Monday, June 01, 2020 12:19 AM

जिंदगी की विरासत में योगेश्वर की कहानियां

कहानी में रचना परिपक्वता से आगे उसकी सादगी का स्वरूप अगर शाश्वत धरातल पर अपना स्थान ग्रहण करता है, तो हम स्वाभाविक तौर पर योगेश्वर शर्मा के संग्रह ‘फोन पर महानगर’ को अपने समीप खड़ा देखेंगे। लेखक कहानियों से अचानक बाहर निकल कर पाठक के प्रति प्रतिबद्धता जोड़ लेता है और तब कई शृंखलाएं बन जाती हैं। ‘जिजीविषा’ में कहानी की जिंदादिली का चित्रण, ‘उस नाटक में रोगी और चिकित्सक, दोनों अपने-अपने अभिनय के उत्कर्ष पर थे’, जैसी द्रव्यता से द्रवित करता है। यहां साहित्य जगत के लिए अद्भुत टॉनिक उपलब्ध है, क्योंकि इसके स्वरूप में न विषाद, न विकृति, न विमर्श और न ही विखंडन, बल्कि एहसास भरे शब्दों की बहुलता का विषय हर किसी को एक चरम बिंदु पर खड़ा कर देता है। लेखक ने अपनी कहानियों से जीवन के कई कठोर प्रश्न पूछे या अनसुलझे विमर्श को आगे बढ़ाया है। कुछ इसी तरह ‘रिड़कू और कातकू’ में वह सक्षम होने का उपार्जन देखते हैं, तो कर्म के रिसते छालों पर ‘पत्थरों के शहर में, भला फूल कहां मिलते हैं’, कहते हुए कहानी को चौपाई सरीखी बना देते हैं। ‘श्राद्ध’ में मानों जिंदगी की विरासत को रिश्तों के घाट पर धोते-धोते कितनी मैल निकली होगी। आधुनिक मसलों की खुराफात में कहानी कुछ यूं बयां होती है, ‘हमारे बच्चे अब बड़े हो गए हैं। अब उन्होंने हमारे नाम रख दिए हैं, खपरी (बूढि़या) और खपरू (बूढ़ा) या जबरी और जबरा...।’ योगेश्वर शर्मा की कहानियां स्वयं आगे बढ़कर मूल तत्त्वों को जगाती हैं तथा इन्हें परिभाषित करती हैं। कहानियां खोजती हैं और विषयों की उधेड़बुन व जज्बात से बाहर निकल कर खूंटे पर टांग देती हैं प्रश्न। ये प्रश्न हमारे आसपास के हैं। भोले हैं। निर्लिप्त हैं, बिल्कुल बर्फ की तरह शीतल-सरल और पर्वतीय नदी की तरह तरल। इनकी कहानियां शाश्वत धरातल पर सीधी और बिना लाग-लपेट के खड़ी हैं।

कुल अठारह कहानियों में विवरण की कला, भीतरी कटाक्ष व यथार्थपरकता से जीवन के मंतव्य को उकेरतीं, उसे गुदगुदातीं और तितली बनकर ‘पार्क में दो बूढ़े’ कहानी का माथा चूम लेती हैं। अतीत की परछाई पर चलते शब्द मुस्कराते हैं। योगेश्वर शर्मा की कमोबेश हर कहानी का मुखड़ा दार्शनिक भाव लिए है। एक खास अंदाज का प्रारंभ या ओपनिंग की एक बानगी ‘सड़क पर पहाड़’ के जरिए देखिए, ‘बस में जितने लोग बैठे थे, उनका अपना-अपना इतिहास था। उस इतिहास में उनका भूतकाल था, वर्तमान था। भविष्य की वे प्रतीक्षा कर रहे थे।’ संग्रह की कहानियां परिवेश से बात करती हैं। परत दर परत दृश्य और परिदृश्य बदलते संबोधनों के बीच पात्रों की खासी पहचान भी। कहानियां हर क्षण की मुखबिर हैं, इसलिए इनके नामकरण का शिखर बार-बार मुखर रहा है। ‘गुरुकुल’ में वहम को डकारती कहानी दुनिया के व्योम पक्ष में आज के साहित्यिक विवेचन की भारहीनता मापती है, तो ‘खेल’ में अप्रत्यक्ष बिंदुओं के साक्ष्य में सजी भूल-भुलैया के भीतर अंधविश्वास की निंदनीय कसौटी पर तीखे प्रश्न ‘गुर’ के आधिपत्य पर उठाती हैं, ‘वे कब तक इस तरह से देवता बने रहेंगे?’ जवाब आता है, ‘जब तक वे ‘खेल’ में हैं।’ ‘अनुत्तरित प्रश्न’ में दार्शनिक होते हुए कहानीकार मानसिक उतावलेपन को शांत करने की जिरह खोज लेते हैं, तो ‘एक था राजा’ में अभिव्यक्ति की कशमकश में सृजन की इत्तिलाह होती है। ‘मेरा सबसे खुशीवाला दिन’ की हकीकत में मनोरंजन के अंश डालना अगर अदा है, तो कथ्य में निबंध की तर्ज पर विवरण भी मिलता है। ‘फोन पर महानगर’ में लेखकीय घुमक्कड़ी शहर और गांव के बीच आसानी से चक्कर काट लेती है और आधुनिकता के बोध में अतृप्त विवशताओं को अपने आंचल में समेटने के हुनर से कहानी सराबोर हो जाती है। इसी कहानी के नजदीक ‘पुलकेसरी’ आकर खड़ी हो जाती है, तो परिवर्तनशील विकास की मृगतृष्णा में अतीत का एहसास प्यासा रह जाता है। ‘दृष्टिभ्रम’ में लेखक विश्व के अपूर्णीय चारित्रिक क्षरण के कई झरोखे तराश देता है, तो ‘प्रोफेसर नवल कुमार’ में जीवन की पहेलियों के बीच जीने का भंवर और पाने का संघर्ष स्पष्ट होता है। कहानी के भीतरी संबोधन अपने द्वंद्वों की हाजिरी में परिवेश की व्यथा को समाहित करते हैं, तो ‘पिकनिक’ के उजाले में दूर पहाड़ की फूल सी आकृति भी कांटा बन जाती है। अंत में ‘त्वारसू’ के रूप में योगेश्वर शर्मा लोकतंत्र के सन्नाटों में कहानी को जन्म देते हैं। कहानी संग्रह के बीच मानवीय संघर्ष, कब वैचारिक और कब लोकतांत्रिक हो जाता है, पता ही नहीं चलता। इसी तरह अपने लेखन खूबियों की एक पारी खेलते हुए योगेश्वर कब बीच में निबंधकार, व्यंग्यकार या आलोचक हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। यही लेखन की सहजता व सरलता है, जो अंतिम कहानी तक बरकरार रहती है।     -निर्मल असो