जूता प्रपंच की महिमा न्यारी

रामविलास जांगिड़

स्वतंत्र लेखक

समकालीन भारतीय राजनीति में ‘चरण पादुका साहित्य सम्मेलन’ काफी सुर्खियां बटोर चुका है। बहुत-बहुत धन्यवाद इन महानुभावों का, जिन्होंने जूते नामक अस्त्र, शस्त्र का महत्त्व पूरी दुनिया को बताया। शरीर को ढकने के अन्य तमाम उपाय केवल  शरीर को ढकते हैं, परंतु जूता ही ऐसा यंत्र है, जो शरीर को ढकता भी है और खाया-खिलाया भी जाता है। इस तरह से जूता एक परम विशिष्ट खाद्य पदार्थ की हैसियत रखता है। हमारी राजनीति में उत्कृष्ट कोटि के जूताचाट्यविद दिखाई पड़ रहे हैं। ये हजरत जूते को हाथ में लेकर अथवा जूते तक अपना मुंह ले जाकर, ऐसे कलामयी व रहस्यमयी ढंग से जूते चाटने का कर्म करते हैं कि लोग गश खाकर ही गिर पड़ते हैं। ऐसे परम जूताचाट्यविद इस लोक का यश भोगकर परलोक में भी स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं। वास्तव में जूता और बेलन दोनों ही अस्त्र और शस्त्र के रूप में मान्यता लिए हुए हैं। जहां पत्नियां घर में बेलन का उपयोग अस्त्र-शस्त्र रूप में करती हैं, वहीं पति महाशय जूतों का उपयोग घर के बाहर बतौर चालू नियम के संसद सदस्य के रूप में विधिविधान से करते हैं। जूता फेंककर चलाया जाए, तो वह अस्त्र बन जाता है और जब जूते को हाथ में लेकर किसी की खोपड़ी वगैरह पर चटकाया जाए, तो यह शस्त्र बन जाता है। बेलन की भी यही कथा है। अगर जूता नया हो व खोपडि़या एकदम पुरानी हो, तब दोनों के टूटने-फूटने तक जो जूताशास्त्री इसे उपयोग में लें, तो यह महिमा पुराण, सातदीप, नव-खंड में चैनल-चैनल गुंजायमान होती है। फलतः गोबर गणेश भी पार्टी के टिकट का स्वामी बनकर चुनाव जीत जाता है। जूता चाटने, जूते में दाल बांटने और जूतियां उठाने के बाद भी अगर कोई जूतियां चटकाता मिले, तो उसे घबराना नहीं चाहिए। एक प्रमुख जूताशास्त्री ने बताया कि अगर आप आठ शनिवार तक जूतों को खूब पहन लें, हर शनिवार को उन जूतों पर किसी राजनीतिक पार्टी के विचारों का तेल, उड़द, सिंदूर, आलपिन, नींबू आदि चढ़ाकर विधिवत रूप से इनकी पूजा कर लें, पार्टी फंड में रुपयों का चढ़ावा करें। फिर एक शनिवार को इन जूतों को किसी राजनीतिक पार्टी कार्यालय के बाहर चुपचाप खोल दें। पीछे मुड़कर न देखें। पार्टी के अंदर घुसपैठ कर लें। पार्टी अध्यक्ष के जूतों का लगातार सेवन करें। अध्यक्षीय जूतों के विशिष्ट स्थल तलवे महाशय को चाटते रहें, तो जूतियां चटकाने की परेशानी पलक झपकते खत्म होती देखी गई है। संत कबीर नगर के माननीय ने इस पुनीत कार्य को उद्घाटित किया जो सराहनीय है। चलूं! बाहर जूताबाजी का विशिष्ट कार्यक्रम हो रहा है। फिर कोई महान अपनी महानता का भयंकर प्रदर्शन कर रहा है। जूतस्य, जूतयो, चरण पादुका की इस षष्ठी विभक्ति को प्रणाम करने के अलावा कोई और उपाय नहीं है।

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