Monday, July 22, 2019 01:31 PM

तपश्चर्या का काम है साहित्य साधना

किताब के संदर्भ में लेखक

दिव्य हिमाचल के साथ

साहित्य में शब्द की संभावना शाश्वत है और इसी संवेग में बहते कई लेखक मनीषी हो जाते हैं, तो कुछ अलंकृत होकर मानव चित्रण  का बोध कराते हैं। लेखक महज रचना नहीं हो सकता और न ही यथार्थ के पहियों पर दौड़ते जीवन का मुसाफिर, बल्कि युगों-युगों की शब्दाबली में तैरती सृजन की नाव पर अगर कोई विचारधारा अग्रसर है, तो उसका नाविक बनने का अवसर ही साहित्यिक जीवन की परिभाषा है, जो बनते-संवरते, टूटते-बिखरते और एकत्रित होते ज्वारभाटों के बीच सृजन की पहचान का मार्ग प्रशस्त करता है। यह शाृंखला किसी ज्ञान या साहित्य की शर्तों से हटकर, केवल सृजन की अनवरत धाराओं में बहते लेखक समुदाय को छूने भर की कोशिश है। इस क्रम में जब हमने डा. हेमराज कौशिक की आलोचना पुस्तक ‘कथा की दुनिया : एक प्रत्यवलोकन’ की पड़ताल की तो कई पहलू सामने आए... 

दिहि : आप अपनी लेखकीय यात्रा को कैसे देखते हैं और कितना मुकम्मल पाते हैं?

डा. हेमराज : हिंदी भाषा के प्रति अनुराग पिता से संस्कार रूप में मिला। मेरे बाल्यकाल में रामचरितमानस का पिता द्वारा सस्वर पाठ तथा दूसरी धार्मिक पुस्तकों की उपस्थिति कहीं निज रूप में मुझे संस्कारित करती रही होंगी। लेखन के प्रति रुचि मैट्रिक करने के अनंतर 1968 में प्रभाकर उत्तीर्ण करने पर हुई, जन साहित्य को पढ़ने का अवसर मिला। उस समय कविता लिखने से शुरुआत हुई। कुछ कविताएं लिखी, परंतु पत्रिकाओं की अनभिज्ञता के कारण कहीं नहीं भेजी। बाद में 1970 में पहली कविता कालेज की पत्रिका में प्रकाशित हुई। कविता सृजन का यह क्रम जारी रहा, कुछ कविताएं बाद में प्रकाशित भी हुईं। 1979 से 1983 तक शोध कार्य पूर्ण करने के अनंतर हिंदी आलोचना की ओर उन्मुख हुआ। सन् 1983 से लेकर निरंतर लेखन के फलस्वरूप चौदह आलोचनात्मक पुस्तकें और एक संपादित कहानी संग्रह प्रकाशित है। यह मेरी लेखकीय यात्रा है जिसे मैं अधूरा समझता हूं। इसे मैं मुकम्मल नहीं कह सकता। जीवन ही अपूर्ण है, पूर्णता का अहंकार जड़ बनाता है। इस दृष्टि से मैं अपने आपको अपूर्ण पाता हूं।

दिहि : कहानी, कविता से निकले लेखकीय संवाद को तरह-तरह की विचारधाराओं से मिलते हुए कैसे देखते हैं?

डा. हेमराज : कहानी, कविता आदि सर्जनात्मक विधाओं में सृजन करते हुए भाव और विचारों का महत्त्व होता है। आलोचक रचना की राह से गुजरकर उन विचार सरणियों को देखता है। रचना में विचार पूर्वाग्रहग्रस्त और आरोपित नहीं होने चाहिए। विचार जहन में रच-बस कर आने चाहिए।

दिहि : जो केवल साहित्य से मिला तथा आपके लेखन की मुलाकात में जो लेखक मार्गदर्शक बना?

