीक बनकर उभरे।  अपने आंदोलन से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आइए एक नजर डालते हैं, आजादी के इन मतवालों पर..

महात्मा गांधी

जन्म : 2 अक्तूबर 1869, पोरबंदर, गुजरात

मृत्यु : 30 जनवरी 1948, नई दिल्ली

शिक्षा : बैरिस्टर, युनिवर्सिटी कालेज,लंदन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महात्मा गांधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की के बारे में लोग जानते थे, परंतु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई भी दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता।

रानी लक्ष्मीबाई

जन्म : 19 नवंबर 1835,  वाराणसी

मृत्यु : 18 जून 1858, कोटा की सराय, ग्वालियर

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना के रूप में जानी जाती हैं। अंग्रेजों की भारतीय राज्यों को हड़पने की नीति के विरोध स्वरूप उन्होंने हुंकार भरी अपनी झांसी नहीं दूंगी और अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का उद्घोष किया।

रामप्रसाद बिस्मिल

जन्म : 11 जून 1897, शाहजहांपुर

मृत्यु : 19 दिसंबर 1927, गोरखपुर

स्वतंत्रता संग्रात सेनानी के साथ बेहतरीन कवि, शायर और लेखक, मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहांपुर के छह युवक पकड़ाए, जिनके लीडर रामप्रसाद बिस्मिल थे, लेकिन वे पुलिस के हाथ नहीं लग पाए। इस षड्यंत्र का फैसला आने के बाद से बिस्मिल दो साल तक भूमिगत रहे। और एक अफवाह के तरह उन्हें मृत भी मान लिया गया। इसके बाद उन्होंने एक गांव में शरण ली और अपना लेखन कार्य शुरू किया।

मंगल पांडे

जन्म : 30 जनवरी 1827 बलिया

मृत्यु : 8 अप्रैल 57, बैरकपुर

मंगल पांडे बैरकपुर छावनी में बंगाल नेटिव इंफैंट्री की 34वीं रेजीमेंट में सिपाही रहे, जहां गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूस और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद किया।

अशफाक उल्ला खां

जन्म : 22 अक्तूबर 1900 ई., शाहजहांपुर

मृत्यु : 19 दिसंबर 1927, फैजाबाद में फांसी

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में लेखन कार्य, देश में चल रहे आंदोलनों और क्रांतिकारी घटनाओं से प्रभावित अशफाक के मन में भी क्रांतिकारी भाव जागे और उसी समय उनकी मुलाकात मैनपुरी षड्यंत्र के मामले में शामिल रामप्रसाद बिस्मिल से हुई और वे भी क्रांति के जश्न में शामिल हो गए। इसके बाद वे ऐतिहासिक काकोरी कांड में सहभागी रहे।

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