Wednesday, November 13, 2019 03:25 PM

जिंदा लोगों के ताबूत

सुरेश सेठ

साहित्यकार

इस देश में जिंदा आदमियों के ताबूत तो सुने थे। ऐसे ताबूतों का बाजार सजाने वालों के वारे-न्यारे भी होते देखे हैं। अरे ताबूतों में बंद करके जिंदा लोगों की तस्करी इस्लामिक देशों में कर सकते हो तो करो। ताबूतों के पेट से ये लोग प्रकट हो जाएंगे, अपने देश की बेकार मुर्दा होती जिंदगी छोड़ कर इन देशों के शेखों के सामने कोर्निश बजा दोयम दर्जे की जिंदगी जीने के लिए। फिर अगर वहां आपके साथ कोई ‘मोसुल’ घट जाए, और आपकी लाशों का एक टीला बन जाए, तो भी क्या परवाह, आपकी सरकार इसे एक जिंदा टीला बता कर यहां दबे अभागे मृतकों के परिजनों को उनके जिंदा होने का दिलासा देती रहेगी। लेकिन एक दिन तो ये टीले गिरेंगे, इनमें से लाशें नहीं, नर-कंकाल निकलेंगे, जिनके ‘डीएनए’ टेस्ट न भी करवाओ, तो पता चल जाएगा भारतीय हैं। अवैध भारतीय, देश से भागे भारतीय, जिनकी खोज खबर रखने की जिम्मेदारी कब तक सरकार उठा सकती है? उन्होंने हवाई मीनार के ऊपर से कहा लेकिन ताबूतों में बंद ये नर-कंकाल केवल उन्तालीस कहां अब तो सवा अरब से अधिक हो गए। ताबूत क्या इस देश से पलायन के लिए ही इस्तेमाल होते हैं। अजी इन ताबूतों का इस्तेमाल तो पिछले सत्तर बरस से हो रहा है। यहां अलग-अलग ताबूतों का इस्तेमाल अलग-अलग कामों के लिए होता है। उद्देश्य एक ही रहता है कि जो व्यक्ति इनमें से किसी एक ताबूत में बंद हो जाएं तो इसमें से जल्दी बाहर आने की कोशिश न करे। ‘मीनार और ताबूत’ इस देश की यही कहानी है। यहां चंद लोग हवाई मीनार पर बैठे हैं, और सत्ता की दूरबीन लगाकर अपनी रियाया को देखते रहना चाहते हैं। देखते-देखते जब उनकी आंखें बुढ़ा जाएं, दृष्टि क्षीण होने लगे तो वे इस मीनार से उतरना नहीं चाहते, यहां से किसी अमर इतिहास के पन्नों पर उड़ अमिट हो जाना चाहते हैं। लेकिन इससे पहले वे आश्वस्त हो जाते हैं कि उनकी वंशबेल, उनके बेटे, नाती-पोते इस मीनार पर अपना स्थान ग्रहण करें। पिछले युग में जब हम कहते थे कि शहंशाह का बेटा शहंशाह, तो जानते थे कि शाही खून उसकी रगों में दौड़ रहा है। अब कहते हैं मंत्री का बेटा मंत्री और नेते का बेटा नेता, तो समझते हैं कि सत्ता की तपिश उनकी रगों में दौड़ रही है। इस तपिश को उनकी कोठरी में पड़े काले धन के अंबारों ने बनाया है, या उन बाहुबलियों ने जिन्होंने हर गलत काम को सही करने की दीक्षा उनसे ली है। यही आज की नेतागिरी की वह पहचान है जो उसे सत्ता के गलियारे तक ले जाती है शब्द ज्ञान की कमी के कारण वे इस दाद को किसी मिश्री नर्तकी का कमर नृत्य देख निकलने वाली ‘आह- ऊह’ समझ लेते हैं। विजय पर्व निकट जान कर वह मिश्री नर्तकी को न्योता देने चला जाता है। लेकिन खाली खाते अच्छे दिनों के आकाश कुसुमों से गलबहियां डाल लेते हैं और ताबूतों में बैठी सवा अरब आबादी अपनी वीरान आंखों की विरासत ढोती रहती है कि जिसका हर सपना एक-एक करके उससे रूठ गया।