Monday, April 06, 2020 04:28 PM

डीएनए प्रौद्योगिकी के प्रणेता लाल सिंह

 संस्मरण

 शेर सिंह

मो.-8447037777

वह एक विशिष्ट दिन था। गुरुवार 5 अक्तूबर 2007 और समय था पूर्वाह्न 11.30 से 1 बजे का। स्थान था भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईसीटी) तारानाका, हैदराबाद-500707। अवसर था भारत सरकार के भाषा विभाग, दक्षिण तथा दक्षिण- पश्चिम क्षेत्र बेंगलुरू एवं तिरूवनंतपुरम के क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा संयुक्त रूप से हिंदी भाषा एवं राजभाषा सम्मेलन। इस प्रकार के सम्मेलनों में सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन सम्मेलनों, संगोष्ठियों, सेमिनारों तथा कार्यक्रमों में भाषा, राजभाषा हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं से संबंधित विषयों पर रटे-रटाए और अनेकों बार पहले ही दोहराए गए विषयों की पुनरावृत्ति एवं पिष्टपेषण के अतिरिक्त और क्या हो सकता है, पर कई मायनों में यह एक अनूठा ही सम्मेलन था। लीक से बिल्कुल हटकर! सर्वथा अलग ही प्रकार का। परंतु उत्सुकता और आकर्षण से भरपूर! यह सेमिनार -सम्मेलन उत्सुकता, जिज्ञासा एवं नवीन जानकारी तथा ज्ञान से परिपूर्ण अद्भुत, अनूठे विषयों, उत्कट जिज्ञासा, ज्ञान और गौरवमय क्षणों, लम्हों को याद करने हेतु ज़हन में हमेशा याद रहेगा! ये अविस्मरणीय अनुभव, यादें हमेशा मुझे उस विशेष दिवस, स्थान, क्षणों को बरबस मेरे मानसपटल पर बिठाए रखते हैं। ना केवल बिठाए रखते हैं, बल्कि मुझे उन गौरवमयी लम्हों, क्षणों को बारंबार स्मरण कराते रहते हैं। वे सुखद क्षण, सुनहरे अनुभव जब भी याद करता हूं तो ये मुझे हमेशा गहरी और तीव्र अनुभूति का अहसास कराते हुए रोमांचित कर डालते हैं। भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान के वातानुकूलित सभागार में सुई-पटक की खामोशी व्याप्त थी। एयरकंडीशंड ऑडिटोरियम जिसमें लगभग सात सौ लोगों के एक साथ बैठने की क्षमता है, उस दौरान खचाखच भरा हुआ था। जिन्हें बैठने के लिए जगह नहीं मिली थी, वे हॉल के किनारों पर खड़े-खड़े ही सुन रहे थे। पूरे हॉल में रोशनी बंद कर दी गई थी। सब ओर अंधेरा छाया हुआ था। केवल स्टेज पर रोशनी थी जहां एक दुबला, पतला, औसत कद-काठी के साधारण वस्त्रों में एक विख्यात व्यक्ति पॉवर प्वांइट के द्वारा स्क्रीन पर अपने विषय को जिस सहज भाषा, सरलता लेकिन अधिकारपूर्ण तरीके से बता और समझा रहे थे, उससे हॉल में उपस्थित सभी लोग जैसे अपने आपको भूल से गए थे। सभी मंत्रमुग्ध होकर उस तिलस्मी, महान व्यक्तित्व के साथ जैसे एकाकार होकर उसके साथ बहे जा रहे थे। ज्यों पवन के साथ पेड़ की डालियां झूमती हैं। विषय भी उतना ही जटिल परंतु रोचक, रोमांचक, जिज्ञासा से परिपूर्ण तथा नवीन जानकारी से भरा हुआ था।