डा. हेमराज : साहित्य को अर्थोपार्जन से मैंने कभी नहीं जोड़ा। साहित्य साधना तपश्चर्या का कार्य है, उसमें सृजनात्मक तनाव होते हुए भी उसकी संप्रेषणीयता में आत्मतोष और सुखानुभूति है। बहुत से लेखकों से संपर्क भी रहा। परंतु मेरे लेखन को दिशा देने में प्रख्यात कथाकार और आलोचक डा. विजय मोहन सिंह की स्मरणीय भूमिका रही है। डा. मैथिल भारद्वाज से पंजाब विश्वविद्यालय में मुलाकात भी इस दिशा में सहायक रही।

दिहि : आपके लेखन का शोधार्थी व्यक्तित्व जिस कृति के आगे नतमस्तक हुआ या जहां से वैचारिक, भाषायी तथा सामाजिक-सांस्कृतिक नजरिया कर्जदार हो गया?

डा. हेमराज : आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य से मुझे इतिहास दृष्टि और सांस्कृतिक समझ मिली।

दिहि : साहित्य के बीच जो ताकतवर तत्त्व मिले, उनमें भाषाई स्वरूप, मनोविज्ञान, लेखकीय शिल्प, विजन और चारित्रिक ऊर्जा से जहां-जहां सराबोर हुए?

डा. हेमराज : शरत चंद्र के चरित्रहीन और देवदास, प्रेमचंद के गोदान, अमृतलाल नागर के बूंद और समुद्र, नाच्यो बहुत गोपाल, यशपाल के झूठा सच और दिव्या, निर्मल वर्मा के निबंध और कथा साहित्य, भीष्म साहनी के तमस, अज्ञेय की शेखर एक जीवनी, जैनेंद्र का त्यागपत्र, रेणु के मैला आंचल आदि कृतियों में ऊर्जावान तत्त्व मिले, जिनका प्रभाव मेरे मन-मस्तिष्क पर अक्षुण्ण है।

दिहि : आपको किसके लेखन में तिलिस्म, किसके में नायक या किसकी रचना में क्रांतियों से मुलाकात हुई?

डा. हेमराज : बांग्ला लेखक शरत चंद्र के तत्कालीन रूढि़वादी परिवेश में उनका औपन्यासिक लेखन अद्भुत प्रतीत हुआ। प्रेमचंद के  गोदान के होरी, शेखर एक जीवनी के शेखर, त्यागपत्र की मृणाल, झूठा सच की तारा, बूंद और समुद्र की तायी, नाच्यो बहुत गोपाल की निर्गुणिया, दादा कामरेड की शैल, दिव्या की दिव्या आदि अनेक प्रमुख चरित्र हैं जो मेरे जहन में सदैव आछन्न रहे हैं।

दिहि : आपके लेखन ने यह तो साबित कर दिया कि सृजन की क्षमता भरपूर अध्ययन की ऊर्जा से निकलती है, फिर भी आपके अध्ययन की परिपाटी क्या रही है और किसके लेखन से मर्मस्पर्शी व आत्मीय रिश्ता बना?

डा. हेमराज : आलोचना श्रमसाध्य और थका देने वाला कार्य है। एक आलोचक को आलोच्य कृतियों के अतिरिक्त दूसरे ज्ञानात्मक अनुशासनों का गहन अध्ययन अपेक्षित होता है। किसी भी आलोच्य कृति या रचनाकार पर लेखन से पूर्व मैं उसे दो बार पढ़ता हूं ताकि रचनाकार की मनोभूमि, संवेदना, भाषा शिल्प और जीवन दृष्टि के बिंदुओं को पकड़ सकूं। कृतियों की राह से गुजरते हुए मेरी पद्धति विश्लेषणात्मक है जिसमें समाज सापेक्षता प्रमुख रूप में रहती है। प्रेमचंद, यशपाल, अमृतलाल नागर, जैनेंद्र, अज्ञेय, भीष्म साहनी मेरे प्रिय लेखक हैं।

दिहि : हकीकत के उद्वेलित पन्नों पर कहानी, कविता, उपन्यास या नाटकों से गुजरते हुए, जिस विधा में आपको लगा कि यही आपकी अभिव्यक्ति के करीब है?

डा. हेमराज : साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, आत्मकथा पर भी मेरा आलोचनात्मक लेखन है, परंतु उपन्यास और कहानी आलोचना अपेक्षाकृत मेरी अभिव्यक्ति के करीब है।

दिहि : मौजूदा लेखन के पन्नों में जहां परिपक्वता दिखाई दी या वर्तमान जीवन की गतिशीलता, व्यक्तिवादिता, अर्थ बोध या प्रतिस्पर्धा ने साहित्य को भी पाजेब पहना दी है?

