Monday, April 06, 2020 06:32 PM

डीएनए प्रौद्योगिकी के प्रणेता लाल सिंह

 संस्मरण

 शेर सिंह

मो.-8447037777

-गतांक से आगे...

ऐसा व्यक्ति संभवतः अपने स्वभाव, अपनी नैतिकता के कारण बेदाग छवि के साथ सफल और अच्छा जीवन तो जी सकता है, लेकिन वह आर्थिक तौर पर उतना ऊपर नहीं उठ सकता है जितना नैतिकता को ताक पर रखकर, छल-कपट तथा कर आदि की चोरी के द्वारा धनवान बनते हैं। धन और सत्ता के प्रति अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी ऐसे लोग अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं! और, कुछ भी कर एवं करवा सकते हैं।

 इस प्रकार की मानसिकता से अनैतिकता तथा अपराध का जन्म होता है। और, अपराधी अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। किसी भी प्रकार का काम कर सकता है। किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है। किसी भी असहाय की भावनाओं से खिलवाड़ कर अपने मकसद में कामयाब हो सकता है। इस प्रकार के अपराधों को अंजाम देने के पीछे चाहे वे राजनीतिक हों, सामाजिक या आर्थिक हों, उन कारणों आदि के संबंध में तथ्य जुटाना अथवा किए गए अपराध को सिद्ध करने के लिए डीएनए टेस्ट करना अब आम बात हो गई है। डा. सिंह इस जटिल विषय को जिस सहजता से समझा और बता रहे थे, उसी से लगता था कि सभागार में उपस्थित सभी लोग जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए थे।

वे बता रहे थे कि डीएनए फिंगर प्रिंटिंग पहली बार 1985 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक डा. अलेक जैफरी ने शुरू की थी। डीएनए फिंगर प्रिंटिंग की खोज वर्ष 1985 में ब्रिटेन स्थित लिस्सिटर विश्वविद्यालय में डा. अलेक जैफरी ने ही शुरू की थी। उसके पश्चात 1988-89 में डा. लालजी सिंह द्वारा भारत में इस तकनीक का प्रयोग प्रारंभ किया गया। डा. सिंह अपनी इस विलक्षण खोज के बारे बता रहे थे कि अपनी इस उपलब्धि के लिए किस प्रकार उन्हें न्यायालय के कटघरे में खड़ा किया गया था। 1985 में केरल राज्य के त्रिची में किसी व्यक्ति ने अपनी प्रेमिका से बिना शादी किए शारीरिक संबंध बना लिए थे। युवती गर्भवती हुई और अपने प्रेमी से शादी के लिए आग्रह करने लगी। लेकिन युवक के परिजनों एवं संबंधियों ने युवक पर दबाव डाला और उसने कह दिया कि युवती के पेट में पल रहा बच्चा उसका नहीं है।

युवती अपनी बात, वास्तविकता को कैसे सिद्ध करे, यह बहुत कठिन था। उन्हीं दिनों पत्र-पत्रिकाओं में ब्रिटेन में डा. अलेक जैफरी द्वारा डीएनए टेस्ट और हैदराबाद में डा. लालजी सिंह द्वारा डीएनए फिंगर प्रिंटिंग में उपलब्धि के बारे में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं में पढ़ने के पश्चात उस युवती के वकील ने डा. लालजी सिंह द्वारा युवक, युवती और अजन्मे बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने के लिए कोर्ट से अनुरोध किया। और इस प्रकार भारत में पहली बार डीएनए टेस्ट कराने के लिए केरल राज्य में त्रिची के एक कोर्ट ने अनुमति दी। डीएनए टेस्ट के द्वारा डा. लालजी सिंह यह सिद्ध करने में सफल रहे थे कि युवती के पेट में पलने वाला बच्चा विवादित युवक का ही है। कोर्ट ने इस तथ्य को माना और युवती के पक्ष में अपना फैसला सुनाया।

