Thursday, November 14, 2019 02:14 PM

जीवनशास्त्र में व्यंग्य की है बड़ी सार्थकता

डा. शंकर वासिष्ठ

मो.-9418905970

काव्यशास्त्र में शब्द की तीन शक्तियां विद्वत्जनों द्वारा स्वीकृत हैं। प्रथम ‘‘अभिधा’’ ... जिससे सीधे-सीधे वाच्यार्थ की प्रतीति होती है। दूसरी शब्द शक्ति लक्षणा है, जिससे लक्ष्यार्थ का बोध होता है। तीसरी शब्द शक्ति व्यंजना है जिसमें व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है। व्यंजना शक्ति शब्द और अर्थ की वह शक्ति है जो अभिधादि शक्तियों के चूक जाने पर एक ऐसे अर्थ का बोध करवाती है जो विलक्षण और झकझोर देने वाला होता है। वस्तुतः व्यंग्य का मूल उद्देश्य व्यक्ति, वर्ग, विचारधारा, समाज या सामाजिक विसंगतियों पर कुठाराघात करना है। इसमें व्यंग्यकार तभी तो अपने विरोध या आक्रोश के द्वारा भ्रष्ट व्यक्ति, अनाचार, अनैतिकता, असंगति, विद्रूपता आदि की विडंबना पर करारा प्रहार करके संतुष्ट हो जाता है तो कभी विदू्रपित समाज की तस्वीर सामान्य समाज के समक्ष प्रस्तुत करके साधारण नागरिक को उसका यथार्थ बोध करवाता है। जिसे हम साधारण बोल-चाल में ताना, चुटकी, कटाक्ष, ठिठोली या छींटाकशी कहते हैं। अंग्रेजी में यह स्टायर कहलाता है। व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण नहीं करता अपितु अप्रत्यक्ष रूप से विसंगतियों और विदू्रपताओं के विरुद्ध एक तेज हथियार के रूप में व्यंग्य का प्रयोग करता है। व्यंग्यात्मक शैली से ऐसे प्रखर बाण छोड़ता है जो भ्रष्टाचारी, अनाचारी अथवा विसंगति करने वाले के हृदय पर सीधा प्रहार करते हैं। जिसके आघात से लक्षित व्यक्ति की अंतरात्मा तिलमिला उठती है। व्यंग्य को परिभाषित करने का भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने प्रयास किया है। जिनमें आचार्य द्विवेदी व्यंग्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ‘‘व्यंग्य वह है जहां कहने वाला अधरोष्ठ हंस रहा हो और सुनने वाला तिलमिला रहा हो’’। सुप्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के अनुसार ‘‘व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, अत्याचारों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है।’’ पाश्चात्य चिंतक जॉनथन स्विफ्ट के अनुसार ‘‘व्यंग्य एक ऐसा दर्पण है जिसमें देखने वाले को अपने अतिरिक्त सभी का चेहरा दिखता है’’। जेम्स सदरलैण्ड व्यंग्य को समाज सुधार का अचूक अस्त्र सिद्ध करते हुए कहते हैं कि ‘‘व्यंग्य साहित्यिक अजायब घर में लुप्त डॉयनासोर या टैरोडैक्टायल की पीली पुरानी हड्डियों का ढांचा नहीं बल्कि एक जीवंत विधा है जिसे बीसवीं सदी के साहित्य में अहम् भूमिका अदा करनी है।’’ इसी संदर्भ में वक्रोक्ति संप्रदाय के आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा घोषित करते हुए ‘‘वक्रोक्ति जीवितम्’’ ग्रंथ का प्रणयन किया। आचार्य ने वक्रोक्ति को ‘‘वैदग्ध्य भंगी भणिति’’ अर्थात् कवि कर्म-कौशल से उत्पन्न वैचिर्त्यपूर्ण कथन के रूप में स्वीकार किया है, अर्थात् जो काव्य तत्त्व किसी कथन में लोकोत्तर चमत्कार उत्पन्न करे उसका नाम वक्रोक्ति है। सीधे-सीधे जहां पर वक्ता कुछ कहे और श्रोता समझे कुछ और। वक्रोक्ति के मुख्य दो प्रकार हैं (शास्त्र छह मानते हैं), पर आम बोलचाल में प्रथम श्लेष वक्रोक्ति, दूसरी काकु वक्रोक्ति। श्लेष वक्रोक्ति में शब्द प्रवंचना है और काकु में कण्ठ प्रवंचना। इन्हीं तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यंग्य एक ऐसी साहित्यिक विधा है जिसमें समाज में व्याप्त विसंगतियों, कमजोरियों, राजनेताओं की कथनी-करनी के अंतर एवं समाज में व्याप्त अंधविश्वास व कुरीतियों को कुरेद कर व्यंग्यकार समक्ष ही नहीं लाता, बल्कि इसके लिए जिम्मेवार व्यक्ति का साहसपूर्वक विरोध करने की सामर्थ्य भी रखता है और करारा प्रहार भी करता है। सामाजिक संरचना के विकास में निरंतर अवरोधक तत्त्वों का पर्दा गिराता है। व्यंग्य के माध्यम से ऐसी चेतना शक्ति उत्पन्न करता है जिससे शाश्वत मानवीय मूल्य निहित हो तथा गली-सड़ी व्यवस्था पर प्रहारात्मक आक्रोश प्रभावी हो। अतः वर्तमान संदर्भ व परिस्थितियों को देखते हुए काव्यविधा में व्यंग्य की नितांत आवश्यकता व सार्थकता है।

