Tuesday, September 17, 2019 02:22 PM

जो बोएंगे, सो पाएंगे

सिर्फ होते आए को जीवन की सच्चाई बना लेने से वर्तमान की किताब कभी नहीं खुलती। बीत चुके को माथे का ताज बनाकर हम अपाहिज होने के श्राप से मुक्त नहीं हो सकते। साधनों की शुचिता को तिरस्कार कर कभी कोई महामानव नहीं हुआ। जिंदगी को हमारे द्वारा दिया गया आदर ही हमें सत्कार दिलाया करता है। सिर्फ अपनों को दी कथित तरजीह ने हर सिंहासन पर ताबूती कील ठोकी है। मत-मतांतर के रसास्वादन के बिना जीवन की खिल-खिलाहट हम से मुंह मोड़ लेती है। आपका मतैक्य तभी सार्थकता के आयाम छू पाएगा यदि मत विभाजन को अनादृत नहीं किया गया है। दूसरों के सुख से ईर्ष्या करने वालों को कभी सद्भावना का गीत सुनाई नहीं दिया। जो आज अपने घर को जैसे-तैसे भरने के लिए ललचाए हुए हैं, वे कल इसी घर में अकेलेपन में घिरे आर्तनाद करते मिलेंगे। बोने के लिए, लिए गए बीज की उत्तमता ही फसल की संभावना को तय करेगी। हम जो आज रोप रहे हैं, वही हमारे भविष्य की झोली में आकर रहेगा। दूसरों के लिए बबूल और अपने लिए आम बोने की चालाकी ने न बबूल और न आम को कभी पकने दिया, ध्यान रहे। वक्त से हमेशा मांगने वालों को अकसर अलविदा कहने के समय भिखारी पाया गया। समाज को हांकने वाली ताकतों को अपने समय में ही जमींदोज होते देखा जाता है। इसलिए जिंदगी से सिर्फ लेने की बजाय इसे देने का किया गया हीला ही हमारे भीतर की हलचल को सार्थकता देगा।