Tuesday, March 31, 2020 11:22 AM

डर के दीये

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

सुबह से एकालाप में मसरूफ नॉन-स्टॉप श्रीमति अब भी अपनी जीभ को आराम देने के मूड में नहीं थीं। लॉकडाउन से परेशान होकर मैं काफी देर तक घर के भीतर ही टहलता रहा। इससे पहले कि कानों से धुआं निकलता मैं भरी दुपहरी में छत पर चला आया। देखा तो अपनी बालकनी में पंडित जॉन अली अकेले ही न जाने क्या बुदबुदा रहे थे। उन्हें देखकर सांस में सांस आई कि चलो कोई तो है जिससे बात हो सके। घर के भीतर तो मैं केवल सुनने वाला ही था। भीतर बीवी के सामने मेरी स्थिति बिलकुल वैसी ही थी जैसे किसी अधेड़ सरकारी कर्मचारी ने अपने विभागाध्यक्ष से किसी विवाद पर अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा हो और उसकी पर्सनल हियरिंग लिसनिंग में बदल गई हो। आते ही मैंने पंडित जी को आवाज दी, ‘‘पंडित जी, क्या हुआ? अभी तो जेठा आना बाकी है। मार्च की धूप में ही बौराने लगे।’’ पंडित जी बोले, ‘‘अमां यार! अच्छा हुआ जो तुम चले आए। घर के भीतर परेशान हो गया था। टीवी पर कोरोना का रोना और बीवी का धोना। दोनों में अधिक अंतर नहीं है। दोनों से दूर भागने में ही भलाई है। कोई नहीं मिला तो खुद ही बोलना शुरू कर दिया।’’  ‘‘पंडित जी सही फरमाते हैं। मैं तो अब भी बोलने के मूड में हूं नहीं। अपनी सुनाओ।’’, मैं बोला।  वह बोले, ‘‘यार कुछ भी कहो। आज से पहले भारतीयों में इतना एका कभी नहीं देखा था। मुझे एहसास तो था, लेकिन अनुभव नहीं था कि मौत का खौफ इतना होता है। अगर दंगों के दौरान सभी भारतीय ऐसे घर-घुस्सू बन जाएं तो मजाल है कत्लोगारत या लूटपाट हो सके। न जाने ऐसे मौकों पर लोगों के दिलों में खुदा का खौफ क्यों नहीं रहता। दिलो-दिमाग पर हैवानियत इतनी तारी हो जाती है कि जात और मजहब के झूठे लिबास पहनकर एक-दूसरे का लहू बहाने लगते हैं। इससे तो कोरोना को ही खुदा मान लें तो दुनिया में तमाम तरह के बुरे काम बंद हो जाएं। अब देखो न, सी फॉर क्रप्शन एंड सी फॉर कोरोना, लेकिन एक सी से लोग चिमटे पड़े हैं तो दूसरे से ऐसे भाग रहे हैं मानो मौत दुल्हनिया बनी उनका इंतजार कर रही हो। देश भर में जैसी थाली और ताली कोरोना के खिलाफ बजी; अगर ऐसी भ्रष्टाचार के खिलाफ बजे तो लफ्जों की सोने की चिडि़या सचमुच की सोने की चिडि़या न हो जाए। कोरोना को देश की सीमाओं की नहीं, ऐसे जिंदा जिस्मों की तलाश है, जिनकी अंतरात्मा सोई और दिलो-दिमाग बंद हों। प्रशासन और पुलिस ऐसा अनुशासन और चुस्ती अगर बुराइयों को मिटाने में लगाए और लोग इसी तरह सहयोग करें तो सियासतदानों को चुनावों के लिए नए मुद्दे ढ़ूंढने पडें़गे। कहीं वादाखिलाफी भी नहीं होगी। परंतु हमारा हाल यह है कि बदबू अपने आंगन से आती है और हम झाड़ू लेकर दूसरे का आंगन बुहारने चल देते हैं।’’ अचानक मेरे मुंह से निकला, ‘‘लेकिन ऐसे नाजुक मौकों पर भी लोग अपने दिमाग को कैबरे कराने से बाज नहीं आ रहे। आज सोशल मीडिया पर तीन मुंह वाले बच्चे के पैदा होने और उसके मुंह से दुनिया के नष्ट होने की भविष्याणी की अफवाह ने कहर मचा रखा है। डर के मारे लोग घरों में दिये जला रहे हैं। काश! घरों की बजाय अगर वे दिमाग के दीये जलाने की कोशिश करें तो कोरोना क्या समाज की सारी बुराइयां और बीमारियां वैसे ही खत्म हो जाएं जैसे जालिम लोशन लगाने से दाद, खाज-खुजली का जड़ से खात्मा हो जाता है।’’