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना-3

अतिथि संपादक : अशोक गौतम

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावनाएं क्या हैं, इन्हीं प्रश्नों के जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचल में व्यंग्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस सीरीज की तीसरी किस्त...

विमर्श के बिंदू

* व्यंग्यकार की चुनौतियां

* कटाक्ष की समझ

* व्यंग्य में फूहड़ता

* कटाक्ष और कामेडी में अंतर

* कविता में हास्य रस

* क्या हिमाचल में हास्य कटाक्ष की जगह है

* लोक साहित्य में हास्य-व्यंग्य

हे शब्द, बुरा मत मानना...

मनतुष्टि/बाजार पड़े शब्द से

लक्ष्मी दत्त शर्मा

मो.-9816013363

हे शब्द!

बुरा मत मानना!

पर अब तुम ब्रह्म नहीं रहे।

हो गए हो ब्रह्म के पद से पदच्युत!

न ही रहे सत्य शिव तुम अब

सुंदर भले ही हो नायिका के चूस चूस कर सूखे पड़े होंठों पर लगी लिपस्टिक की तरह।

पर अब तुम्हारी चकाचौंध, धौंस सब नकली है।

अब तुम्हारा सुहास हास परिहास सब बगुली है।

जबसे तुम बाजार में आदमी से पहले बिकने लगे

अर्थ तुम्हें धारण करते हुए डरते हैं

पहले जो अर्थ तुम्हें धारण कर अपने को धन्य मानते थे

आज वे ही अर्थ

तुम्हें धारण करने से पहले सौ बार सोचते हैं, हजार बार डरते हैं।

नहीं था पता था बिकने वाली आत्माओं के बीच

अपने को बिकने से बचाने को दिन रात संघर्षरत करते परमात्माओं के बीच

एक तुम भी बिकाऊ हो जाओगे अपनी शाश्वतता की केंचुली किनारे फेंक

जिसे हम कल तक मानते रहे थे

कि अर्थ शाश्वत हों या न, पर तुम शाश्वत हो।

हम रहें या न तुम रहोगे धरती पर आकाश में राज में बनवास में तुम्हारी सत्ता बनी रहेगी

हर सत्ता के समय भी हर सत्ता के पहले भी हर सत्ता के बाद भी ।

पर जबसे तुमने बाजार में खड़े होकर

लगवानी शुरू की है अपनी बोली शब्दों के आढ़तियों से

हे शब्द! तुम तबसे निराकार नहीं रहे, असीमित के सार नहीं रहे

तुम जीवन के असवार नहीं रहे।

अब तुम भी हो गए हमारी तरह

जिन्हें देर सबेर कोई न कोई खरीद ही लेता है सौदेबाजी कर

अपना बहुमत साबित करने के लिए

और फिर तुम भी तो सहज भाव से खड़े हो जाते हो उस हर तथाकथित भविष्यद्रष्टा के साथ

उसमें कुछ और  शब्द खरीदने का दंभ भरने के लिए।

हे शब्द!

