Wednesday, July 17, 2019 09:00 PM

जान हथेली पर रख साथियों तक पहुंचाए हथियार-गोला बारूद

घुमारवीं—शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले। वतन पर मर मिटने वालों का बाकी यहीं निशां होगा। 1999 में कारगिल की पहाडि़यों पर छिड़े अघोषित युद्ध में जिला बिलासपुर के घुमारवीं उपमंडल के मोरसिंघी-मसधान के जवान हवलदार राजकुमार वशिष्ठ ने वीरता से लड़ते हुए शहादत का जाम पिया था। युद्ध में 11 जुलाई 1999 को सुबह शहीद हवलदार राजकुमार वशिष्ठ ने कारगिल के बटालिक सेक्टर के घनासक क्षेत्र मंे दुश्मनों की भारी गोलाबारी व तोपखानों के बौछारों की बीच जान की परवाह न करते हुए अपने साथियों तक हथियार व गोले पहुंचाएं थे। हथियारों की कमी न होने के कारण ही हिंद सेना यहां से दुश्मनों को खदेड़ने में सफल हुई थी। राजकुमार जानते थे कि साथियों तक यदि गोले व हथियार नहीं पहुंचे, तो यहां पर जीत हासिल करना कितना मुश्किल होगा। उन्होंने हथियार व गोलों की सप्लाई भारी गोलाबारी के बीच भी थमने नहीं दी। इस दौरान उनको अपवर्त्य स्पलिन्टर (गोला) सीने और पेट पर लगा। इससे वह बुरी तरह से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हो गये थे। राजकुमार के अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव पुरस्कार से सम्मानित किया है। हवलदार राजकुमार वशिष्ठ की बहाुदरी की बदौलत हिंद सेना ने यहां पर परचम लहराया था। राजकुमार ने इस पोस्ट पर वीरता की नई इबारत लिखकर दुश्मनों को भी दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर कर दिया था। शहीद राजकुमार की वीरता की लिखी नई इबारत 20 साल बाद भी लोगों की जुबां पर तरोताजा है। मई 1999 में पाकिस्तान की ओर से हिंदोस्तान की नियंत्रण रेखा को लांघकर कारगिल की पहाडि़यों पर कब्जा जमा लिया था। पाक सैनिकों की नापाक हरकत का जवाब देने के लिए हिंद सेना ने आपरेशन विजय शुरू किया। घुमारवीं के मोरसिंघी-मसधान गांव के हवलदार राजकुमार वशिष्ठ कारगिल के बटालिक सेक्टर के 11 जुलाई 1999 को दुश्मन सेना से वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। कारगिल की पहाडि़यों पर अदभ्य साहस दिखाकर दुश्मन देश के घुसपैठियों को ढेर करने वाले राजकुमार बहादुरी से लड़े थे। माता विद्या देवी व पिता शिवराम के घर सात नवंबर 1965 को जन्में राजकुमार को बचपन से ही सेना में जाने का शौक था। उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई मोरसिंघी स्कूल में की। उसके बाद उन्होंने घुमारवीं स्कूल में दाखिला लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद राजकुमार 22 गे्रनेडियर्स में भर्ती हुए थे। कारगिल की लड़ाई के दौरान उनकी पोस्टिंग बटालिक सेक्टर में की गई। इस दौरान हवलदार राजकुमार ने अपने साथियों तक भारी गोलीबारी के बीच हथियार व गोला-बारूद पहुंचाने की कोई कमी नहीं रखी। राजकुमार की बहादुरी के कारण ही हिंद सेना दुश्मनों पर भारी पड़ी थी। राजकुमार व साथियों ने दुश्मनों से पोस्ट तो मुक्त करा ली, लेकि न इसमें राजकुमार शहीद हो गए थे।

आज अर्पित करेंगे श्रद्धासुमन

पंचायत मोरसिंघी के गांव मसधान के कारगिल युद्ध के हीरो शहीद राजकुमार वशिष्ठ को उनके शहीदी दिवस 11 जुलाई को याद करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए जाएंगे। परिजनों सहित इलाके के लोग घुमारवीं के जांबाज बेटे राजकुमार को भावभीनी श्रद्धांजलि देंगे। शहीद के बेटे राहुल वशिष्ठ ने बताया कि 11 जुलाई (गुरूवार) को भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी।