Monday, November 18, 2019 04:16 AM

टौणी देवी मंदिर

मुगल साम्राज्य में अकबर और पृथ्वी राज चौहान के युद्ध के समय की गाथा से टौणी देवी माता मंदिर का गहरा नाता है। करीब 300 साल पहले अकबर और पृथ्वी राज चौहान का युद्ध  हुआ था। इस दौरान लोगों के धर्म को परिवर्तित करने का दौर भी खूब चला। इसी दौर से बचने के लिए चौहान वंश के कुछ परिवार राजस्थान से टौणी देवी आ पहुंचे। यहां पर शरण लेने के उपरांत दिन के समय पुंग खड्ड में छुप जाते थे, जबकि रात के समय सभी टौणी देवी में एक गुफा में रहते थे।  इनमें सात भाई भी अपने परिवार सहित आ पहुंचे थे। इनकी इकलौती बहन थी, जिसे सुनाई नहीं देता था। सभी भाभियां इस देवी को खूब सताती थीं। दिन के समय सभी भाई कहीं बाहर गए थे और भाभियों ने ननद को खूब खरी-खोटी सुनाई, दुखी होकर वह लड़की धरती में समा गई। जब भाई घर पहुंचे, तो देखा कि उनकी बहन अपनी भाभियों की प्रताड़ना से तंग आकर समाधि ले चुकी है।

भाइयों ने अपनी बहन की याद में टौणी देवी में एक पूजन स्थल बना दिया और यही स्थल आज विशाल मंदिर में तबदील हो गया है। आज भी माता की पूजा-अर्चना से पहले दो पत्थरों को आपस में टकराया जाता है। आस्था है कि कानों से न सुनने वाली देवी को पत्थर की आवाज से अपनी ओर ध्यान करवाया जाता है। टौणी देवी माता राष्ट्रीय उच्चमार्ग-70 पर है। हमीरपुर से मंडी रोड पर करीब 14 किलोमीटर का सफर तय करने पर माता के मंदिर में पहुंच सकते हैं। देवी चौहान वंश की कुलदेवी है। क्षेत्र के चौहान वंश के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब व हिमाचल के विभिन्न स्थानों के लोग यहां कुलदेवी को मनाने के लिए हर वर्ष आते हैं। चौहान वंश के लोग किसी भी शादी-समारोह के शुरू होने से पहले मंदिर में माता को प्रसाद चढ़ाते हैं। मां का आशीर्वाद लेने के उपरांत ही हर कार्य शुरू होता है।

हर वर्ष अषाढ़ मास के दस प्रविष्टे के दिन यहां पर विशाल मेले का आयोजन होता है। क्षेत्र के लोग अपनी कुलदेवी को फसल का चढ़ावा चढ़ाते हैं। माता के दर पर सच्चे मन से की गई हर फरियाद हमेशा पूर्ण होती है। इसी आस्था के चलते मंदिर में हर दिन श्रद्धालु चले रहते हैं। आज यहां पर भोले नाथ, हनुमान जी, शनिदेव महाराज, बाबा बालकनाथ जी, श्री साई की मूर्ति स्थापित है। स्थानीय लोगों की इस मंदिर में गहरी आस्था है।