कब तक रहोगे पैसों के बाजार में खड़े

टुकुर टुकुर निहारते अपने क्रेता को।

जो तुम्हें खरीद बना ले अपना गुलाम!

और तुम गले में बिकाऊपन का पट्टा डाले

बोलते रहोगे उसकी बोली, भूलकर अपने अर्थ!

कहो तो?

ये सब कभी बह्म रहे शब्दों को शोभा देता है क्या?

इससे पहले कि आदमी की तरह शब्द गुलाम हो जाओ तुम कर लो हत्या या आत्महत्या

ताकि कम से कम तुम तो बचे रहो नश्वर होने के हर कलंक से।

व्यंग्य एक अलग विधा है

कृष्ण चंद्र महादेविया

मो.-8679156455

प्राचीन साहित्य और लोक साहित्य की विभिन्न विधाओं में हास्य-व्यंग्य के दर्शन सहज सुलभ हैं। अनेक बार हास्य में व्यंग्य और व्यंग्य में हास्य अवश्य दिखाई देता है। किंतु इससे व्यंग्य की तेज धार में पैनापन की कमी नहीं आती है। वस्तुतः साहित्य की विभिन्न विधाओं में यथा कहानी, लघुकथा, नाटक, उपन्यास या एकांकी में व्यंग्य की मात्रा अधिक होगी तो व्यंग्य कहानी, व्यंग्य लघुकथा या व्यंग्य उपन्यास के नाम से ही अविहित होगा। संभवतः पुराने काल से कुछ समय पूर्व तक व्यंग्य को अलग विधा का दर्जा प्राप्त नहीं था। किंतु वर्तमान समय में व्यंग्य के साहित्य, लेखन के दृष्टिगत इसे अलग विधा के रूप में मान्यता दी जा सकती है। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, नरेंद्र कोहली, शेर जंग गर्ग, रविंद्र त्यागी, शंकर पुणातांबेकर, डा. शिव शर्मा, डा. जन्मजेय, रतन सिंह हिमेश, अशोक गौतम, गुरमीत बेदी, सुदर्शन वशिष्ठ, संतोष नूर जैसे साहित्यकारों ने व्यंग्य के क्षेत्र में साहित्य की श्री वृद्धि की है।अन्याय, असत्य, अत्याचार, अनाचार-विकार-विसंगतियों, आडंबर व पाखंड के खिलाफ  व्यंग्य विधा अत्यंत द्रुत गति से आक्रमण करके मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने, राष्ट्रीय समरसता के लिए कार्य करती है। यद्यपि अन्य विधाएं भी लोकमंगल के लिए ही कार्य करती हैं, किंतु व्यंग्य तीर की भांति दु्रत सीधे ही और तीक्ष्णता के साथ चुभता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में व्यंग्य के क्षेत्र का अत्यंत विस्तार हुआ है। और एक स्वतंत्र विधा मानने में कोई संकोच भी नहीं होना चाहिए।

