डब्ल्यूटीओ को प्रभावी बनाएं

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

 

पिछले दिनों 13 एवं 14 मई की नई दिल्ली में हुई मंत्री स्तरीय बैठक में इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार-मंथन किया गया कि यदि  विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती, जैसे कि उसे करना चाहिए, तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है, जहां इसे दुरुस्त किया जा सकता है। खासतौर से भारत और चीन ने डब्ल्यूटीओ की अहमियत को एक बार फिर से आगे बढ़ाया है। डब्ल्यूटीओ में विकासशील और गरीब देशों के साथ न्याय की बात भी बहुत जोरदार ढंग से आगे बढ़ाई गई है...

हाल ही में 13 और 14 मई को नई दिल्ली में आयोजित हुई विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की दो दिवसीय मंत्री स्तरीय बैठक की ओर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हुई थीं। इस बैठक में शामिल देशों अर्जेंटीना, बांग्लादेश, बारबाडोस, ब्राजील, चाड, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, ओमान, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की आदि ने बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई और विकासशील व कम विकसित देशों के लिए ऐसे विशेष कारोबारी नियमों की वकालत की, जिन मुद्दों पर अमरीका सहित ताकतवर देश हमला करते रहे हैं। इस बैठक में अपीलीय निकाय में न्यायाधीशों की तत्काल नियुक्ति की मांग की गई, जिनकी कमी की वजह से विभिन्न देशों के बीच विवाद निपटाने के मामलों के पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है। डब्ल्यूटीओ में ज्यादा खुली, पारदर्शी व समावेशी प्रक्रिया की वकालत की गई, जो जिनेवा स्थित निकाय में व्यापक सुधार की दिशा में पहला कदम होगा। निकाय में सुधार संबंधी मुद्दा भारत द्वारा उठाया गया था। बैठक में डब्ल्यूटीओ के महानिदेशक रॉबर्टो अजेवेदो ने जोरदार शब्दों में कहा कि अब अपील निकाय में गतिरोध को रोका जाना चाहिए, तभी डब्ल्यूटीओ का कामकाज उपयुक्त रूप से जारी रखा जा सकेगा।

इस बैठक का एक चमकीला पक्ष यह रहा कि भारत के साथ चीन और दक्षिणी अफ्रीकी देशों ने मिलकर डब्ल्यूटीओ में दुनिया के गरीब देशों के खिलाफ विकसित देशों की एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया। खास बात यह है कि इस बैठक में बढ़ते संरक्षणवाद और बहुपक्षीय व्यापार नियमों की व्यवस्था के लिए पैदा हुई नई चुनौतियों पर विचार-मंथन भी किया गया। 14 मई को इस बैठक के समापन के बाद जारी संयुक्त घोषणा पत्र में कहा गया  कि विकास को प्रमुखता पर रखना होगा, जिसमें समावेशी विकास को प्रोत्साहन, विकासशील देशों के हितों व चिंताओं को ध्यान में रखा जाए। इस बैठक के निष्कर्ष डब्ल्यूटीओ के जून 2020 में कजाकिस्तान में होने वाले 12वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और डब्ल्यूटीओ के कार्यों की दिशा को इसके घोषित लक्ष्य के अनुरूप आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे। ज्ञातव्य है कि डब्ल्यूटीओ दुनिया को वैश्विक गांव बनाने का सपना लिए हुए एक ऐसा वैश्विक संगठन है, जो व्यापार एवं वाणिज्य को सहज एवं सुगम बनाने का उद्देश्य रखता है। यद्यपि डब्ल्यूटीओ 1 जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ, परंतु वास्तव में यह 1947 में स्थापित एक बहुपक्षीय व्यापारिक व्यवस्था प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (गैट) के नए एवं बहुआयामी रूप में अस्तित्व में आया है। जहां गैट वार्ता वस्तुओं के व्यापार एवं बाजारों में पहुंच के लिए प्रशुल्क संबंधी कटौतियों तक सीमित रही थी, वहीं इससे आगे बढ़कर डब्ल्यूटीओ का लक्ष्य वैश्विक व्यापारिक नियमों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास के  साथ-साथ सेवाओं एवं कृषि में व्यापार वार्ता को व्यापक बनाने का रहा है। हालांकि वैश्विक व्यापार को सरल और न्यायसंगत बनाने के 72 वर्ष बाद अब डब्ल्यूटीओ के भविष्य पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। खासतौर से भारत सहित विकासशील देशों के करोड़ों लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ के तहत विकासशील देशों का शोषण हो रहा है और खासतौर से कृषि, खाद्य सुरक्षा, वीजा सहित सेवा क्षेत्र से संबंधित मामलों में विकसित देश भारत सहित विकासशील देशों के सामने बार-बार चुनौती खड़ी कर रहे हैं। एक ऐसे समय में जब अमरीका के संरक्षणवादी रवैये से मई 2019 में अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वार गहरा गया है, तब इस बैठक से निकले निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण हैं। पिछले वर्ष 2018 की शुरुआत से लेकर अब तक अमरीका ने चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीना, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए हैं। जैसे-जैसे अमरीका विभिन्न देशों पर आयात शुल्क संबंधी प्रतिबंध लगा रहा है, वैसे-वैसे वे देश भी अमरीका सहित विभिन्न देशों पर आयात शुल्क बढ़ा रहे हैं। पिछले दिनों आठ मई को अमरीका ने चीन से आयातीत 200 अरब डालर के उत्पादों पर शुल्क की दर मौजूदा 10 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी कर दी है। हाल ही में प्रकाशित कई वैश्विक सर्वेक्षणों में कहा जा रहा है कि अमरीकी संरक्षणवाद से भारत के कृषि और उद्योग-कारोबार तथा भारतीय सेवा क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ेंगी।

