Tuesday, October 15, 2019 09:40 AM

ड्ढकुंडलिनी साधनाएं : कुंडलिनी क्या है

अब इस पात्र के पदार्थ को पानी में घोलकर पी जाएं और पद्मासन की मुद्रा में जीभ को उलटकर तालू से लगाकर ‘घ्ंस’ शब्द का या ‘ओउम’ का लय में उच्चारण करते हुए लिं को उल्टा करके नाभी के नीचे लाएं और पट्टी से हल्का करके बांध दें। इस अवस्था में पहले त्राटक का ध्यान लगाएं, तत्पश्चात रीढ़ की निचली नोंक पर ध्यान लगाकर कल्पना करें कि इससे ऊर्जा खींचकर आप ऊपर चढ़ा रहे हैं। यह क्रिया प्रतिदिन आधी रात में तब तक करते रहें, जब तक कि ऊर्जा चक्र मस्तक के त्रटक तक ऊर्जा का प्रवाह उत्पन्न नहीं कर देता...

-गतांक से आगे...

तंत्र की पद्धति

गेहूं को काली गाय के गोबर एवं काली मिट्टी में मिलाकर बो दें। इसमें जल देते रहें। जब यह चार इंच का पौधा बन जाए, तो उसे उखाड़ लें और जड़ सहित धोकर ब्राह्मी, वचा, तुलसी, कालीमिर्च को महुए की मदिरा में पीसें। इसे पीस-पीसकर इतना महीन करें, जितना कर सकें। इसे एक मिट्टी के पात्र में रखकर लाल कपड़े से ढक दें। अब इसे काली की प्रतिमा के सामने रखकर माता काली की विधिवत पूजा करके निम्नलिखित मंत्र जाप 108 बार करें :

ओउम नमः चामुंडाय मां काली भवानी।

विघ्न संहारिनी दुष्टनाशिनी शक्तिदायिनी।।

अब इस पात्र के पदार्थ को पानी में घोलकर पी जाएं और पद्मासन की मुद्रा में जीभ को उलटकर तालू से लगाकर ‘घ्ंस’ शब्द का या ‘ओउम’ का लय में उच्चारण करते हुए लिं को उल्टा करके नाभी के नीचे लाएं और पट्टी से हल्का करके बांध दें। इस अवस्था में पहले त्राटक का ध्यान लगाएं, तत्पश्चात रीढ़ की निचली नोंक पर ध्यान लगाकर कल्पना करें कि इससे ऊर्जा खींचकर आप ऊपर चढ़ा रहे हैं। यह क्रिया प्रतिदिन आधी रात में तब तक करते रहें, जब तक कि ऊर्जा चक्र मस्तक के त्रटक तक ऊर्जा का प्रवाह उत्पन्न नहीं कर देता। इस पद्धति से योग की अपेक्षा अधिक शीघ्र कुंडलिनी जाग्रत होती है।

अष्ट सिद्धि (आठ प्रकार की सिद्धियां)

सिद्धियां आठ प्रकार की हैं : अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, ईशित्व, वशित्व प्राप्ति तथा प्राकाम्य।

  1. अणिमा : इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को (उदाहरण के रूप में कद को, छाती, बाहों को, जांघों को) बढ़ा सकता है। सूखा-सड़ा शरीर किस काम का, उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। उसकी कीर्ति बढ़ती है। प्रभाव भी बढ़ता है।
  2. लघिमा :  इस सिद्धि द्वारा मनुष्य अपना मोटापा कम कर सकता है। श्री प्रभदत्त ब्रह्मचारी ने लिखा है-‘अति स्थूल स्त्री-पुरुषों का जीवन क्रम घट जाता है अर्थात वे हीनायु होते हैं। वे कोई काम नहीं कर सकते। क्योंकि उनमें वेग की फुर्ती की कमी हो जाती है। ऐसे स्त्री-पुरुष संतानोत्पाद में भी असमर्थ हो जाते हैं। थुलथुला-मोटा शरीर होने पर उसमें बल की कमी आ जाती है। उन्हें पसीना अधिक आता है और उसमें मेद का अंश कम होने के कारण उनके पसीने में दुर्गंध रहती है।