आकाशवाणी से दूरदर्शन, दैनिक से मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक आदि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य हाथों-हाथ लिया जाता है। व्यंग्य पत्रिकाएं प्रकाशित होने के साथ अनेक पत्रिकाएं समय-समय पर व्यंग्य विशेषांक निकालती हैं। जिस भी क्षेत्र में व्यंग्यकारों को विसंगति-पाखंड नजर आया और तुरंत उनकी व्यंग्य भरी लेखनी ने तीक्ष्ण प्रहार किया। कोई भी तिलमिलाए बिना नहीं रह सकता और निज में बदलाव लाने का हरसंभव प्रयत्न करता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य की अनुपस्थिति खालीपन ही दर्शाती है जबकि विधानुकूल व्यंग्य विधा की पठनीयता में चार चांद लगाता है। इससे भी दो कदम आगे व्यंग्य विधा रहती है। अब चाहे हास्य से व्यंग्य सर्जित हो या व्यंग्य से हास्य का सृजन, यह सब है तो मनोरजंन और लोकमंगल के लिए ही। जिन समस्याओं या विकृतियों के मद्देनजर साहित्य की किसी विधा का सृजन होता है, उन्हीं के अंतर्गत ही व्यंग्य का भी प्रणयन होता है। जब साहित्य में व्यंग्य की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है तो व्यंग्य को अलग विधा के रूप में मान्यता देने में हिचकिचाहट नहीं रहनी चाहिए। व्यंग्य रचनाएं स्वयं ही व्यंग्य के तत्त्वों को परिभाषित करती हैं। अतएव व्यंग्य को अलग विधा के रूप में मान्यता देना सर्वथा उचित है।

कसौली लिट फेस्ट : समर नहीं, ज़रूरी है संवाद

अजय पाराशर

मो.-9418252777

आज के कारपोरेट युग में जब किसी भी क्षेत्र में हर ़कदम सुनियोजित ढंग से उठाया जाता है, यह उम्मीद करना कि ़खुशवंत सिंह लिट फेस्ट केवल साहित्य की सेवा के उद्देश्य से आयोजित किया गया, बेमानी है। यही हाल उन जागरण या हिंदू मंच-संगठनों का है, जिन्होंने तथाकथित विवादास्पद चर्चाओं के बाद प्रदर्शन किए और तमाम पदाधिकारियों एवं नेताओं ने अनाप-शनाप बयान जारी करते हुए, एक नेता-लेखक के लिट फेस्ट पर सपाट बयान दिए जाने के बावजूद उसके पुतले फूंके। स्पष्ट है, सब अपने स्वार्थों की हांडी को सेंक लगाने में व्यस्त और मस्त हैं।  अगर लिट फेस्ट का उद्देश्य साहित्य की सेवा होता, तो विवादास्पद विषयों पर चर्चा या बिकाऊ किताबों के अलावा कितने नए लेखकों की पुस्तकों का विमोचन हुआ, विचारणीय है। मनीषा कोइराला की पुस्तक हील्ड इसीलिए हाथोंहाथ बिकी कि वह साधन-संपन्न ़िफल्मी स्टार हैं। अगर कैंसर से ़फतहयाब किसी ऐसे मज़दूर या किसान ने यह पुस्तक लिखी होती जिसका घर और ज़मीन तक इलाज में बिक गए होते तो कितने लोग इसे ़खरीदते? इसी तरह अगर तवलीन सिंह और राधा सिंह ने कश्मीर पास्ट इम्परफैक्ट एंड यूचर टैंस की बजाय राजनीति में आए छिछोरेपन, समाज या ़िफल्मों में बढ़ती अश्लीलता और अपराध या ़गरीबी पर चर्चा की होती तो क्या तथाकथित जागरण संगठन उसके समर्थन या विरोध में खड़े होते? हिमाचल सरकार द्वारा पांच लाख न दिए जाने की पीड़ा आयोजकों को शायद संसाधनों की कमी के कारण नहीं बल्कि सत्ता का स्वीकार-आशीर्वाद न मिलने के कारण खली होगी। संसाधनों की कमी होती, तो आयोजक इस लिट फेस्ट का रायता अगले वर्ष फरवरी में दिल्ली में फैलाने की घोषणा न करते। अगर फेस्ट में विवादास्पद विषय नहीं उठाए गए होते तो न आयोजकों को लाभ होता न जागरण मंचों को। यह वही तवलीन सिंह हैं, जो हाल तक अपने लेखों में प्रधानमंत्री के तमाम ़कदमों को सराहते नहीं थकतीं थीं। अगर ़खुशवंत सिंह बाबरी मस्ज़िद बनते देखना चाहते थे तो उन्होंने भिंडरावाले का भी ़खुलकर विरोध किया था। जागरण मंचों को वास्तव में देश-समाज की ़िफ़क्र होती तो वे समाज, राजनीति, सिनेमा और आर्थिक क्षेत्र में आ रही गिरावट पर भी प्रदर्शन करते? ज़ाहिर है, सभी को अपने स्वार्थों के चूल्हे जलाने के लिए लकडि़यां चाहिए, फिर वे कहीं से मिलें क्या ़फ़र्क पड़ता है। देश तो कल भी था, आज भी है और शायद कल भी रहे!

