Tuesday, March 31, 2020 08:10 PM

ट्रंप  के सीएए, कश्मीर सरोकार

‘नमस्ते ट्रंप ’ का आयोजन बेहद गर्मजोशी से किया जा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति की बहुआयामी शख्सियत से लेकर उनकी प्रेम कहानी तक के विभिन्न पहलुओं को देश को दिखाया-बताया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि कोई मेहमान राष्ट्रपति नहीं, बल्कि कोई बेहद महत्त्वपूर्ण चेहरा भारत की सरजमीं पर अवतरित हो रहा है। विश्व के आश्चर्यों में शामिल ताजमहल को निखारा गया है, तो एक-एक चप्पे का शृंगार भी किया गया है। भारत किसी सामंतशाही या पूंजीवादी देश के नेता का नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्र के राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछाए है। यह हमारी विनम्रता और संस्कृति भी है, क्योंकि भारत भी दुनिया का सर्वश्रेष्ठ और साबित लोकतंत्र है और उतना ही प्राचीन भी है। लिहाजा ‘नमस्ते ट्रंप ’ दो लोकतांत्रिक देशों के दो महाबली नेताओं का मिलन और दोतरफा संवाद का प्रतीक है। यदि लोकतांत्रिक गरिमा और सम्मान बरकरार रखना है, तो लक्ष्मण-रेखा  नहीं लांघनी चाहिए। एक-दूसरे के आंतरिक मुद्दों पर न तो सवाल किया जाना चाहिए और न ही तीसरा पक्ष बनने की कोशिश करनी चाहिए। यह टिप्पणी करते हुए हमें तकलीफ  और पीड़ा का एहसास हो रहा है, क्योंकि हम मेहमाननवाजी को सवालिया बनाने के पक्षधर नहीं रहे हैं। अमरीका के ‘व्हाइट हाउस’ की आधिकारिक खबर है कि राष्ट्रपति ट्रंप , प्रधानमंत्री मोदी से संवाद के दौरान या सार्वजनिक तौर पर भी नागरिक संशोधन कानून (सीएए), एनआरसी और कश्मीर पर बात कर सकते हैं। वह धार्मिक और अल्पसंख्यक आजादी को लेकर भी अमरीका की चिंता और सरोकार जता सकते हैं। ‘व्हाइट हाउस’ के एक अधिकारी ने कहा है कि इन मुद्दों को लेकर हम चिंतित हैं। हमें लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ इन मुद्दों को उठाया जा सकता है, क्योंकि ये अमरीकी प्रशासन के लिए बेहद अहम हैं।’ भारतीय विशेषज्ञ इसे  दबाव की रणनीति मान रहे हैं, जबकि अमरीकी लेखक-पत्रकार सिर्फ  सियासी बयानबाजी करार दे रहे हैं। हालांकि बाद में ‘व्हाइट हाउस’ ने माना है कि भारत धार्मिक और भाषायी विविधता वाला देश है। सीएए भारत का अंदरूनी मामला है। यदि फिर भी ट्रंप  ऐसा करते हैं, तो ‘नमस्ते ट्रंप ’ की भावनाओं में खटास का एहसास हो सकता है। आखिर भारत-अमरीका संवाद के दौरान इन सवालों के मायने क्या हैं? अमरीकी राष्ट्रपति पहले भी दोगली जुबान में बोलते रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मौजूदगी में उन्होंने अमरीकी मीडिया को ब्रीफ  किया था कि वह भारत-पाकिस्तान में मध्यस्थता की भूमिका निभा सकते हैं। अमरीका चाहता है कि दोनों देशों की नियंत्रण-रेखा पर शांति और स्थिरता बनी रहे। दोनों देशों के बीच तनाव और विवादित बयानों से माहौल जंगनुमा बना रहता है। ‘व्हाइट हाउस’ का यह भी बयान है कि बीते साल 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के बाद से भी हालात तनावग्रस्त हैं। जाहिर है कि अमरीका अनुच्छेद 370 का उल्लेख कर रहा है, जबकि इसे भारतीय संसद ने पूरी बहस के बाद पारित किया था। अमरीका को कितनी बार बताना पड़ेगा कि जम्मू-कश्मीर भारत गणराज्य का अटूट हिस्सा है। इसी तरह सीएए भी भारतीय संसद ने पारित किया था और वह कानून लागू भी हो चुका है। यदि राष्ट्रपति ट्रंप  ऐसे सवाल उठाते हैं, तो भारत की प्रभुसत्ता और संप्रभुता को ही चुनौती होगी और यह भारत को स्वीकार्य कैसे हो सकता है? हालांकि अमरीका ने फाट्फ  में पाकिस्तान के खिलाफ  वोट किया था। अमरीका कहता रहा है कि पाकिस्तान को अपने देश में आतंकियों पर कार्रवाई करके उन्हें समाप्त करना चाहिए। ट्रंप  प्रशासन ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में भी कटौती की है। फिर समझ नहीं आता कि वह भारत और पाकिस्तान को एक ही पलड़े में तोलना क्यों चाहते हैं? अमरीका एक तरफ  कोई और बात करता है, तो अफगानिस्तान में तालिबान के साथ उसकी बातचीत, सौदेबाजी भी प्रस्तावित है। क्या ट्रंप  वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति को नजरअंदाज कर रहे हैं? धार्मिक और अल्पसंख्यक आजादी का भारत का रिकॉर्ड दुनिया जानती है। हम उस पर स्पष्टीकरण क्यों दें? बहरहाल यदि अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर अपने स्वदेशी कोर वोट बैंक को संबोधित कर रहे हैं, तो कमोबेश यह मौका और मंच उसके अनुकूल नहीं है। फिलहाल वे मुद्दे सामने आने चाहिए, जिनसे दोनों देशों के रिश्ते मजबूत होते हों। कूटनीति और रणनीति की यहां गुंजाइश नहीं है।