भारत में किसी भी न्यायालय द्वारा डीएनए टेस्ट के आधार पर सुनाए जाने वाले फैसले का यह पहला मामला था। भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसा पहली बार हुआ जब ऐवीडेंस एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होते हुए भी, एक वैज्ञानिक के शोध को आधार मान कर फैसला करते हुए सजा सुनाई गई थी। अब तो हर बात के लिए डीएनए टेस्ट किया जाता है जिससे सच्चाई सिद्ध हो सके। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या के पश्चात उनके अंग क्षत-विक्षत होकर इधर-उधर बिखर गए थे। डा. सिंह द्वारा उन बिखरे अंगों का डीएनए परीक्षण करने के पश्चात उन्हें एकत्रित कर, उनका अंतिम संस्कार किया जा सका था।

डा. सिंह संदर्भित सम्मेलन के समय तक लगभग तीन सौ मामलों में डीएनए से संबंधित साक्ष्य दे चुके थे। इनमें राजीव गांधी हत्याकांड, नैना साहनी (तंदूर मामला), पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्या, स्वामी प्रेमानंद मामला और उत्तर प्रदेश के मधुमिता शुक्ला हत्याकांड से संबंधित प्रमुख मामले शामिल हैं। पद्मश्री डा. लालजी सिंह अपने विभिन्न अनुभवों, अनेक दृष्टांतों को जिस सहजता और बारीकी से बता रहे थे, उसी से समस्त हॉल में सुई-पटक की खामोशी व्याप्त थी। डा. लालजी सिंह एवं उनके सहयोगियों ने उसी दौरान एक ऐसे डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी को विकसित किया था जिसमें लहू की एक बूंद अथवा मांस के एक छोटे से टुकड़े से यह पता लगाया जा सकता है कि यह मानव का है या किसी पशु का।

यदि किसी पशु का है तो कौन सी प्रजाति के पशु का, यह जान लेना और स्पष्ट करना अब अत्यंत सहज और सरल हो चुका है। पद्मश्री डा. लालजी सिंह से मुझे दो बार मिलने, उनके संपर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पहली बार 5 अक्तूबर 2007 को दक्षिण क्षेत्र भाषा सम्मेलन में, और दूसरी बार तब जब 28 अक्तूबर 2007 को हैदराबाद में ही रचनात्मक साहित्यिक एवं शैक्षणिक परिषद हैदराबाद द्वारा तेलुगु विश्वविद्यालय में राष्ट्रभारती पुरस्कार समारोह में उनके करकमलों द्वारा मुझे राष्ट्रभारती अवार्ड प्रदान करते हुए सम्मानित किया गया। पद्मश्री डा. लालजी सिंह जितने महान वैज्ञानिक थे, उतना ही अधिक उनका सादगीपूर्ण जीवन, परंतु प्रभावशाली व्यक्तित्व था। मैंने इस प्रकार के भाषा सम्मेलनों-सेमिनारों में 1985 में रांची में एचईसी यानी हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन के सौजन्य से आयोजित सम्मेलन में पहली बार भाग लिया था।

तब से लेकर आज तक कितने ही सम्मेलनों, संगोष्ठियों, सेमिनारों, कार्यशालाओं, बैठकों आदि में देश के विभिन्न भागों में जाकर, उनमें शामिल होने के अवसर मिले हैं। लेकिन वे सम्मेलन, विभिन्न एवं विविध आयोजन केवल ढिंढोरा पीटने जैसे ही थे। विषयों का पिष्टपेषण और उबाऊ कार्यक्रम! परंतु इस सम्मेलन में सचमुच कुछ हटकर था। अभिरुचि और भाषा, विज्ञान और जीवन के अंतरसंबंधों के बारे में भाषाविदों को वैज्ञानिकों से रूबरू होकर उनको करीब से जानने एवं समझने का बेहतरीन अवसर प्रदान किया गया था। पद्मश्री डा. लालजी सिंह को भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी का पितामाह कहा जाता है। यह स्वीकार करते हुए बड़ा दुख होता है कि 10 दिसंबर 2017 को वह अब हमारे बीच में नहीं रहे हैं।

-(समाप्त)