अमरीका ने कहा है कि वह भारत को दी गई प्राथमिकताओं की सामान्यीकरण प्रणाली (जीएसपी) का दर्जा 23 मई, 2019 के बाद समाप्त कर देगा। जहां दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ न केवल वस्तुओं के व्यापार में अमरीका और अन्य विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे नए-नए आयात शुल्क के मामलों में कोई प्रभावी भूमिका नहीं  निभा पा रहा है, वहीं डब्ल्यूटीओ सेवा क्षेत्र के तहत अमरीका सहित विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की प्रतिभाओं के कदमों को रोकने के लिए वीजा संबंधी नियमों में अन्याययुक्त कदमों को भी नहीं रोक पा रहा है। स्थिति यह है कि अमरीका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड  सहित दुनिया के कुछ विकसित देशों में वीजा प्रतिबंधों के माध्यम से प्रतिभा प्रवाह पर नियंत्रण लगाने के चिंताजनक कदम उठाए जा रहे हैं। इन वीजा प्रतिबंधों और आयात शुल्क वृद्धि का भारत पर सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ते हुए दिखाई दे रहा है। ऐसे में पिछले दिनों 13 एवं 14 मई की नई दिल्ली में हुई मंत्री स्तरीय बैठक में इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार-मंथन किया गया कि यदि  विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती, जैसे कि उसे करना चाहिए, तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है, जहां इसे दुरुस्त किया जा सकता है। खासतौर से भारत और चीन ने डब्ल्यूटीओ की अहमियत को एक बार फिर से आगे बढ़ाया है। डब्ल्यूटीओ में विकासशील और गरीब देशों के साथ न्याय की बात भी बहुत जोरदार ढंग से आगे बढ़ाई गई है। 

यद्यपि इस बैठक में ई-कॉमर्स जैसे अहम मुद्दे पर चर्चा से बचा गया है, लेकिन फिर भी हम आशा करें कि डब्ल्यूटीओ के अस्तित्व के इस चुनौतीपूर्ण दौर में नई दिल्ली की दो दिवसीय मंत्री स्तरीय बैठक से जो निष्कर्ष निकले हैं, वे जून 2020 में कजाकिस्तान में होने वाले 12वें मंत्रीस्तरीय सम्मेलन के लिए उपयोगी होंगे। इस परिप्रेक्ष्य में डब्ल्यूटीओ के सभी सदस्य देश इसके उद्देश्यों एवं लक्ष्यों के अनुरूप इसे एक बार फिर से पल्लवित और पुष्पित करने के लिए तथा सूझबूझ का परिचय देंगे। ऐसा होने पर डब्ल्यूटीओ अपने उपयोगी और प्रभावी रूप में कार्यशील रहते हुए दिखाई दे सकेगा।