डा. हेमराज : मौजूदा लेखन के पन्नों में निर्मल वर्मा का अंतिम अरण्य, कृष्णा सोबती का समय सरगम, अमरकांत का इन्हीं हथियारों में, सुरेंद्र वर्मा का मुझे चांद चाहिए, दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम, चित्रा मुद्गल का आंवा, कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान, अखिलेश का निर्वासन, पंकज सुबीर का अकाल में उत्सव, मृदुला गर्ग का कठ गुलाब आदि कुछ स्मरणीय परिपक्व उपन्यास लगते हैं। बहुत कुछ बाजारवाद के फलस्वरूप ऐसा भी लिखा जा रहा है जो तात्कालिक चर्चा तक सीमित है।

दिहि : पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के बावजूद, उदासीनता का प्रकाशकीय संदर्भ क्या है? पाठक और लेखक के बीच क्या वैचारिक संघर्ष एक सरीखा नहीं रहा या आज का हिंदी उपन्यास ठहर सा गया है?

डा. हेमराज : पत्र-पत्रिकाओं का विस्तार हुआ है, परंतु अनेक पत्रिकाएं अपने-अपने वृत्तों में अपने जाने-पहचाने रचनाकारों तक सीमित हैं। नई सदी में भूमंडलीयकरण, बाजारवाद, उदारीकरण, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि को लेकर अनेक कृतियां आई हैं और कुछ कृतियां चर्चित भी हैं, परंतु लेखक और पाठक में दूरी बनी हुई है। ऐसी कृतियां बहुत कम आई हैं, जो पाठकों को उद्वेलित करती हैं। औपन्यासिक सृजन की धारा सतत् प्रवहमान है। 

दिहि : छात्रोें में साहित्य के प्रति घटती रुचि या साहित्य के इस युग में घटते नेतृत्व के लिए किसे दोषी ठहराएंगे?

डा. हेमराज : साहित्य के प्रति घटती रुचि का प्रमुख कारण शैक्षणिक संस्थाओं में साहित्य पाठन पाठ्यक्रम तक सीमित रहना है। पुस्तकालय की उपलब्धता और श्रेष्ठ साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न कर इस दिशा में एक कदम हो सकता है। आज की उपभोक्तावादी अर्थ केंद्रित मनोवृत्ति में पढ़े-लिखे माता-पिता तक में साहित्य के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण है। वह तत्कालीन लाभ के लिए साहित्य की अपेक्षा दूसरे विषयों को अधिमान देते हैं।

दिहि : भाषा के वर्तमान धरातल पर पैदा हो रही विसंगतियों को क्या अभिव्यक्ति की व्यावसायिकता से जोड़कर देखेंगे। संप्रेषण की गति ने शब्द की सरलता छीन ली है या शिल्प के प्रयोग असहज हो गए?

डा. हेमराज : निश्चित रूप में संप्रेषण की गति, व्यावसायिकता और शिल्प के नए प्रयोगों से भाषा का स्वरूप गरिमामय आसन से गिरा है। भाषा देशीय शब्दों से संवर्धन करे, परंतु भाषा का स्वरूप विकृत नहीं होना चाहिए।

दिहि : हिमाचल के साहित्यिक माहौल पर आपकी अल्प टिप्पणी?

डा. हेमराज : हिमाचल प्रदेश में विभिन्न विधाओं का सृजन हो रहा है और बहुत सी रचनाओं की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी हो रही है। परंतु रचनाकारों में संवाद की स्थिति क्षीण है। साहित्यिक संस्थाओं के भी अपने-अपने वृत्त हैं।

दिहि : चंद पंक्तियां जो साहित्य की ऊंचाई में दर्ज हों या जिन्हें आप यादों की यात्रा में साथ रखते हों?

डा. हेमराज : मानवता, आशावाद और सकारात्मक सोच। साहित्य साधना तपश्चर्या है। पुस्तकें सर्व प्रिय मित्र हैं जो मन को सुख-शांति देती हैं। वे साथ कभी नहीं छोड़ती।

-मुकेश कुमार, सोलन