साहित्यिक सरोकारों की उत्कृष्ट पत्रिका ‘समहुत’

साहित्य के मर्म से-3

वर्तमान समय में साहित्यिक पत्रिका निकालना सतुत्य तो है ही, लेकिन यह साहित्य के प्रति पूर्णतः समर्पित, जुनून एवं जुझारूपन को भी दर्शाता है। डा. अमरेंद्र मिश्र ऐसे ही विरले व्यक्तियों, शख्सियतों में शुमार हैं। इसका जीवंत उदाहरण पांच वर्षों से अबाध रूप से प्रकाशित ‘समहुत’ पत्रिका है जो श्रेष्ठ रचनाओं तथा रचनाकारों को एक सशक्त मंच उपलब्ध करने का कार्य कर रही है। पत्रिका का जुलाई-सितंबर 2019 का अंक वरिष्ठ एवं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आलेखों, कहानियों, कविताओं, गजलों एवं विविध पुस्तक समीक्षाओं से समृद्ध है। अपने संपादकीय में डा. मिश्र ने प्रख्यात कवि गिरिजा कुमार माथुर की शताब्दी वर्ष के मौके पर उन्हें भावपूर्ण स्मरण करते हुए उनके साथ अपनी पहली औपचारिक मुलाकात का बहुत रोचक वर्णन किया है। गिरिजा कुमार माथुर के निजी जीवन से संबंधित कई ऐसे अनछुए पहलुओं, प्रसंगों का उल्लेख किया है जो सामान्य पाठकगण शायद न जानते हों। विष्णु खरे पर प्रकाश मनु का संस्मरण कई आयामों से परिचित कराता है। गोवर्धन यादव ने विष्णु खरे की एक बरगद के पेड़  से तुलना की है। डा. नामवर सिंह का जाना आलोचना की वैचारिक तेजस्विता की अपूर्णीय क्षति है। ऐसा मानने वाले योगेंद्र दत्त शर्मा ने आलोचना से संबंधित भूत, वर्तमान एवं भविष्य को खंगाला है। सविता चड्ढा का ‘महिला लेखन एवं चुनौतियां’ भी पत्रिका में है तो चंद्रप्रभा सूद का ‘शब्द’ भी है जो भावों, संवेदनाओं, संवादों का सशक्त माध्यम है। पत्रिका में पांच कहानियां एवं एक अमरीकी कहानी का हिंदी रूपांतर है। कहानीकारों में चर्चित एवं स्थापित नाम हैं। दीपक शर्मा, सुदर्शन वशिष्ठ, गीता पंडित आदि अपनी कहानियों में गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। काकोली गोराई की कहानी ‘उपहार’ में रामदीन की घोर गरीबी की स्थितियों, परिस्थितियों एवं चौदह वर्षीय बेटी मुनिया की अपनी आयु से अधिक परिपक्वता से आंखें नम हो जाती हैं। ‘दान पुन्न’ कहानी में सुदर्शन वशिष्ठ की भाषाई आंचलिकता मुखर होने लगती है। कुछ शब्द ठेठ पहाड़ी यानी कांगड़ी में हैं, जिनसे पाठकों के नए शब्दों के ज्ञान में न केवल इजाफा होगा, बल्कि उनसे रूबरू भी होंगे। लेकिन हिमाचल जैसे उन्नत राज्य में आज के समय भी घर में कैरोसीन लैंप जलाना कुछ जमता नहीं है! संतोष खरे का ‘महात्मा गांधी के अनुगामी’ एक करारा व्यंग्य है, तो वेद प्रकाश भारद्वाज ने ‘चिंतन और हाथी’ के माध्यम से बाण चलाया है। कविताओं में पंखुरी सिन्हा, केशव शरण की कविताएं प्रभावित करती हैं। पांचों गजलकारों की गजलें अत्यंत सरस एवं विचारणीय हैं। मेरा अभिमत है कि साहित्य वही श्रेष्ठ  है जो पाठक में विचार पैदा करे, बौद्धिक सोच को विकसित करे, स्वस्थ समाज की संरचना में सहायक बने, कुरीतियों का पर्दाफाश करे व उन्हें ध्वस्त करे। ‘बस्ती बरहानपुर’ प्रख्यात लेखक रूप सिंह चंदेल का नवीनतम उपन्यास है। बीभा कुमारी ने उपन्यास की समीक्षा करते हुए जैसे एक-एक रेशे को बारीकी से देख-परख कर बुना और कसा है। जय प्रकाश मानस के कविता संग्रह ‘सपनों के करीब हों आंखें’ की अनिल कुमार पांडे ने रोचक व सटीक समीक्षा की है। इसके अलावा भी पत्रिका में काफी पठनीय सामग्री है। पत्रिका में विविध साहित्यिक गोष्ठियों, परिचर्चाओं और आयोजनों की रपट भी हैं। पत्रिका के सुंदर आवरण का चित्र सुप्रसिद्ध कलाकार एवं कवि कुंअर रवींद्र का बनाया है। भीतरी पन्ने अनुभूति गुप्ता के आकर्षक रेखा चित्रों से सज्जित हैं। साहित्य से सरोकार रखने वालों के लिए पत्रिका के रूप में यह एक साहित्यिक दस्तावेज है। ऐसी सुपाठ्य एवं संस्कारशील पत्रिका प्रकाशित करने के लिए संपादक डा. अमरेंद्र मिश्र बधाई के पात्र हैं।

