Thursday, July 09, 2020 03:59 AM

जीवन की सांझ को सांझा करें

नरेश कुमार

लेखक बैजनाथ से हैं

यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के सात लाख व्यक्ति हैं जो  राज्य की कुल आबादी का 10.2 फीसदी हैं। यह 8.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। देवभूमि में बुजुर्गों की आबादी सालाना 3.1 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है और इसके 2026 तक 1.1 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो उस वर्ष तक राज्य की कुल आबादी का लगभग 15 फीसदी होगा...

क्या अपनी जड़ों से पृथक किसी वृक्ष के अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है। एक वृक्ष का अस्तित्व जिस प्रकार उसकी जड़ों में समाहित होता है, कुछ इसी तरह हमारे जीवन को जीवंत बनाने का श्रेय किसी को जाता है तो वह बड़े-बुजुर्ग हैं। इनके बिना आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपेक्षित उन्नति की कल्पना नहीं कर सकते हैं। ऐसा कहने के कुछ निहतार्थ हैं। बड़े-बुजुर्ग का जिक्र आते ही हमारे मन में जो पहला चेहरा सामने आता है, वह उन दादा-दादी का होता है जिनकी गोद में पहले हमारे माता-पिता और फिर हम खेलते हैं। जो हमें जीवन के गूढ़ संदेश बहुत ही सरल शब्दों में कहानियों-किस्सों, उदाहरणों और प्रतीकों के जरिए समझा देते हैं। जिनके संस्कारों की अभिव्यक्ति से हम अपना और भावी पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित रखते हैं। कोरोना संकट की तात्कालिक परिस्थितियों के अलावा भी समाज में जिस प्रकार से बुजुर्गों के प्रति व्यावहारिक आचरण में गिरावट आई है, वह कहीं न कहीं भारत की उस संस्कृति पर कुठाराघात है जो सनातन के उस तत्त्व पर टिकी है जिसका प्राण ही संस्कार व परिवार प्रबोधन है। आज विश्व जिस अदृश्य कोरोना वायरस से पैदा संकट से जूझ रहा है, कोरोना को लेकर जैसे ही हमारे पास पहला समाचार आया होगा, उसमें हमने यही पाया कि इसका सबसे अधिक असर यदि किसी पर पड़ता है तो वह उम्रदराज लोग हैं। यानी हमारे घर के बड़े, बुजुर्ग सदस्यों पर कोरोना के संक्रमण का  खतरा अधिक है। यह कोरोना के मामले में ही है, ऐसा नहीं है। सामान्यतः कई दूसरी बीमारियों की चपेट में यदि कोई सबसे पहले आता है तो वह बड़े-बुजुर्ग होते हैं क्योंकि समय के अनुसार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है। ऐसे में इन परिस्थितियों के बीच एक बार पुनः इस बात पर चिंतन की आवश्यकता है कि समाज में सबसे अधिक यदि किसी को ध्यान देने और संभालने की आवश्यकता है तो वह हमारी अपनी वह पीढ़ी है जिसे हम दादा-दादी, नाना-नानी और ताऊ जैसे कई संबोधन से पुकारते हैं। यहां मैं विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश का जिक्र करना चाहूंगा।

