Wednesday, September 26, 2018 11:57 AM

जाहरवीर गुग्गा जी मंदिर

हिमाचल में ऐसे कई देव स्थल हैं, जहां दर्शन मात्र से ही कई प्रकार के शारीरिक कष्टों का निवारण होता है। ऐसा ही एक पवित्र स्थान पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय उच्च मार्ग स्थित अरला से मात्र दो किमी.की दूरी पर स्थित है। ग्राम पंचायत सलोह में जाहरवीर गुग्गा जी महाराज का प्राचीन मंदिर है। यहां सर्पदंश और मानसिक तथा शारीरिक कष्ट से ग्रसित लोग ठीक होते हैं। प्रतिवर्ष रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक इस क्षेत्र में उत्सव सा माहौल रहता है। ऐसी मान्यता है कि यहां माथा टेकने मात्र से ही सर्पदंश नहीं होता और यहां की मिट्टी के छिड़काव से घरों में सांप इत्यादि का प्रवेश भी नहीं होता है। गांव सलोह, कथियाड़ा तथा आसपास के गांवों के लोग रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक नंगे पांव रहते हैं। सोने के लिए भूमि आसन का प्रयोग किया जाता है और 10 दिनों तक उपवास में रहते हुए सिर के बाल तथा दाढ़ी इत्यादि नहीं कटवाते हैं। मेले के दस दिनों में जाहरवीर गुग्गा जी महाराज के छतर के साथ सभी गांवों में अढ़ाई फेरी लगाई जाती है, जिसमें भक्त नंगे पांव शामिल होते हैं। इन्हीं दिनों में गुग्गा जी महाराज का छतर लेकर पुजारी श्रद्धालुओं सहित गांव-गांव जाकर गुग्गा जी की गाथा भी सुनाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि जो लोग भूतप्रेत इत्यादि के साये तथा अन्य बीमारियों से पीडि़त होते हैं, मंदिर में माथा टेकने और दस दिनों तक यहां रहकर गुग्गा मंदिर के भीतर या बाहर परिक्रमा कर ग्यारहवें दिन ठीक होकर जाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि आपे से बाहर हुए लोगों को मंदिर के प्रांगण में स्थित प्राचीन अलिया नामक पेड़ से बांधने से लोग ठीक होकर मंदिर की परिक्रमा करने लगते हैं। जहर वीरगुग्गा जी को सर्पों का ईष्ट देव माना गया है। बुजुर्गों का मानना है कि इस इलाके के आसपास कहीं भी किसी को सर्पदंश होने पर मंदिर में रखा ढोल अपने आप बजने लगता था और पीडि़त व्यक्ति मंदिर में आकर बिलकुल ठीक हो जाता था। आज भी सर्पदंश से पीडि़त व्यक्ति मंदिर में दस दिन रहकर ठीक होते हैं। है।

- राकेश सूद, पालमपुर