-शेर सिंह, कुल्लू

(नोट : लेखकों से आग्रह है कि वे हमें राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं की समीक्षा भेजते रहें। समीक्षाओं को हम प्रकाशित करेंगे। -प्रभारी, फीचर डेस्क)

व्यंग्य और कॉमेडी में है व्यापक अंतर

डा. कुंवर दिनेश सिंह

मो.-9418626090

व्यंग्य और हास्य अथवा कॉमेडी साहित्य की बहुत लोकप्रिय विधाएं हैं जिनमें हास्य द्वारा भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। निःसंदेह दोनों में हास्य-तत्त्व विद्यमान होता है, परंतु कॉमेडी और व्यंग्य की  तकनीक, शिल्प, शैली और लक्ष्य में बहुत अंतर होता है। व्यंग्य के पाठक-दर्शक हमेशा उन्हीं कारणों से नहीं हंसते हैं जिन कारणों से कॉमेडी के दर्शक हंसते हैं। कॉमेडी अथवा हास्य एक नाटकीय रचना है जिसका प्रमुख उद्देश्य ही हंसाना और कहानी को सुखांतक बनाना है। कॉमेडी को दो वर्गों में रखा जा सकता है ःउच्च और निम्न। निम्न वर्ग की कॉमेडी का प्रमुख उद्देश्य मात्र हंसी पैदा करना होता है और इसके अतिरिक्त अन्य कोई उद्देश्य नहीं होता, जबकि उच्च वर्ग की कॉमेडी का प्रमुख लक्ष्य सामाजिक आलोचना करना होता है। व्यंग्य उच्च श्रेणी में आता है। और यही व्यंग्य हास्य और कॉमेडी हास्य के बीच मुख्य अंतर है। व्यंग्य भी पाठकों-दर्शकों को हंसाने की शक्ति रखता है, किंतु व्यंग्य का लक्ष्य समाज में व्याप्त आडंबर, कुरीतियों, विद्रूपताओं और विषमताओं को उजागर करना और उनकी सम्यक आलोचना करना है। एक प्रभावी व्यंग्य रचना में विडंबना, रूपक, व्यंजना, अतिशयोक्ति, विरोधाभास और अनेकार्थी शब्दों के प्रयोग से हास्य उत्पन्न करने के साथ-साथ पाठक-दर्शक के हृदय में सामाजिक कर्त्तव्य का बोध जगाने की क्षमता भी होती है। हास्य परिस्थितिजन्य होता है, जबकि व्यंग्य आलोचनात्म्क एवं प्रतिक्रियात्मक होता है। व्यंग्य और हास्य दोनों कॉमिक-हास्यपूर्ण स्थितियों को दर्शा सकते हैं, लेकिन विभिन्न तकनीक और तत्त्वों के प्रयोग से। कोई भी स्थिति जो हंसी का कारण बनती है, उसका विश्लेषण किया जा सकता है। साधारण हास्य-विनोद का उद्देश्य किसी भी मानवीय दोष और कमियों की निंदा करना नहीं है, जबकि व्यंग्य में मानवीय