सम्मेलन भाषा पर केंद्रित था। लेकिन इस सत्र का विषय विज्ञान था। और, विज्ञान का एक ऐसा विषय था जो आज पूरी दुनिया में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुका है। आप भी सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या विषय था जिसे सबके सब अपने आपको विस्मृत कर मुग्ध भाव से सुन रहे थे। दरअसल आज विज्ञान एवं तकनीक, प्रौद्योगिकी के अति विकसित युग में विशेषकर मानव संबंधों अथवा यों कहें कि जीव संबंधों, जीव विज्ञान के बारे में जितनी चर्चा और उत्सुकता होती है, उतनी संभवतः अन्य विषयों की नहीं! तो मुद्दे पर आते हैं। सत्र का विषय था, डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी और उसे समझा रहे थे भारत के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. लालजी सिंह। पद्मश्री डा. लालजी सिंह सेंटर फार सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी (सीसीएमबी) संस्थान, हैदराबाद में 1998 से निदेशक के पद पर कार्यरत थे। वह भारत के डीएनए फिंगर प्रिंटिंग क्षेत्र के अग्रणी, सर्वाधिक सक्षम, योग्य एवं अपने विषय के पारंगत वैज्ञानिक थे। भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हैदराबाद सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं उच्च मानकों वाला केंद्र है। अत्यंत सरल स्वभाव, मृदुभाषी लेकिन प्रखर बुद्धि के धनी पद्मश्री डा. लालजी सिंह डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के संबंध में अपने अनुभवों, घटनाओं तथा जीवनवृत्त के बारे में बता रहे थे। डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वह भारत के अकेले ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है और अपार ख्याति प्राप्त हुई है। पद्मश्री डा. लालजी सिंह मूलतः उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से थे। 1971 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से साइटोजेनेटिक्स के क्षेत्र में पीएचडी की थी। उन्हें उस समय तक जगदीश चंद्र बोस अवार्ड सहित लगभग 22 विभिन्न उच्च एवं प्रतिष्ठित राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार एवं अवार्ड प्राप्त हो चुके थे। वर्ष 1997 में भारत सरकार ने उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें पद्म विभूषण अलंकरण से सम्मानित किया। डा. सिंह विज्ञान जगत के संभवतः अत्यंत जटिल विषय डीएनए फिंगर प्रिंटिंग को बेहद सहजता, सरलता से आम हिंदी भाषा के माध्यम से समझा रहे थे। डा. सिंह शरीर रचना की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी डीएनए यानी सरल भाषा में कहें तो जीन-आनुवंशिकी के बारे में बता रहे थे कि कैसे इस टेक्नोलॉजी की सहायता से संसार में कहीं भी, किसी एक व्यक्ति की कितनी आसानी से पहचान की जा सकती है। भले ही इसका प्रयोग अपराध जगत में तथ्यों को प्रमाणित करने से संबंधित हो या पशुओं की किसी विशेष प्रजाति के संरक्षण से हो। अथवा अरबों वर्ष पहले लुप्तप्रायः हो चुके मानव तथा पशुओं के विषय में पता लगाने, जानकारी हासिल करने के संबंध में हो। यदि गहराई से देखा और सोचा जाए तो पूरे विश्व में आज आर्थिक क्षेत्र से अधिक अन्य कोई दूसरा क्षेत्र महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है। आज दुनिया में हर आदमी केवल और केवल अधिक से अधिक धन कमाना चाहता है। धन कमाना और उच्च पद की कामना का लोभ, लालच सबसे अधिक है। सबका एक ही उद्देश्य लगता है! और वो उद्देश्य है सबसे अधिक धनवान बनना! लगता है सभी का एकमात्र लक्ष्य जिस प्रकार से हो सके, धन कमाना, जीवन को रंगीन बनाना तथा सुख-सुविधा का उपयोग और उपभोग करना है! यही शायद आज के समय का प्रमुख उद्देश्य रह गया है। रीति-नीति, मान-अपमान, नैतिकता-अनैतिकता, बौद्धिकता-विचारशीलता आदि कहीं पीछे छूट गए लगते हैं। ऐसे भौतिकतावादी समय में जो व्यक्ति नैतिकता को अपनाता है, रीति-नीति को मानता है, मान-सम्मान का ध्यान रखता है, वह आसानी से और ईमानदारी के बल पर धन कमा सके अथवा धनवान बन सके, ऐसा बहुत कम है।

-(शेष अगले अंक में)