आज जब देश भर में ओल्ड एज लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और साथ ही परिवर्तित हो रहा है उनके प्रति नजरिया, तो ऐसे में हिमाचल प्रदेश ने अपने संस्कारों को यदि बचा कर रखा है तो उसके पीछे यहां के लोगों के जीवन में अपने गांव, संबंधों व रीति-रिवाजों के प्रति आदर भाव है। भारतीय सेना हो या फिर देश के अन्य संस्थानों में कार्य करने वाले हिमाचल के लोग, अंततः अपने मूल की ओर लौटना चाहते हैं, आज यह उनकी सबसे बड़ी ताकत के रूप में सामने आया है। यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के सात लाख व्यक्ति हैं जो  राज्य की कुल आबादी का 10.2 फीसदी हैं। यह 8.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। देवभूमि में बुजुर्गों की आबादी सालाना 3.1 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है और इसके 2026 तक 1.1 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो उस वर्ष तक राज्य की कुल आबादी का लगभग 15 फीसदी होगा। राज्य की 90 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, अतएव यह कहा जा सकता है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों  की बढ़ती संख्या एक बड़ी घटना है। लगभग तीन-चौथाई बुजुर्ग अपने परिवार के सदस्यों के साथ रहते हैं तथा सामाजिक और धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था, घरेलू सामान और संपत्ति खरीदना जैसे पारिवारिक निर्णयों  में बुजुर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोरोना महामारी से निपटने के लिए किए गए लॉकडाउन को यदि हम सकारात्मक पहलू से देखें तो इसने हमें बड़े-बुजुर्गों के साथ संवाद और सेवा का अवसर दिया है। उनके साथ बैठकर बातें करने, उनके अनुभव सुनने, साथ में भोजन करने की ये छोटी लेकिन ऐसी बातें हैं जिनसे हम समाज में परिवार नामक सामाजिक संस्था को पुनः मजबूत होते देख रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में बुजुर्गों के अधिकारों को लेकर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था दादा-दादी फाउंडेशन की पहल पर आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में मैंने कुछ प्रमुख बातें रखीं जो बुजुर्गों के प्रति समाज में अच्छा वातावरण बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

पहला, बड़े-बुजुर्गों के साथ संवाद बढ़ाएं। अकसर हमने देखा होगा कि हम बड़े-बजुर्गों को उनकी ही दुनिया में रहने के लिए छोड़ देते हैं। दूसरा, कर्त्तव्यों को पूर्ण कर सेवा का स्पर्श दें। बुजुर्गों के प्रति आपका जो नैतिक व सामाजिक दायित्व है, उन्हें पूर्ण करें। तीसरा, बड़ों से संस्कार लें और जीवन में उतारें। अकसर आपने देखा होगा कि बच्चे मोबाइल फोन इत्यादि में व्यस्त रहते हैं, लेकिन दादा-दादी के लिए समय नहीं रहता। चौथा, बुजुर्गों की उपलब्धियों को साझा करें। आज हमारा समाज कल्पनालोक के हीरो की तलाश में रहता है। हम फिल्मों और किताबों में आदर्श प्रतिमान खोजते रहते हैं, जबकि हर घर में बड़े-बुजुर्गों के जीवन की उपलब्धियों से जीवन को प्रेरणा दी जा सकती है। पांचवां, जीवनशैली में आ रहे बदलावों में बड़े-बुजुर्गों को शामिल करें। अकसर हम ऐसी धारणा बना लेते हैं कि टेक्नोलॉजी, फैशन और सोशल मीडिया आदि से उनका क्या वास्ता, जबकि ऐसा नहीं है। एक समय में वह भी अपनी पीढ़ी के बदलाव के वाहक रहे हैं। छठवां, जीवन के हर मोड़ पर लें सुझाव। यह मत भूलें कि आप भले ही कितने ही योग्य और ऊंचे पदों पर बैठ हों, उम्र के आधार पर प्राप्त अनुभव किसी किताब या पद से हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए जीवन में कभी भी असमंजस की स्थिति हो, उनसे उनकी राय लें। सातवां, अकेलेपन से बचाएं। आज बुजुर्गों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उनके भीतर बढ़ता अकेलापन और माननिक अवसाद है। आठवां, आर्थिक सुरक्षा प्रदान करें। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, बुजुर्गों की आवश्यकताओं व प्राथमिकताओं का स्वरूप बदल जाता है। उनके लिए दवाओं, इलाज, कपड़े समेत हर आवश्यकता के लिए आर्थिक सुरक्षा देनी होगी। ऐसा करके हम बुजुर्गों का आशीर्वाद पा सकेंगे।