व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया रहती है। यह स्पष्ट है कि कॉमेडी में हास्य का प्रयोग हंसने-हंसाने के लिए किया जाता है और किसी उद्देश्य के लिए नहीं। इसके विपरीत व्यंग्य में हास्य का प्रयोग उपहास, आलोचना, तानाकशी अथवा कटाक्ष के उद्देश्य से किया जाता है। कॉमेडी का एकमात्र लक्ष्य रहता है पाठक अथवा दर्शक को सुखदानुभूति प्रदान करना, उसके मानसिक तनाव को कम करना और उसे आराम देना। वहीं व्यंग्य का लक्ष्य कॉमेडी से बिल्कुल भिन्न रहता है, पाठक-दर्शक को उसकी वास्तविकता से परिचित कराना, उसके परिवेश के यथार्थ से उसे अवगत कराना और सच्चाइयों के प्रति उसे सजग करना और साथ ही दैनिक जीवन की विभिन्न समस्याओं के मूलभूत कारण को समझना व उसका निदान करना तथा अपनी त्रुटियों एवं जीवन व समाज विरोधी अवधारणाओं को दुरुस्त करना। हास्य और व्यंग्य दोनों को कथानक की आवश्यकतानुसार विभिन्न शैलियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। हास्य की कुछ प्रचलित शैलियों में उल्लेखनीय हैं ः प्रहसन (किंचित व्यंग्यात्मक), हास्यरस-प्रधान (एक प्रकार का रूपक), हास्यानुकृति (मनोरंजक ढंग से किसी का अनुकरण करना), रूमानी सुखांतिकी (रोमांटिक कॉमेडी प्रेम के विषय पर आधारित है जिसमें प्रायः दो प्रेमियों की कहानी शामिल होती है जो बिछुड़कर भी अंत में एकजुट होते हैं), स्वांग (फार्स-अतिरंजित क्रियाकलापों, पात्रों और बेतुकी स्थितियों के उपयोग से हास्य उत्पन्न करना) और ब्लैक कॉमेडी (गंभीर विषय जैसे मौत, युद्ध आदि को हास्य के साथ प्रतिपादित करना)। इसी प्रकार पाश्चात्य साहित्य में भी व्यंग्य को दो मुख्य शैलियों में वर्गीकृत किया गया है ः होरेशियन व्यंग्य और जुवेनेलियन। होरेशियन व्यंग्य, जिसका नाम रोमन व्यंग्यकार होरेस के नाम पर रखा गया है, सौम्य, विनोदपूर्ण और मनोरंजक व्यंग्य का एक रूप है जो लोगों के बेतुके व्यवहार का उपहास करता है। जुवेनेलियन व्यंग्य, जिसका नाम प्राचीन रोमन व्यंग्यकार जुवेनल के नाम पर रखा गया है, एक औपचारिक व्यंग्य है जो समाज में व्याप्त अव्यवस्था पर आक्रोश के साथ हमला करता है। जुवेनेलियन व्यंग्य होरेशियन व्यंग्य की तुलना में अधिक कठोर और तीक्ष्ण होता है।